June 11, 2018

जीवन दर्शन

जो बोएंगे सो काटेंगे
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
हम सब प्रतिध्वनि के चमत्कार से वाकिफ हैं. पहाड़ों के बीच खड़े होकर जब हम प्रकृति से बात करते है तो वह भी वैसा प्रत्युत्तर प्रदान करती है। अच्छा बोलेंगे तो अच्छा लौटेगा, बुरा बोलेंगे तो बुरा। यही जीवन है जैसी करनी वैसी भरनी, जो बोएंगे सो काटेगे, जो देंगे सो पाएँगे। कहा भी गया है बोए पेड़ बबूल का आम से कहाँ से होय। जीवन का इतना सरल सूत्र हमें स्वतः प्राप्त है, तो फिर उसका समुचित सदुपयोग न कर पाने से लाभ और हानि दोनों ही स्थितियों में हम ही रहेंगे।
  एक किसान एक बेकरी मालिक को मक्खन बेचा करता था। एक दिन मालिक ने अनायास तौल कर देखा तो पाया कि मक्खन की मात्रा तौल से कम थी। उसे क्रोध आया और उसने किसान के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर कर दी।
  न्यायाधीश ने किसान से पूछा- वह कौन से तौल का इस्तेमाल करता है।
किसान ने कहा - महोदय, मैं तो पुरातनपंथी हूँ। मेरे पास कोई तौल काँटा या बाँट नहीं हैं।
तो फिर कैसे मक्खन तौलते हो।
  किसान ने कहा- आदरणीय बेकरी मालिक ने मुझ से जब से मक्खन खरीदना प्रारंभ किया, उससे  काफी समय पहले से इनसे निजी उपयोग हेतु पाव रोटी या ब्रेड खरीदता आ रहा हूँ। हर दिन उसी ब्रेड को मैं तोल काँटे के रूप में उपयोग करता हूँ। अब निर्णय आपके हाथ में है।
  आगे की कहानी स्वतः स्पष्ट है। जीवन में जो हम देते हैं, वही लौटकर पुनः हमारे पास आता है। यही बड़ी सीधी सच्ची और अच्छी बात है. इसलिए हम जीवन में दूसरों से जिस चीज की भी प्राप्त की आकांक्षा रखते हैं, पहले उसे देने की क्षमता प्राप्त करते हुए देने की मानसिकता का विकास करना होगा। यही है प्रतिध्वनि का चमत्कारी, सरल और सहज सूत्र।
जीवन हो जौहरी सा
जीवन में परख की क्षमता एक वांछित गुण है। जब तक आदमी अपने व्यक्तित्व में अच्छा- बुरा, सच- झूठ इत्यादि को परख सकने की क्षमता विकसित नहीं करेगा शून्य बना रहेगा। किनारे पर बैठकर जीवन की गहराई नहीं नापी जा सकती। इसके लिए तो आपको गहरे उतर कर देश, काल, इंसान परिस्थिति के आकलन का ज्ञान तथा अनुभव दोनों ही अर्जित करना होगा।
    एक आदमी एक संत के पास गया और कहा कि उनकी सारी बातें बकवास हैं। मैं अनेकों के पास गया, लेकिन कुछ नहीं मिला। उनकी किसी बात में कोई सार नहीं मिला।
 संत ने निर्विकार भाव से कहा- कोई बात नहीं। बातचीत बाद में करेंगे, पहले मेरा एक काम कर दो। मेरा पास एक छोटा-सा पत्थर है। चाँदी सोने की दुकान पर जाकर यदि कोई इसके बदले एक सोने का सिक्का देने को राजी हो, तो बेच देना और वह राशि मुझे लाकर दे देना।
  निर्देशानुसार वह आदमी बाजार में अनेक दुकानों पर गया। पर कोई भी उसे एक सोने के सिक्के में लेने को राजी नहीं हुआ। वह आदमी लौट आया। यह तो बिल्कुल बेकार पत्थर है। इसे कोई लेना नहीं चाहता। आपने यह व्यर्थ का भार मुझे क्यों सौंपा.
    संत ने कहा- अब तुम की जौहरी की दुकान पर जाओ। पर बेचना मत। सिर्फ दाम पूछकर आ जाना। वह पुनः गया। सबसे पहला जौहरी ही पत्थर देखते ही उसे दस हजार सिक्के देने को तैयार हो गया तथा आग्रहपूर्वक पत्थर उसे ही बेचने को कहा।
   उसने लौटकर कहा- एक तो पूछता तक नहीं था और दूसरा दस हजार सिक्के तुरंत देने को तैयार था।
   संत ने कहा- मुझे भी पत्थर बेचना नहीं था। मैं तो तुम्हें सिर्फ यह अनुभव करवाना चाहता था कि जैसे हीरे की पहचान के लिए  जौहरी होना जरूरी है, उसी प्रकार संत को पहचानने के लिए ईश्वर भक्त होना जरूरी है।
  सारांश सिर्फ यह है कि हमें ऊपरी चमक दमक से ऊपर उठकर आदमी के अंतरतम को उसके गुणों को पहचानने की क्षमता का विकास अपने व्यक्तित्व में करना चाहिए। इससे न केवल स्वयं का व्यक्तित्व निखरेगा, अपितु सामने वाले को आपसे जुड़ाव के लिए  प्रेरित करेगा।
सम्पर्कः 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, 
E-mail- v.joshi415@gmail.com

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष