July 05, 2014

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

जनोपयोगी अंक

अप्रैल 2014 का अंक आज ही प्राप्त हुआ। धन्यवाद!
इस बार का अंक बहुत उपयोगी लगा। विशेषकर रक्त कुण्डली और पर्यावरण विषयक आलेखों के कारण यह अंक जनोपयोगी हो सका। पाठकीय प्रतिक्रिया संलग्न है -
प्रतिक्रिया- 1.              
 संपादकीय आलेख - झोलाछाप डॉक्टरों की गिरफ़्त में ....
प्रदेश में ही नहींपूरे देश में झोलाछाप डॉक्टर्स के गिरोह कार्यरत हैं जो आम आदमी की जि़न्दगी की कीमत पर अपनी तिजोरियाँ भर रह हैं। इस समस्या के कई विचारणी बिन्दु हैंयथा-
1- क्या राज्य सरकारें इस गिरोह को स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने का अपराधी मानती हैंयदि हाँतो अभी तक इस अपराध को समाप्त करने के लिए क्या उपाय किए गयेकई वर्ष पूर्व छ.ग. शासन के आदेश से   झोलाछाप डॉक्टर्स का सर्वेक्षण कर उसके प्रतिवेदन शासन और समीपस्थ थाने को उपलब्ध करवाये गयेजिसका परिणाम यह हुआ कि सर्वेक्षण करने वाले सरकारी अधिकारी झोलाछाप गिरोह के दुश्मन बन गयेदूसरी ओर एक भी झोलाछाप के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। पता चला कि विधिशास्त्र में इस गिरोह पर कार्यवाही करने के लिए कोई धारा ही नहीं है। अलबत्ता इस छीछालेदर के तुरंत बाद झोलाछाप गिरोह के सदस्यों नेअपने नाम वालेपहले की अपेक्षा लगभग चार गुने बड़े साइन बोर्ड बनवाकर चौराहे पर लगवा दिए। क्या राज्य सरकारों को इस विषय में गम्भीर होने की आवश्यकता नहीं हैक्या विधि शास्त्र में ऐसी किसी धारा का प्रावधान नहीं किया जाना चाहिये जिसके अंतर्गत ऐसे गिरोहों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही किया जा सकना सम्भव हो सके ?
2- वर्तमान शिक्षातकनीकी सुविधाओं की सहज उपलब्धता और आधुनिकता के इस माहौल में क्या स्वयं आम जनता का यह उत्तरदायित्व नहीं है कि वह ऐसे गिरोहों से बचकर रहे?
3- प्रतिबन्धित औषधियाँ झोलाछाप लोगों को इतनी सहजता से क्यों उपलब्ध हो जाती हैंशासन के औषधि निरीक्षण एवं नियंत्रण विभाग की क्या भूमिका है?
4- औषधि निर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स और झोलाछाप के बीच एक अघोषित समझौता इन$फोर्सड है। इन कम्पनियों को केवल पैसा चाहियेजिसके लिए झोलाछाप गिरोह की एक बहुत बड़ी भूमिका है। भारत सरकार के पास ऐसी कोई नियामक व्यवस्था नहीं है जो औषधि-निर्माता कम्पनियों को इस अनैतिक व्यापार में संलिप्त होने से रोक सके। 
हम यह मानते हैं कि हमारी बहुत सी समस्यायों के लिए हम स्वयं भी बहुत बड़े उत्तरदायी हैं। जब सरकारें हमारे हितों की उपेक्षा करने वाली हों तो अपने हितों की रक्षा हमें स्वयं करनी चाहिये। जबकि होता यह है कि हम कुएँ में कूदने के लिए सदा ही तैयार रहते हैं ...और यह प्रतीक्षा करते रहते हैं कि हमें कूदने से रोकने के लिए सरकार कोई सख़्त कानून बनाएक्योंकि अंतत: हमारी रक्षा का दायित्व सरकार का है।
प्रतिक्रिया 2-                                         
   हीर जी की नज़्में
हीर जी की रचनाओं के बारे में कुछ भी कहना मेरे लिए बड़ा मुश्किल है। वे एक चर्चित और ख्यातिनाम रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं को उदंती में प्रकाशित देखकर अच्छा लगा। निश्चित ही इससे उदंती गौरवान्वित हुई है। श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं का सम्मान करके उदंती प्रकाशन की नवीन ऊँचाइयों को स्पर्श कर रही है।
प्रतिक्रिया 3- शब्दों के मसीहा और उनकी कालजयी कहानी
प्रतिक्रिया से परे। केवल एक स्मित ..आनन्दपूरित!
प्रतिक्रिया 4- हिन्दी व्यंग्य में वाचिक परम्परा के लेखक 
मैं के.पी. साहब को तबसे पढ़ रहा हूँ जब मैं कक्षा सातवीं का विद्यार्थी हुआ करता था। घर में आने वाली धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं के साथ ही के.पी. साहब ने भी अपने व्यंग्य लेखों के माध्यम से अपने एक नन्हे पाठक के मन में स्थान बना लिया था ...जो अभी भी यथावत है।
प्रतिक्रिया 5- इस अंक के सभी लेख स्तरीयपठनीय और प्रशंसनीय रहे। पत्रिका की उन्नति के लिए हमारी नित्य शुभकामनायें!  

 - डॉ. कौशलेन्द्र,
kaushalblog@gmail.com

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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