February 12, 2019

कला की रूपरेखा

कला की रूपरेखा
कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी के जीवन किस्सों से भरा पड़ा है। उनकी सहृदयता और दूसरों की मदद करने के किस्सों में यह सबसे मशहूर किस्सा है।  उनका चिंतन जीने और जिलाने की कला को श्रेष्ठ कला मानता था। ये ऐसा ही एक किस्सा है।
एक बार मद्रासी युवक निराला जी से चादर मांगकर ले गया। निराला जी के मित्र पाठक जी ने कहा, ''यह (आदमी) आपकी चादर वापस नहीं करेगा। अभी दोपहर को गुदड़ी बाजार में आठ आने में बेच आएगा। निराला जी ने प्रतिवाद किया, ''हो सकता है, और इसकी बात भी सच हो सकती है। मद्रासी यह सोचकर अपने गांव से नहीं चला होगा कि मांगी हुई चादर गुदड़ी बाजार में बेचेगा।'' निराला जी की अंतर्दृष्टि ने धोखा नहीं खाया। चादर वापस गयी।
दो महीने बाद वही मद्रासी युवक कांग्रेस के अधिवेशन की भीड़भाड़ में दूर से ही ऊंचे कदवाले अपने उस दाता को पहचान लेता है, दौड़कर वापस आता है, टूटी-फूटी हिंदी में अपना परिचय देता है। उसे कांग्रेस अधिवेशन में कुछेक दिनों के लिए स्वयंसेवक का धंधा मिल गया था।
वॉलंटियर की वर्दी में दोनों हाथ उठाकर युवक ने हर्षध्वनि की और लड़खड़ाती जुबान में कहा, मैं वही हूं जिसे आपने इलाहाबाद में चादर दी थी। निराला को लगा कला का जीवित रूप उनके सामने खड़ा है। उन्हें अपार हर्ष हुआ।
फिर मिला युवक और मांगी मदद
दो चार रोज बाद वह युवक फिर दिखाई दिया। अबकी उसने कहा, गरमी बहुत पड़ने लगी है। देश जाना चाहता हूं। रेल का किराया कहां मिलेगा। पैदल ही जाना पड़ेगा।
निराला ने पूछा, ''कांग्रेस वाले क्या आपकी इतनी मदद नहीं कर सकते ?''
उसने कहा, '' नहीं, कांग्रेस का ऐसा नियम नहीं है। मैं मिला था। मुझे यही उत्तर मिला। खैर, मैं भीख-मांगता खाता पैदल चला जाऊंगा। अपने नंगे पैरों की ओर देखकर बोला, ''पर गरमी बहुत पड़ रही है। पैरों में फफोले पड़ जाएंगे। अगर एक जोड़ी चप्पल आप ले दें।''
निराला की छाती फट गयी यह सुनकर। उन्होंने लिखा,''मैं लज्जा से वहीं गड़ गया। मेरे पास तब केवल छह पैसे थे। उतने में चप्पल नहीं सकती थी। अपनी चप्पलें देखीं, घिसी पुरानी थीं। लज्जित होकर बोले- आप मुझे क्षमा करें, इस समय मेरे पास पैसे नहीं हैं।
इसके बाद मद्रासी युवक वीर-भाव से निराला को देखने लगा, फिर बड़े भाई की तरह उनसे आशीर्वाद लिया और मुस्कुराकर अमीनाबाद की ओर चला गया। निराला ने इस समूची घटना को लिखा और उसका शीर्षक दिया ''कला की रूपरेखा'' क्योंकि उनका चिंतन जीने और जिलाने की कला को श्रेष्ठ कला मानता था। 
(साभारः नया ज्ञानोदय, मार्च, 2017;भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन)

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष