February 12, 2019

प्रेरक

कुँए में मत कूदो!
 -निशांत मिश्रा
आप जब छोटे थे तब आप ऐसे बहुत से काम करना चाहते थे जो आपके माता-पिता या शिक्षकों को पसंद नहीं थे जब आप उन कामों को करने के लिए हठ करते तब आपसे यह कहा जाता था, 'अगर दूसरे लोग कुँए में कूद जायेंगे तो क्या तुम भी कुँए में कूद जाओगे?’
इस बात को कहने के पीछे उनका मतलब यह होता था कि बेवकूफी भरी या व्यर्थ की बातों को करने में कोई सार नहीं है, भले ही दुनिया भर के लोग उन्हें कर रहे हों।तर्कबुद्धि यह कहती है कि हमें हर कार्य को करने से पहले भली-प्रकार सोच विचार करना चाहिए और भेड़चाल में नहीं पडऩा चाहिए।
यह सही सलाह है भले ही इसे देनेवालों की मंशा कुछ और ही रहतीं हों। लेकिन एक दिन आप बचपने से उबरते हैं और सहसा आपके लिए सब कुछ बदल जाता है। लोग आपसे अचानक ही यह उम्मीद करने लगते हैं कि आप सुसंस्कृत वयस्कों सरीखा अर्थात उन जैसा बर्ताव करें। यदि आप उनके कहे पर नहीं चलते और अपना बचपना खोने को तैयार नहीं होते तो वे चकरा जाते हैं या खीझ उठते हैं। यह ऐसा ही है जैसे वे कहें, 'अरे भाई, सभी लोग तो कुँए में कूद रहे हैं! तुम काहे नहीं कूदते?’
हर दिन लोगों से बातचीत के दौरान और निर्णय लेते समय आपके सामने भी ऐसे अनेक कुँए आते रहेंगे-  लेकिन उनमें कूदने या नहीं कूदने के बारे में निर्णय केवल आपको ही लेना है ऐसे माहौल में आप पीछे हटकर अपने विकल्प स्वयं कैसे तलाश सकते है?
यह करके देखें-
1- पूछिए 'क्यों?’ - क्यों? यह एक अकेला शब्द ही बहुत शक्तिशाली और परेशान करनेवाला शब्द है। तीन साल के बच्चे तो इस प्रश्न का प्रयोग अक्सर करते हैं पर वयस्क इसे पीछे छोड़ देते हैं।'क्योंक्रांति के संवाहक बनें। हर किसी से 'क्योंपूछने की आदत डालें। खुद से भी पूछते रहें, 'क्यों?’
2-स्पष्ट करें- यह सब क्या है? आप वास्तव में क्या करना चाहते हैं और आपने उसे ही वरीयता क्यों दी है?
3-सरल करें- मिनिमलिस्म की पूरी अवधारणा ही सरलीकरण के इर्द-गिर्द घूमती है - जीवन को सादा व सरल रखते हुए अपने सपनों को पूरा करना। लेकिन सरलता का संबंध इस बात से नहीं है कि आपके पास कितने जोड़ी मोज़े हैं। इसका महत्त्व इस बात में है कि आपके उद्देश्य और संकल्प कितने स्पष्ट हैं।
4- अधिक करें- हाँ जी, अधिक करें, कम नहीं। जब आपको अपने वास्तविक आवेगों की जानकारी न हो और आप कुँए के भीतर झाँक रहें हों तब बेहतर यही होगा कि आप मुंडेर से दूर हट जाएँ और सब कुछ उधेड़ कर नए सिरे से शुरुआत करें। इसके विपरीत आपके जीवन में यदि सब कुछ पहले से ही शानदार चल रहा हो तो कुछ और चाहने की क्या गरज है?
यदि आप ऊपर चौथे बिंदु में कही गयी बात को समझ नहीं पा रहें हों तो यह करें-  कोई नई भाषा सीखें। किताब लिखें। यात्रा पर निकल चलें।  कलाकृतियाँ बनाना सीखें। कुछ ऐसा सीखें जो शायद ही कोई और कर सके- जैसे अंगारों पर चलना। अपने आपको स्वयंसेवक के तौर पर दर्ज कराएँ।
या फिर कुछ और करें जो आपके मन को अच्छा लगता हो। दुनिया बहुत बड़ी है और यहाँ करने को बहुत कुछ है। आपके सामने असल प्रश्न यह है-  कल सुबह जागने पर मैं दुनिया से कदम मिलाकर चलते हुए अपनी इच्छानुसार अपना जीवन कैसे जी सकूँगा?
हम लोगों में से ज्यादातर लोग बहुत सरल जीवन जीने के हिमायती नहीं हैं। हम सभी यह तो चाहते हैं कि हमारे जीवन में अवांछित तत्व नहीं हों पर हमें बड़े-बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक-दूसरे से जुडऩा पड़ता है। हम वे चीज़ें नहीं जुटाना चाहते जो हमारे काम की नहीं हों पर हमें सार्थक वस्तुओं के लिए व्यय करना ही पड़ता है। हम अपने सफल और उज्जवल भविष्य के लिए स्वयं में ही नहीं बल्कि औरों में भी निवेश करते हैं।
अपने भावी जीवन पर एक कठोर दृष्टि डालिए। कहीं आप कुँए के भीतर तो नहीं झांक रहे हैं? एक कदम पीछे हटकर तय करें कि आपके लिए क्या सर्वोचित है।
सब कुछ आप पर ही निर्भर करता है। (हिन्दी ज़ेन से)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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