-विजय जोशी,
पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)
जीवन में कर्म के पथ पर हमारा प्रयास शीघ्रातिशीघ्र
सफलता प्राप्त करने का होता है। पर इसमें अनेक बार अवरोध भी अनिवार्य हैं, जिनका प्रयास हमारे मनोबल को तोड़कर हमें विफलता की ओर धकेलने का होता है।
ऐसे पलों में हमारा प्रयास तो होना चाहिए बगैर धैर्य खोए समस्या के समाधान का,
लेकिन यह इतना आसान भी तो नहीं है। मुसीबत के समय हम अमूमन बहुत
जल्दी घबरा कर धैर्य खोने लगते हैं तथा इस तरह समस्या से पार पाने की क्षमता खो
देते हैं।
एक
बार एक शिक्षक ने इस दिशा में प्रयोग के अंतर्गत छात्रों को स्वादिष्ट टॉफी देते
हुए कहा कि दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद ही इसे छूना है और यह कहते हुए वे बाहर
चले गए। कक्षा में सन्नाटा छा गया। टॉफी की सुगंध सर्वत्र व्याप्त थी। खुद को रोक
पाने का हर पल कठिन लग रहा था। समय समाप्ति पर जब शिक्षक कक्षा में वापिस लौटे तो
पाया कि केवल सात ऐसे छात्र थे जिन्होंने टॉफी को छुआ तक न था। शेष सब स्वाद, सुगंध एवं रंग की चर्चा में
व्यस्त थे। शिक्षक ने जिनका नाम प्रोफेसर वाल्टर था सातों के नाम अपनी डायरी में
लिख लिए।
कुछ
वर्षों बाद प्रोफेसर ने जब उन सात छात्रों के बारे में जानकारी एकत्र की तो पता
चला कि वे सब अपने अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर चुके थे, जबकि शेष सब एक आम आदमी का जीवन जीते हुए कठिनाइयों से बावस्ता थे।
अब
प्रोफेसर वाल्टर ने ने जो निष्कर्ष निकाला वह अद्भुत था और वह यह कि जो आदमी अपने
जीवन में दस मिनट तक भी धैर्य नहीं रख सकता वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इस शोध को
मार्श मेलो थ्योरी के नाम से शोहरत प्राप्त हुई, क्योंकि
प्रोफेसर वाल्टर ने छात्रों को जो टॉफी दी थी उसका नाम मार्श मेलो था।
बात
का निष्कर्ष मात्र इतना है कि धैर्य का गुण आदमी के सहन करने की सीमा को सहनशक्ति
में परिवर्तित कर देता है, जिसके कारण वह कठिन से कठिन
परिस्थिति में भी निराश या विचलित नहीं होते हुए एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता
है।
यदि बाधाएँ मिलीं हमें तो उन बाधाओं के ही साथ, जिनसे बाधा बोध न हो वह सहनशक्ति भी आई हाथ।
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