October 23, 2010

...और दीनानाथ ने बसा दिया एक प्रेमवन

- रोली शिवहरे और प्रशांत दुबे
आज दीना के इस प्रेमवन में आम, आंवला, महुआ, जामुन, बेल, बांस, शीशम, कत्था, अमरुद और कठहल आदि लगभग सात हजार पेड़ लगे हैं। लगभग 200 एकड़ जंगल में फैले इस वन के प्रत्येक पौधे को अपने हाथ से लगाया और सींचा दीना व ननकी ने। दीना व ननकी की अपनी कोई संतान नहीं है तो उन्होंने पेड़ों को बच्चा मान लिया।
उसे यह नहीं मालूम है कि कोपेनहेगन में गरम हो रही धरती का ताप कम करने के लिये कवायद चली। उसे यह भी नहीं मालूम कि दुनिया भर से जंगल कम हो रहा है और उसे बचाने व नये सिरे से बसाने के प्रयास चल रहे हैं। उसे यह भी नहीं मालूम कि यदि जंगल बच भी गया तो उस पर कंपनियों की नजर गड़ी है।
उसे मालूम है तो इतना कि पेड़ कैसे लगाये जायें और उन्हें कैसे बचाया जाये। पेड़ बचाने की धुन भी ऐसी कि एक छोटा जंगल ही लगा डाला। उसे नागर समाज की वन की परिभाषा भी नहीं मालूम लेकिन उसने बसा दिया 'प्रेम वन'।
दीना ने वन क्यों लगाया? इस पर मंद- मंद मुस्कराते हुये बड़े ही दार्शनिक अंदाज में वे कहते हैं 'जीवन में किसी न किसी से तो मोहब्बत होती ही है, मैंने पेड़ों से मोहब्बत कर ली।' दीना ने तभी तो इस वन का नाम रखा है 'प्रेमवन '।
मध्यप्रदेश के रीवा जिले के डभौरा कस्बे के पास धुरकुच गांव में रहते हैं दीनानाथ। दीनानाथ कोल आदिवासी हैं। दीनानाथ जंगलों को कटते देखते थे तो बड़े दु:खी होते थे। कुछ कर नहीं सकते थे तो सोचा कि जब वो काट रहे हैं, तो हम लगाने का काम क्यों ना करें। 1991 में पास ही के कोटा गांव में एक शादी समारोह के बाद उपयोग किये गये लगभग एक हजार आम की गुठलियों को दीनानाथ ने बीना।
दीनानाथ बोरे में भरकर गुठलियां ले आये और अपनी खेती की जमीन पर ही लगा दी पलिया (नर्सरी)। पलिया तैयार हुई, पौधे बनने लगे लेकिन सवाल वही कि ये पौधे लगेंगे कहां और हिफाजत करेगा कौन! दीनानाथ ने वन लगाने का विचार गांव वालों के बीच रखा लेकिन गांव वालों ने न केवल इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया बल्कि उन्हें पागल भी करार दे दिया।
लेकिन दीना पर तो जैसे वन लगाने का जुनून ही सवार था। उन्होंने पहले अकेले और बाद में अपनी पत्नी ननकी देवी के साथ मिलकर वन विभाग की जमीन पर बाड़ लगाना शुरू किया। उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम था, पत्थर एकत्र करना और उसकी बाड़ बनाना। इधर नर्सरी में लगे पौधे बढ़ रहे थे, उधर दीना की बाड़ भी बढ़ रही थी। धीरे- धीरे कर दीना और ननकी ने 50 एकड़ के जंगल में बाड़ लगा दी। अब बारी थी पौधे रोपने की। हजार के हजार पौधे रोपे गये। तीन तरफ पत्थर की बाड़ और एक तरफ लकड़ी की बाड़।
पेड़ तो लग गये लेकिन अब बचेंगे कैसे ? यानी सिंचाई कैसे होगी! दीनानाथ और ननकी ने अपनी पीठ पर पीपा बांधकर पास के तालाब से पौधों में पानी देना शुरू किया। खेती बाड़ी भी चल रही थी और जंगल लगाने का सपना भी मन में था।
पेड़ बड़े होने लगे और तभी वन विभाग को दीनाके इस प्रसंग की भनक लग गई। अब चूंकि जमीन वन विभाग की थी तो वन विभाग को दीना और ननकी का यह प्रयास अतिक्रमण लगा। परिणाम स्वरूप दीना को वन विभाग ने पकड़कर जेल के अंदर कर दिया। बाड़ तोड़ दी गई और कुछेक पेड़ भी उखाड़ दिये गये। तीन- चार दिन में जेल से छूटने के बाद दीना ने पत्नी ननकी के साथ मिलकर फिर से बाड़ सुधारी, पेड़ लगाये और पानी देने का सिलसिला चालू रखा।
वन विभाग को यह नागवार गुजरा और दीना को फिर जेल की हवा खानी पड़ी। इस बार वन विभाग दीना के साथ सख्ती से पेश आया, लेकिन दीना ने स्पष्ट कर दिया कि न तो मुझे जमीन चाहिये और न ही इन पेड़ों के फल। यह तो जनता का वन है। दीना फिर छूटे। नई ऊर्जा के साथ फिर शुरू हुये अपने जंगल को बढ़ाने। अपनी अदम्य इच्छा शक्ति और पत्नी के साथ की बदौलत दीना ने हार नहीं मानी। इसके बाद दीना ने दो- तीन बार और वन विभाग की कैद भोगी।
आज दीना के इस प्रेमवन में आम, आंवला, महुआ, जामुन, बेल, बांस, शीशम, कत्था, अमरुद और कठहल आदि लगभग सात हजार पेड़ लगे हैं। लगभग 200 एकड़ जंगल में फैले इस वन के प्रत्येक पौधे को अपने हाथ से लगाया और सींचा दीना व ननकी ने। दीना व ननकी की अपनी कोई संतान नहीं है तो उन्होंने पेड़ों को बच्चा मान लिया।
अपने पेड़ों को बचाने के संबंध में दीना कहते हैं 'एक- एक पीपा पानी लाकर बचाया है मैंने इसे। तीन बार कुंआ खना लेकिन वन विभाग ने तीनों बार कुंआ ढहा दिया। आप चाहें तो आज भी आधा कुंआ देख सकते हैं। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।'
वे इस पूरे प्रयास में अपनी पत्नी ननकी बाई को साधुवाद देते हैं। वर्ष 2002 में तत्कालीन रेंजर ने दीना के प्रयास को बारीकी से देखा और कहा कि वन विभाग के नुमाइंदें तो तनख्वाह पाकर भी जंगल कटने देते हैं। तुम तो अजीब पागल हो! फिर उन्हीं की अनुशंसा पर दीना को न केवल जंगल विभाग ने परेशान करना बंद किया बल्कि 900 रुपये मासिक पगार पर चौकीदार भी रख लिया। हालांकि दीना इसे वनविभाग की रणनीति मानते हैं कि मैं दूसरी जगह चौकीदारी पर लग जाऊंगा तो कम पेड़ ही लगा पाऊंगा। और वो मानते ही हैं कि उनकी रफ्तार कम भी हुई है।
आज इस प्रेमवन में हिरन, सांभर, नीलगाय और मोर स्वच्छंद विचरण करते हैं। गांव वाले भी आते हैं, फल खाते हैं लेकिन दीना का स्पष्ट आदेश है कि आम खाओ, महुआ बीनो लेकिन पेड़ मत काटो। वनाधिकार कानून पास होने की जानकारी दीना को तो है लेकिन वो कहते हैं कि मुझे इसका दावा नहीं करना है। मुझे तो जंगल बचाना था, जंगल बचा रहा हूं।
दीना ने विगत तीन वर्षों से एक भी नया पेड़ नहीं लगाया है। तीन सालों से सूखा जो पड़ रहा है। दीना तीन सालों में स्वयं भी मजदूरी करने जाते हैं। वह कहते हैं कि चाहे जो भी हो, लेकिन मैं पलायन नहीं करता हूं क्योंकि पलायन के लिये बाहर जाना पड़ता है और बाहर जाऊंगा तो फिर मेरे पेड़ों की रक्षा कौन करेगा। मेरे पेड़ सूख जायें, ये मैं सहन नहीं कर सकता।
इस साल नियमित पानी के अभाव में उनके 10 पेड़ सूख गये। पेड़ सूखने पर वे निराश हैं- 'जब पेड़ सूख गये तो भला मैं कैसे सुखी रह सकता हूं। मैं तो मरना पसंद करुंगा।' दीना कहते हैं कि मुझे यदि कुंआ खोद लेने दिया होता तो अभी तक दूना जंगल लगा देता। दीना ने सरपंच व जनपद पंच का चुनाव भी लड़ा ताकि जीतकर वे उस जमीन पर कुंआ खुदवा सकें।
आज गांववालों के बीच में दीना और ननकी का अलग स्थान है। गांव वाले भी इनके कद्रदान हैं। समाज चेतना अधिकार मंच के रामनरेश व सियादुलारी कहते हैं कि प्रेमवन की महत्ता गांववालों के बीच इतनी है कि यहां पर बने स्वसहायता समूह का नाम भी महिलाओं ने प्रेमवन स्वसहायता समूह रखा है।
वैसे तो दीना महज तीसरी तक पढ़े हैं और ननकी बाई निरक्षर, लेकिन अपने प्रेमवन से वनविभाग को आईना दिखाते हुये, धुरकुच जैसे छोटे से गांव से दुनिया को संदेश दे रहे हैं कि धरती बचानी है तो अपने से शुरू करो। केवल बहस मुबाहिसों से कुछ हासिल नहीं होगा। (रविवार.comसे)

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष