October 15, 2008

पुस्तकें/ ई- लाईब्रेरी

किताबों की बदलती दुनिया

- नीरज मनजीत

क्या आनेवाले वर्षों में बड़े-बड़े पुस्तकालय और किताबें इतिहास की वस्तुएं हो जाएंगी? बदलती दुनिया के साथ पारंपरिक किताबें जिस तेजी से इलेक्ट्रॉनिक पृष्ठों में ढलती जा रही हैं उससे तो यही लगता है कि हां, अगले सौ-पचास वर्षों में ऐसा हो सकता है। इंटरनेट पर उपलब्ध सर्च इंजनों ने दुनिया भर की जानकारी जिस तरह से नेट पर समेट दी है, उसने इन्साइक्लोपीडिया की भारी- भरकम किताबों को वैसे ही मैदान से बाहर कर दिया है। हर जानकारी हर फोटोग्रॉफ सिर्फ माऊस की क्लिक की दूरी पर है जिसे आसानी से कहीं भी डाऊनलोड किया जा सकता है। नियमित-अनियमित छपनेवाली तमाम व्यवसायिक-अव्यवसायिक पत्रिकाएं और समाचार-पत्र इंटरनेट पर पढ़े जा सकते हैं। वो दिन भी दूर नहीं जब किसी लेखक के उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह या जीवनी कथा को एक चिप में डालकर दिया जाने लगेगा। लैपटॉप, कम्प्यूटर और यहां तक कि वाइडस्क्रीन सेलफोन पर किताबें पढ़ी जाने लगेंगी। यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया के अधिकांश नेट यूजर्स अखबार और पत्रिकाएं नेट स्क्रीन पर ही पढ़ते हैं। भारत में भी यह चलन अब शुरू हो चुका है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या स्क्रीन पर चमकते हुए इलेक्ट्रॉनिक अक्षर छपे हुए शब्दों जैसा प्रभाव हमारे मानस पर छोड़ पाएंगे?

इलेक्ट्रॉनिक पृष्ठों पर किसी उपन्यास या कहानी का भावभीना प्रसंग क्या हमारे अंतर्मन में वैसा ही उतर पाएगा जैसे छपे हुए पृष्ठों पर बहती संवेदनाएं हमारे बिंधे मन पर नर्म फाहा रखती हैं। क्या इलेक्ट्रॉनिक संसार से आई कोई कविता हमारे जज्बात को वैसा ही स्पर्श कर पाएगी जैसी हल्की- सी छुअन हम किसी किताब में कविता पढ़ते वक्त महसूस करते हैं? क्या किसी ब्लॉग के विचार हमारे जेहन को वैसे ही झकझोर पाते हैं जैसा पुस्तक के पृष्ठों में किसी लेख को पढक़र हम अनुभव करते हैं? हमारी पीढ़ी के किसी पुस्तक प्रेमी से यदि आप ये प्रश्न करेंगे तो उनका उत्तर होगा - नहीं, कतई नहीं। भारतीय संस्कृति और परंपराओं के बरअक्स इन सवालों को देखें तो किताबों या ग्रंथों के बगैर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वेदों की ऋचाओं, उपनिषदों के श्लोकों और पुराणों की मिथक-कथाओं में ज्ञान का जो अजस्र स्त्रोत प्रवाहित हुआ है उसी ने भारत को विश्व गुरू का दर्जा दिलाया है। हस्तलिखित या छपे हुए पृष्ठ भारतीय मानस का एक अभिन्न अंग हैं। पुस्तकें हमें संस्कारशील और सुसंस्कृत बनाती हैं। पुस्तकों को लेकर ऐसा पवित्र-भाव किसी और देश में दिखाई नहीं पड़ता।

हमारे विद्वानों ने यदि ग्रंथों में संचित ज्ञान को आत्मसात करके मानव समाज को समृद्ध करने का मार्ग प्रशस्त किया है तो एक सामान्य अनपढ़ मनुष्य ने ग्रंथों की स्तुति करके ही संस्कारित होने का प्रयत्न किया है। रामचरित मानस, कुरान, ग्रंथ साहब और बाइबल -इन पवित्र किताबों ने ही भारतीय मानस को निर्मित किया है। सिखों के दशम गुरू गोविंद सिंह ने तो ग्रंथ साहब में समकालीन महापुरूषों की वाणियां संकलित करके उसे ही गुरू का दर्जा देकर गुरू प्रथा पर विराम लगा दिया था। किताबों के प्रति आस्था का इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है? लैपटॉप या नेट के चमकते अक्षरों में सिर खपाने में वो आनंद कहां जो पालथी मारकर अखबार या पत्रिका पढऩे में है।

आरामकुर्सी पर अधलेटे किसी कहानी या उपन्यास का रस लेने और कम्प्यूटर के सामने बैठकर ई-पृष्ठों में उतरने में कितना बड़ा फर्क है, यह युवा पीढ़ी का कोई नौजवान नहीं बता सकता। इसके बावजूद यदि नई पीढ़ी पठन-पाठन का अपना एक अलग तौर-तरीका विकसित कर रही है तो उन्हें दोष देना ठीक नहीं होगा। संभव है कि वे हमें वैसे संस्कारशील न लगें जैसे हम खुद को या भारतीय जन मानस को मानते हैं। संभव है कि इलेक्ट्रॉनिक पृष्ठ उनके आधुनिकता बोध को सहलाते हों। पर एक बात तय है कि नई पीढ़ी खुद को छपे हुए शब्दों की अपेक्षा ई-अक्षरों के ज्यादा नजदीक पाती है। साथ ही यह भी महसूस किया जा रहा है कि इन ई-अक्षरों की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं की परिभाषाएं भी बदल रही हैं। संभव है कि शब्दों के पीछे छिपी जिन संवेदनाओं को हमारी पीढ़ी शिद्दत से अनुभव करती है, वो संवेदनाएं उन्हें बिल्कुल भी स्पर्श नहीं कर पातीं। नई पीढ़ी की दुनिया हमारी दुनिया से निश्चय ही अलग है। वैसे ही जैसे हमारी दुनिया हमसे पहली पीढ़ी से अलग थी, किंतु बदलाव में पीढिय़ों के बीच विभाजन रेखाएं नहीं खिची थीं। पुरानी पीढ़ी धीरे-धीरे पुरानी होती थी और नई पीढ़ी धीरे-धीरे नई। अब हर पांच- दस साल में परिवर्तन का एक नया दौर शुरू हो जाता है। मसलन इंटरनेट ने नई पीढ़ी के सोचने के तौर-तरीके बदले, फिर सेलफोनों की नई रेंज इस पीढ़ी को बदल रही है।

बदलाव की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। दुनिया के सारे देश एक-दूसरे के करीब आए हैं तो संस्कृतियां भी एक-दूसरे के मानस को गहराई तक प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद भारत में किताबों की महत्ता कम नहीं होगी। आज से सौ बरस बाद भी हमारे आधुनिक पुस्तकालयों में हमें किताबें पढ़ते हुए लोग मिल जाएंगे।

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