October 15, 2008

लघु कथाएँ

अंधेरा- उजाला

-फज़ल इमाम मल्लिक
1
उसे अँधेरों से नफऱत थी। वह हमेशा उजालों के बीच रहता.... घरों के दरो-दीवार भी रातों में रोशन रहते.... अँधेरों को वह अपने पास फटकने नहीं देता.....।

पर एक दिन अचानक ही जब उसकी नजऱ अपने भीतर गई तो वह सकते में रह गया.... भीतर अँधेरों का साम्राज्य था.....।

2
अँधेरा उसका मुक्कदर बन चुका था... तंग और तारीक गलियों में उसने आँखें खोलीं और फिर अँधेरे ने उसका साथ नहीं छोड़ा...। उजाले की चाहत उसे भी थी और जब भी वह उजालों की तरफ़ हाथ बढ़ाता, अँधेरा उसके हाथ आता....।

मायूसी और निराशा उसे रोज़ परेशान करती। हालाँकि अँधेरे उसे अब डराते नहीं थे लेकिन उजाले की ललक अब भी उसके अंदर कहीं कौंधती। और एक दिन अचानक उसकी नजऱ अपने भीतर पड़ी तो वह हैरतज़दा रह गया.... उसके भीतर उजालों की एक दुनिया आबाद थी....।


कम्पन
- राम पटवा

अखबार का मुख पृष्ठ। शहर के एक पटाखे की फैक्टरी में भीषण आगजनी।
देर से प्राप्त समाचारों में 45 मृत 23 हताहत।
सेठजी का मुख्यमंत्री / केन्द्राय मंत्रियों से फोन पर विशेष चर्चा।
राजधानियों से जिलाध्यक्ष को तत्काल स्थिति नियंत्रण के आदेश।
सेठजी का लडक़ा गिरफ्तार।
सेठ जी सुबह की प्लेन से दिल्ली रवाना।
दूसरे दिन मृतकों के परिजनों को मुख्यमंत्री सहायता कोष से
10-10 हजाकर रुपयों की आर्थिक सहायता राशि की घोषणा।
मृतकों में 24 बच्चे 13 युवतियां एवं 8 पुरष।
तीसरे दिन फैक्टरी में तालाबंदी।
सेठ जी का लडक़ा जमानत पर रिहा।
जब भी दीवाली आती है और पटाखे की गूंज पुरे शहर में गूंजने लगती है उन मृतकों के परिवारों में आज भी एक कम्पन उनके स्मृतियों में जाग जाती है, और उनकी आंखों के सामने आंधेरा छा जाता है।

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