February 23, 2018

परवरिश

बच्चों के प्रति हमारी
 बढ़ती जिम्मेदारी
-ज्योतिर्मयी पंत
जीवन में बचपन ही वह समय होता है जब खेल- कूद, मौज -मस्ती  और निश्चिन्तता  रहती है इसी समय बच्चों का शारीरिक -मानसिक विकास होता है, संस्कारों और आदतों की नींव पड़ती है। परन्तु भौतिक वाद, और बाजारवाद के युग में  सबसे अधिक पर बचपन पर ही पड़ा हैं। यह बचपन छीन ही  चुका है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। बचपन की स्वच्छंद मौज- मस्ती से अनजान से बच्चे अब दो ढाई साल से ही  प्ले -स्कूल और नर्सरी में अनुशासन- बद्ध हो रहे हैं और फिर बस्तों के भारी बोझ तले दबते हुए भावी जीवन यात्रा में शामिल हो रहे हैं।
इतना ही नहीं अब वे निरंतर पढ़ाई, सबसे आगे रहने के तनाव से भी परिचित हो गए हैं और कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
आजकल हर दिन बच्चों की समस्याएँ बढती ही जा रही हैं। अखबारों और मीडिया में अक्सर ख़बरें होती हैं। कहीं किसी बच्चे ने आत्म हत्या कर ली, कहीं बच्चे घर छोड़कर भाग गए या चोरी करते हुए पकड़े गए ,कहीं अपहरण हो रहे हैं। अब तो स्कूलों में तक छोटे बच्चों के साथ यौन शोषण और उनकी हत्याएँ भी होने लगी हैं।
 कुछ समय पूर्व तक इस प्रकार की घटनाओं से कम से कम बच्चे तो दूर थे। आज भले ही माता पिता अपनी संतानों के समुचित पालन पोषण की हर संभव कोशिश करते हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए बड़े नामी स्कूलों में प्रवेश दिलाते हैं। लेकिन जब उनके बच्चे इस तरह बुराइयों में फँस जाते हैं या अपनी जान तक गँवा बैठते हैं तो उनके अभिभावक ही नहीं और लोग भी दुखी और चिंताग्रस्त हो जाते हैं।
 यद्यपि कारण बहुत से हो सकते हैं किन्तु मुख्य कारण की विवेचना की जाए, तो सामने आता है माता -पिता के पास  बच्चों के साथ बिताने के लिए समय की कमी और उनकी बातें  सुनने समझने का अवसर न देना। बच्चे अपनी सारी बातें माता- पिता को बताना चाहते हैं पर बड़े व्यस्त होने के कारण उन्हें खेलने कूदने को कह देते हैं या डांट देते है। तब बच्चे या तो उदासीनता की गिरफ्त में आ जाते हैं या फिर जिद्दी से हो जाते हैं।
 जिन घरों में माता-पिता दोनों कार्य करते हैं और बच्चे या तो अकेले हो जाते हैं या नौकरों के भरोसे पलते हैं जहाँ उन्हें अपनापन मिलता है कई बार यहाँ भी बच्चों के साथ कुछ अनहोनी  ऐसी बातें हो जाती हैं। माता पिता अपना लाड़- प्यार  उनको महँगे उपहार देकर पूरा करते हैं। कहीं वे अपनी आकांक्षाएँ बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। उनकी रुचि का ध्यान न रखकर उनसे उन विषयों को पढऩे को कहा जाता है, जिसमें उनकी रूचि ही नहीं होती।  आगे उनके हिसाब से कार्य क्षेत्र चुनने की जबरदस्ती की जाती है। बच्चों की सभी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति माता- पिता कर देते हैं। उनकी पसंद के उपहार भी देते हैं किन्तु भावनात्मक रूप से दूर होते जाते हैं।
 मोबाइल फोन, नेट और अंतर्जाल की सुविधा जहाँ ज्ञानवर्धक है वहीं बच्चों को दिग्भ्रमित भी करती है। आजकल कुछ खेल भी जानलेवा सिद्ध हो रहे हैं, अत: माता पिता का यह अतिरिक्त कत्र्तव्य बनता  है कि वे इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे इनका दुरुपयोग न करें। उनकी निगरानी अति आवश्यक है।
 उन्हें हर कक्षा में प्रथम आने को कहा जाता है और ऐसा न होने पर उन्हें अक्षम और अयोग्य कह दिया जाता है फिर वे अवसादित होकर कुछ अनचाहा कदम उठा लेते हैं। अब तो हमारी शिक्षा प्रणाली भी इसी तरह की हो गयी है। नब्बे प्रतिशत से ऊपर ही हर बच्चा लाये तो आगे कॉलेज में प्रवेश मिले। माता-पिता के अलावा शिक्षकों के पास भी इतना समय नहीं कि वे प्रत्येक बच्चे का ध्यान रख सकें। समर्थ लोग स्कूल से अधिक ट्यूशन पर भरोसा करने लगे हैं। बच्चे स्कूल, होमवर्क और ट्यूशन में ही सुबह से शाम तक व्यस्त रहते हैं और तनाव ग्रस्त भी। फिर भी सफल न होने पर आत्महत्या करने को उतारू हो जाते हैं। काश! ऐसे में उनके अभिभावक उन्हें सँभाल पाएँ या पहले ही अपने बच्चों की क्षमता पर भरोसा कर सकें तो ऐसी नौबत ही न आये। बाद में आजीवन पछतावा न हो।
अब समय की माँग है कि बच्चों को ऐसी  शिक्षा दी जाये कि वे यौन शोषण के शिकार न हो पाएँ। बाहर ही नहीं घरों में भी बच्चे इस तरह अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा भी सताए जाते हैं और माता पिता से शिकायत करने पर उन्हें चुप रहने की ही सलाह दी जाती है। तब या तो वे लगातार इस तरह के दुष्कर्म में फँस जाते हैं या जीवन भर के लिए मानसिक कष्ट सहते हैं। अभिभावकों का ये कर्तव्य है कि बच्चों की समस्याएँ सुनें और उचित कारवाही करें।
  लड़के-लड़कियों को दूसरों के व्यवहार, अच्छे- बुरे स्पर्श के बारें में स्पष्ट बता दिया जाना चाहिए। अगर कभी इस तरह कोई शिकायत करे तो उनकी बात पर विश्वास करना चाहिए। माता- पिता हर समय हर जगह तो बच्चों के साथ नहीं रह सकते। इसलिए उन्हें भावी ख़तरों से बचाने के लिए शिक्षित करना आवश्यक है।
घर परिवार के बाद स्कूलों का भी उत्तरदायित्व बढ़ गया है। जहाँ पहले बच्चों को शिक्षा और अन्य कार्यक्रम स्कूल में सीखने को मिलते थे और शिक्षकों का कार्य होता था कि बच्चों को शिक्षा देकर, उनकी प्रतिभा निखारकर सफल नागरिक बना सकें। आजकल  शिक्षा भी एक व्यवसाय बन गयी है। पहले जैसा आदर सम्मान बच्चों के साथ स्नेह प्यार देखने को नहीं मिलता। कहीं बच्चों को निर्मम शिक्षकों द्वारा  इतना मारा- पीटा जाता है कि उन्हें स्कूल जाने में भय  लगता है और तो और अब यहाँ भी बच्चों के बलात्कार, यौन-शोषण की घटनाएँ निरंतर बढ़ रही हैं।
बच्चों के आपसी लड़ाई -झगड़े, मारपीट से बढ़कर अब स्कूलों में बच्चे मर्डर भी करने लगे हैं। ऐसे में उनका दायित्व बनता है कि स्कूल प्रबंधन सबकी सुरक्षा का ध्यान रखें। जाँच-पड़ताल , पुलिस -अदालतें बाद में चलती हैं पर जिनके मासूम बच्चे अपनी जान दे बैठे उनका दुख क्या कभी दूर हो सकेगा ?
 बच्चे अपने साथ हथियार लेकर स्कूल में पहुँचकर हत्या करते हैं , तो ऐसे में स्कूलों में इस तरह का प्रबंध हो कि प्रवेश स्थान में और स्कूल परिसर में कैमरा आदि उपकरण लगे हों और उनकी जाँच भी होती रहे कि वे काम कर भी रहे हैं या नहीं? बच्चों के बदले हुए व्यवहार या स्वभाव पर भी शिक्षकों का ध्यान रहे। किसी घटना के बाद जाँच करनेवाले ईमानदारी से अपना फ़र्ज निभाएँ। धन के लोभ में किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा न हो बल्कि सच्चा दोषी पकड़ा जाए। ताकि आगे ऐसी घटना होने की आशंका न  रहे। और न्याय पालिका पर विश्वास बना रहे औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन होने से भी बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ा। परिवार में आपस के प्रेम, भाई-चारे, और मेलजोल की प्रवृत्ति कम हुई। लोग बुजुर्गों को बोझ समझ वृद्धाश्रम में छोड़ रहे हैं। यही सब बच्चे  देख और सीख रहे हैं।
 अब समय रहते समाज के सभी लोगों को सहयोग करना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।  जिससे हमारे  देश के भावी कर्णधार अच्छे नागरिक बन सकें।
सम्पर्क: गुरुग्राम, 09911274074
email- pant.jyotirmai@gmail.com

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