May 15, 2018

प्रेरक

एवरेज नहीं बनने के लिए आपको क्या करना होगा?
अपने भीतर के फाइटर को जगाना होगा
                              - निशांत शर्मा 
सुबह के 6 बज रहे हैं।
आपने रात को यह तय किया था कि आप 5 बजे उठोगे ,लेकिन सोते-सोते आपने अलार्म 5 के बजाय 6 बजे के लिए सेट कर दिया क्योंकि आपको अपने आप पर भरोसा नहीं था। खैर...
अलार्म बजने लगता है और आप इसे नींद में ही स्नूज़ कर देते हैं।
दस मिनट बाद यह फिर बजने लगता है और आप इसे दोबारा स्नूज़ कर देते हैं। आप इसे लगभग 3-4 बार स्नूज़ करते हैं और लगभग 7 बजे अनमने-से बिस्तर से उठ जाते हैं।
ब्रश करने के बाद आप अपने फ़ोन के नोटिफ़िकेशन्स चौक करते हैं और घड़ी 7.30 बजा देती है। आप झटपट नहाने के बाद जल्दबाजी में अपना ब्रेकफास्ट करते हैं।
ऑफिस जल्दी पहुँचने के लिए आपने कई रेड लाइट्स जंप कर दीं। आप रोज़ की तरह ऑफिस लेट ही पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही आपने काम इस तरह से करना शुरु किया जैसे कि आप ही सबसे ज्यादा बिज़ी व्यक्ति हैं।
काम करते-करते 30 मिनट हो जाने के बाद आपको लगने लगता है कि यह दिन भी हर दिन की तरह है और आप फ़ोन निकालकर फेसबुक खोलते हैं। आप ऊपर-नीचे स्क्रोल करते जाते हैं और बीच-बीच में अपना काम भी देखते जाते हैं।
इस सबमें कब लंच ब्रेक हो जाता है पता ही नहीं चलता। आप अपना लंच जल्दी फ़िनिश कर देते हैं, क्योंकि आपको किसी क्लाइंट से और अपने सुपीरियर से मिलना है।
आपको लगता है कि आप किसी एक से ही मिल पाएँगे। ऐसे में आप क्लाइंट को फ़ोन करके कह देते हैं कि आप बिज़ी हैं और आज उससे नहीं मिल सकते। आपने उसे यह कहा कि आप वह काम कर रहे हैं ,जो आप असल में 3 दिन बाद करेंगे।
इस बीच आप अपने मैनेजर से मिले। वह भी आपकी तरह ही लेट आया।
चूँकि आप अपना टाइम वेस्ट नहीं करना चाहते; इसलिए आप अपने वॉट्सअप में लग गए।
कुछ काम, कुछ सोशल मीडिया, कुछ वेब ब्राउज़िंग, यही सब करते-करते शाम के 7 बज जाते हैं। अब घर जाने का वक्त है और आप अपनी बाइक या कार स्टार्ट करके निकल पड़ते हैं।
ट्रेफिक में आधा-एक घंटा खपने के बाद घर पहुँचते हैं। टीवी देखते वक्त खाना खाते हैं। देर रात तक टीवी देखते हैं।
सोने जाते हैं; लेकिन फोन पर कुछ-न-कुछ चैक करते कहते हैं. ठीक से सो नहीं पाते। आधी रात फिर फोन देखने लगते हैं। रात-बेरात किचन में पहुँचकर कुछ खा लेते हैं। फिर सोकर सुबह उनींदे उठते हैं।
यह चक्र रोज़ चलता है।
यह 10 में से 8 लोगों की ज़िंदगी का सच है। यह हर एवरेज व्यक्ति की ज़िंदगी है।
तो क्या बाकी के 2 लोग उनसे बेहतर ज़िंदगी जी रहे हैं? क्या वे किसी कंपनी के CEO या MD हैं? क्या वे दूसरों से ज्यादा काम करते हैं?
वे 2 व्यक्ति भी हमारी तरह ही हैं। लेकिन वे कुछ और भी करते हैं। और जो कुछ भी वे हमसे अलग करते हैं उससे वे एबव  एवरेज नहीं बनते,बल्कि स्मार्ट या जीनियस बन जाते हैं।
अलार्म बजने से पहले जाग जाइए। कुछ योगा-शोगा कीजिए। यदि ऑफीशियल काम में एक्सीलेंस लाने और इंस्टाग्राम में फ़ोटो चैक करने के बीच चुनाव करना हो, तो वह चुनिए जो आपकी जगह कोई जीनियस व्यक्ति चुनेगा।
जो कुछ भी करना आपके लिए ज़रूरी है उसे आपको करने देने से रोकने वाली कोई महीन टेंडेंसी, कोई छोटा सा लालच आपको एवरेज ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर रहा है।
जीनियस आपके भीतर का वह फ़ाइटर है जो आपको एवरेज नहीं होने देता।
तो, एवरेज नहीं बनने के लिए आपको क्या करना होगा?
अपने भीतर के फ़ाइटर को जगाइए। फ़ाइटर बनिए। जीनियस बनिए।
ऐसा मुरली कृष्णा एन. ने क्वोरा पर लिखा था। मूल पोस्ट में फ़ाइटर की जगह बैडएस (badass) शब्द का प्रयोग किया है। पॉपुलर/सब-कल्चर में बैडएस उस शख्स को कहते हैं जिसमें भरपूर एट्टीट्यूड, डेयरिंग, और (शायद कुछ) कमीनापन होता है? (हिन्दी ज़ेन से)

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