October 15, 2008

अनकही


तमसो माँ ज्योतिर्गमय

-रत्ना वर्मा

अक्टूबर का यह महीना नवरात्र, दीपावली, दशहरा तथा ईद जैसे कई त्योहारों को लेकर आया है, लेकिन साथ में बाढ़ जैसी आपदा, आतंकवाद का खौफ और कमरतोड़ मंहगाई भी आई है। ऐसी आपदा की घड़ी में जब चारों ओर दीपावली के पटाखों की आवाज नहीं, दीयों की जगमग रोशनी नहीं बल्कि बम के धमाकों का शोर और उसके धुएं की कालिख नजर आ रही हो, समझ नहीं आ रहा है कि हम कैसे उमंग और उल्लास की बात करें? क्या सिर्फ इसलिए कि ऐसा हमारी संस्कृति में कहने की परंपरा रही है? नहीं, दरअसल बात कुछ और ही है। हमारे पूर्वजों की बनाई परंपराओं के पीछे ऐसी मुश्किल की घड़ी में धैर्य न खोने का एक संदेश छिपा होता है। अत: गंभीरता से सोचने के बाद यही समझ में आ रहा है कि हमारे इन त्योहारों का उद्देश्य मनुष्य को निराशा, तनाव, चिंता और परेशानी, जो कि मानव जीवन का अनिवार्य अंग है, जैसी कमजोर करने वाली प्रवित्तियों से मुक्त करने के लिए ही है।

यह तो हम सभी जानते हैं कि हमारे सभी पर्व तथा त्योहार प्रकृति और कृषि से जुड़े होते हैं क्योंकि जीवन चक्र इसी धुरी में घूमता है। तुलसीदास जी ने भी कहा है कि वर्षा विगत शरद ऋतु आई... बारिश की समाप्ति पर ये त्योहार मानवता के सबसे सुंदर अंग को रेखांकित करने, ऊर्जा का संचार करने आते हैं, जिससे मनुष्य बुराईयों को त्याग कर अच्छाईयों की ओर बढ़ सके। बारिश के दिनों में बाढ़ जैसी आपदाएं विनाश लेकर ही आती हैं । बरसात और बाढ़ की इसी विभिषिका से त्रस्त मानव मन की पीड़ा के उपचार स्वरुप दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों से जनमानस को उल्लासित करने की परंपरा सदियों से रही है। इन अवसरों पर हम घर की साफ- सफाई करके न सिर्फ घर की गंदगी और कूड़े को बाहर निकाल फेंकते हैं वरन अपने दिल और दिमाग में जमे कूड़ा- करकट को भी बाहर फेंककर स्वच्छ मन से नई ऊर्जा के साथ जिंदगी में उजाला और रंग भरने की कोशिश करते हैं।
इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि हम इन त्योहारों में भी ज्वलनशील पदाथोंं का उपयोग दियों, फुलझड़ी, पटाखों और अनारों के रुप में मनोरंजन के लिए करते हैं, और आतंकवादी भी इन्ही ज्वलनशील पदार्थों का उपयोग मानवता के विनाश के लिए कर रहे हैं। इस बदलती फिकाा को खौफ तथा आतंक से राहत दिलाने और मनुष्य के टूटते मनोबल को बचाए रखने के लिए ही सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ प्रकाश सिंह ने कहा भी है कि- आतंक की घटनाएँ सिफऱ् तैनाती से नहीं रुक सकतीं. इसके लिए देश में माहौल को बदलना होगा । यह बिल्कुल सच है कि इस समय हमें अपना मनोबल ऊंचा रखने के लिए माहौल बदलना होगा । साथ ही जरूरी है कि सिर्फ खोखली बातें न करें बल्कि कोई कारगर कदम उठाएं। अगर हम अपने को शक्तिशाली देश कहते हैं तो फिर इस आतंक से क्यों नहीं निपट सकते?

इस समय जबकि हमारा देश बम विस्फोटकों का आग में जल रहा है । लगभग सभी बड़े शहरों में गत दो- तीन वर्ष से हो रहे सिलसिलेवार बम धमाकों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं। चारो ओर एक भयावह सन्नाटा सा पसर गया है । शक्ति की प्रतीक मां दुर्गा की आस्था में डूबे हुए हम सब लगातार हो रहे इन धमाकों और दुर्घटनाओं से सहमे हुए हैं, फिर भी त्योहारों का स्वागत कर रहे हैं। तभी तो कहते हैं कि मनुष्य के अंदर एक ऐसी शक्ति है, कि वह किसी भी तरह की मुसीबत का सामना करने को हमेशा तैयार रहता है।

ऐसे विध्वंसात्मक, विनाशकारी परिस्थितियों के बीच अपने सभी पाठको को दीपावली की शुभकामना देते हुए मन में यह भी कामना है कि हम अपने समाज को आतंकवाद से मुक्त करने में सफल हों। क्योंकि हमारे इन त्योहारों का उद्देश्य ही यही है कि वह हमें इस प्रकार की परेशानियों से मुक्ति दिलाए। हम भारतीय आस्थावान होते हैं, वह आस्था चाहे ईश्वर के प्रति हो चाहे प्रकृति के प्रति, हम कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं कि वह हमें धन- धान्य से भरपूर करे और खुशियां दे।


1 Comment:

Unknown said...

bahut achha ank nayapan liye huve rachnaon ko padhna achcha laga.
ank main vividh vishay ko shamil kiya gaya hai. chhattisgarh ki kala sanskriti ki jhalak poore ank main dikhai di. khaskar hatha dene vaala lekh. hamaari chhattisgarh ki lokparampara ko aaj ki yuvapeedhi jaane aur samjhe ki yahan ki paramparayein kitni samriddh hain .is tarah ke lekh lagatar aane chahiye taaki desh ke sabhi pradeshon mei iski apni pahchan bane .badhai ho.

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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