October 04, 2008

अनकही : ...पीने को एक बूंद भी नहीं

हममें से अधिकांश के लिए प्रलय सिर्फ एक भयावह कल्पना थी। लेकिन पिछले माह जो कुछ कोसी नदी ने बिहार में किया उसने प्रलय को दिल दहलाने वाला यथार्थ बना दिया। एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कविता की पंक्तियां हैं -
water, water everywere,
but not a single drop to drink....
(चारो ओर जल ही जल, परंतु पीने को एक बूंद भी नहीं)
यह स्थिति थी दो- तीन हफ्ते तक चालीस से पचास लाख तक की जनसंख्या और अनगिनत पशुओं की हमारे देश के सबसे गरीब और पिछड़े क्षेत्र में ।
यह न सिर्फ स्वतंत्र भारत की सबसे विशाल और सबसे विकराल राष्ट्रीय आपदा है बल्कि हमारे लिए राष्ट्रीय शर्म की बात भी है क्योंकि कोसी की प्रलयंकारी विनाशलीला प्राकृतिक प्रकोप न हो कर एक मानव निर्मित आपदा है जिसे हवाई सर्वेक्षणों और हजारों करोड़ों की सहयता राशि के (अधिकांश खोखले) उद्घोषों के शोर में दबा दिया जाता है। जग जाहिर है कि आपदा के समय केन्द्रीय और प्रादेशिक सरकारों द्वारा आर्थिक सहायता की घोषणाएं करने की जो होड़ लग जाती है उनमे से आधिकांश कार्यान्वित नहीं होती जो थोड़ी बहुत कार्यान्वित होती भी हैं तो आपदा के कई वर्षो बाद। 2007 में बिहार में आई भयंकर बाढ़ के संदर्भ में केन्द्रीय सरकार ने जिस सहायता राशि की घोषणा की थी वह रीशि अगस्त 2008 तक बिहार को उपलब्ध नहीं हुई थी।
परहित सम धरम नहिं भाई जैसे मानवीय धर्म के अनुयायी हम इतने संवेदनहीन कैसे बन गए कि बिहार के प्रलय के संदर्भ में भी प्राथमिकता राजनैतिक रोटियां सेंकने को ही दी जा रही हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि आंकड़ों के खेल से निर्मित आर्थिक समृद्धि की चकाचौंध में वे सामाजिक मूल्य ही हमारी आंखों से ओझल हो गए हैं जो विश्व में हमारी सभ्यता और संस्कृति के मार्गदर्शी सिद्धांत रहे हैं। इसका दुखद और अमानवीय परिणाम है कि परमार्थ और जनकल्याण वर्तमान सोच से लुप्त हो चुके हैं। अह्म, अहंकार और मूल्यहीन व्यक्तिवाद आज के सिध्दांत बन गए हैं। नतीजा है भारत में भ्रष्टाचार शिष्टाचार का पर्याय बन गया है और हमारा देश विभिन्न अराजक दलों और आतंकवादियों का अभयारण्य। ऐसे माहौल में यदि उच्चतम न्यायालय को भी यह कहना पड़ गया कि इस देश का भगवान ही भला कर सकते हैं तो क्या ताज्जुब। उनका ऐसा कहना इसलिए भी लाजमी लगता है क्योंकि जिस देश में जान- माल के नुकसान को कम करने से संबंधित एक विधेयक पिछले 33 साल से लंबित हो वहां भगवान ही कुछ करिश्मा दिखा सकते हैं। उक्त विधेयक केंद्र की ओर से सुझाए गए उन उपायों से संबंधित है जिससे बाढ़ के कारण होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। बिहार और असम जैसे राज्य में, जहां हर साल बाढ़ से भारी तबाही होती है में इस विधेयक को आज तक लागू नहीं कर सकने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? मणिपुर और राजस्थान को छोडक़र अब तक किसी भी राज्य ने माडल बिल आन फ्लड प्लेन जोनिंग को कानूनी रूप नहीं दिया है। क्या बाकी राज्य भी इस तरह की किसी आपदा का इंतजार कर रहे हैं। जिस तेजी से मानव निर्मित आपदाएं अपना रंग दिखा रहीं हैं उससे तो नहीं लगता कि ज्यादा दिन उन्हें इंतजार करना पड़ेगा।
यह तो हमारे देश की रीति नीति ही बन गई है कि जब पानी सर से ऊपर गुजर जाता है तब कहीं जा कर उसे रोकने के प्रयास आरंभ होते हैं। तभी तो अब बिहार सरकार ने कोसी नदी के पूर्वी तटबंध में 18 अगस्त को हुई टूट या कटाव के कारणों की न्यायिक जांच का फ़ैसला किया है। यह जांच हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश करेंगे जिन्हें छह महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने कहा जाएगा। जांच के जिन पहलुओं पर गौर किया जाएगा उनमें प्रमुख है कि क्या सरकारी अधिकारियों अथवा अभियंताओं की लापरवाही के कारण ये बांध टूटा, वर्ष 1990 से 2005 के बीच तटबंध की मजबूती के लिए तत्कालीन सरकार के स्तर पर क्या कदम उठाए गए, केंद्र सरकार ने इस संबंध में राज्य सरकार की कितनी सिफारिशों पर अमल किया। तात्पर्य यह कि जांच के बहाने भी राजनीति।
लेकिन फिर भी इन सबसे परे मानवीयता तो यही कहती है कि जिस राज्य में मानव निर्मित इस प्रलय से मरने वालों की संख्या सैकड़ों में हो तथा जहां लाखों लोग विस्थापित हो गए हों, वहां उन्हें फिर से सबल बनाने के लिए उतने ही लाखों लोगों को आगे आना होगा। हमारे समाज में अधिकांश ऐसे मनीषी हैं जिनके हृदय करुणा और परोपकार की भावनाओं से लबालब हैं। मैं ऐसे नागरिकों से विनती करती हूं कि देश की इस विनाशकारी आपदा की घड़ी में हमारे संकट ग्रस्त बिहारी भाई- बहनों की सहालायता के लिए आगे आएं । सहायता राशि चेक या ड्राफ्ट से सीधे चीफ मिनिस्टर रिलीफ फंड, चीफ मिनिस्टर सेक्रेटेरियट, 4 देशरत्न मार्ग, पटना- 800001 को भेजी जा सकती है या बैंक शाखाओं से चीफ मिनिस्टर रिलीफ फंड, खाता सं. 10839124928, भारतीय स्टेट बैंक, पटना सेक्रेटेरियट ब्रांच में भी इलेक्ट्रानिक माध्यम से ट्रांसफर की जा सकती है।
इस जल- प्रलय में घिरे लाखों बिहारी भाई- भहनों को भूख और रोगों की विभीषिका से बचाना हमारा उत्तरदायित्व और मानवीय धर्म है।
रत्‍ना वर्मा

1 Comment:

shriya said...

udanti ka naya edition padha .bahut achha laga.chhattisgarh ke liye yah bahut bada saugat lekar aayi hai udanti.com.iski dhaara yun hi pravahit hoti rahe tatha iski khoobsoorti ase hi din badin badhti rahe ,aisi shubhkamna hai...........

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष