October 22, 2013

कलाकार

जीवन में रंग भरते
बसंत साहू के चित्र
  -डॉ. रत्ना वर्मा
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक मॉल में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के सामने ही आयोजित एक चित्र प्रदर्शनी ने मेरा ध्यान बरबस ही खींच लिया। मेरे कदम ठिठक गए। एक तरफ गणेश जी की पेंटिंग प्रदर्शित थी। इस चित्र ने शुभ कार्य का आह्वान करते हुए मुझे अपनी ओर बुला लिया और मैं उन चित्रों की ओर खींची चली गई। वहाँ 100 के लगभग चित्र प्रदर्शित थे। एक नजर देखने के बाद सबसे पहले उत्सुकता हुई कि कौन है इन चित्रों का चित्रकार। जैसे ही चित्र के नीचे लिखा नाम पढ़ा बरबस मैं कह उठी अरे ये तो बसंत साहू के चित्रों की प्रदर्शनी है। यहाँ उनके चित्र बिक्री के लिए भी रखे गए थे। 

मैं क्रमश: आगे बढ़ते हुए एक एक चित्र को देखने लगी। मुझे उनके चित्रों में छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति के अनेक रंग नजर आए जैसे- कई चित्र छत्तीसगढ़ में तीन दिन तक चलने वाले देवारी त्योहार के कई रंग भरे हुए थे। जिसमें सुआ नृत्य करती ग्रामीण बालाएँ, गोवर्धन पूजा के दिन गाँव के दाऊ घरों के लीपे- पुते दीवारों पर हाथा देती राऊत महिला, और डंडा लेकर राऊत नाच करते ग्वाल-बाल तथा गौरा पूजा के साथ तुलसी पूजा के दिन गन्ने का मंडप तान कर तुलसी पूजा करती महिलाएँ। इतना ही नहीं गाँव के कई अन्य रंग- जैसे बैलगाड़ी में बिदा होती दुल्हन है, तो खेत में रोपा लगाती महिलाएँ, सायकिल में पीछे अपनी नई नवेली पत्नी को बैठाकर घर ले जाता युवक।  घूम -घूम कर खिलौने बेचने वाली महिला, हाट-बाजार और खरीददारी करके लौटती आदिवासी बालाएँ, पंथी नृत्य करते कलाकार आदि लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत करते अनेक चित्र दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित तो कर ही रहे थे।  साथ ही इन सबसे हटकर बुद्ध, कृष्ण, कबीर, मदर टेरेसा को लेकर उकेरे गए कई चित्र भी लोगों को एक पल ठहर कर देखने के लिए बाध्य कर रहे थे।  यह सब देखते हुए मेरी नजर बसंत साहू को इधर-उधर तलाशने लगी। पास ही कुछ भीड़ नजर आई। मुझे लगा हो न हो बसंत साहू इन्हीं भीड़ के बीच घिरे होंगे। मैंने झाँक कर देखा वे व्हील चेयर पर बैठे अपने प्रशंसकों के सवालों का जवाब एक के बाद एक दिए जा रहे थे। थोड़ी दूरी पर खड़ी मैं उनके आस-पास से भीड़ के छँटने का इंतजार करने लगी और हॉल के फर्श पर बिछे, वृहद् कैनवास पर उनके द्वारा बनाए बुद्ध के चित्र को निहारने लगी।   साथ ही मैं मॉल संस्कृति में रचे- बसे उन युवाओं को भी देख रही थी जो बसंत  के बनाए चित्रों को, उनकी कूँची से उपजी हमारी लोक संस्कृति की छटा को बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे और सराह रहे थे।
मैं सोचने लगी बसंत जैसे कलाकार, लेखक ही तो हैं ,जो हमारी लुप्त होती लोक-संस्कृति और लोक कला को अपने चित्रों और अपने लेखन के माध्यम से सँजोकर रख रहे हैं। इन माध्यमों के जरिए उन्हें बता रहे हैं कि जानों अपनी पुरातन भारतीय लोक-संस्कृति और कला को, जो धीरे- धीरे हमारे जीवन से हमारी धरती से लुप्त होते जा रही है।
तभी बसंत साहू के पास से भीड़ कुछ छँटी और मैं पँहुच गई उनके करीब। मैंने अपना परिचय दिया- उन्होंने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। मैं उनसे इससे पहले कभी रूबरू तो नहीं हुई थी,पर फोन पर उनसे उनकी कला के बारे में बातचीत कई बार हुई थी। मैं मॉल में लगी इस प्रदर्शनी के साथ उनकी चित्रकला के बारे में उनसे पूछने लगी। उन्होंने हाल ही में आरंभ किए गए अपने नए काम की जानकारी देते हुए बताया कि वे लोक संस्कृति पर तो काम करते ही हैं इन दिनों वे अध्यात्म पर काम कर रहे हैं।  वे कहते हैं- शरीर साधन है मैं आत्मा में जीता हूँ, लोककला मनुष्य को सहज ही अध्यात्म से जोड़ देती है। चूँकि मैं इन दिनों मेरा मन भी इसी ओर रमता है तो स्वाभाविक है कि मेरे चित्रों में भी अध्यात्म का रंग बिखरा हुआ नजर आता है।
22 नवंबर 1972 को धमतरी जनपद में एक कृषक परिवार के घर जन्में बसंत दरअसल जन्म से ही ऐसे नहीं थे। 1995 में हुए एक सड़क हादसे ने उन्हें व्हील चेयर पर बिठा दिया। इस हादसे ने तो उनका जीवन के प्रति नजरिया ही बदल दिया। उन्होंने अपने इस नए जीवन को रचनात्मकता से जोड़ दिया। रंग और कूँची उनके जीने का सहारा बने; जबकि इससे पहले न कभी उन्होंने चित्र बनाए न बाद में किसी से प्रशिक्षण लिया। 10वीं तक की शिक्षा बसंत ने अपने गाँव कुरूद में प्राप्त की है।
बसंत को व्हील चेयर पर देखकर और  उनका और उनकी  चित्रकला के साथ तारतम्य बिठाना आसान नहीं होता। आम मानवीय उत्सुकता के चलते यह विचार सहज ही चौंकाता है कि जो व्यक्ति हाथ-पैर दोनों से नि:शक्त हैं वह इतने बड़े-बड़े कैनवास पर चित्र किस तरह उकेरता होगा। एक कहावत है न  लेकिन जैसा कि शेरिडेन ने कहा है-  सफलता के तीन रहस्य हैं - योग्यता, साहस और कोशिश,  कुछ ऐसा ही है बसंत साहू और उनके चित्रों का रिश्ता। उनकी अदम्य जिजीविषा ने उनसे वह करवा लिया है जिसकी कल्पना शायद उन्होंने भी कभी नहीं की होगी।
आज बसंत के चेहरे पर सदा एक मुस्कान बिखरी रहती है जो उनके जिंदादिल होने का प्रमाण है। यह अनुमान हम उनके चित्रों में भरे चटक रंगों को देख कर सहज ही लगा सकते हैं, लाल, हरा, नीला और पीला रंग उनके चित्रों में प्रमुखता से इस्तेमाल हुए हैं। उनके लिए सबसे मुश्किल काम तो यह है कि वे अपने हाथों से कूँची पकड़ नहीं सकते। अपने हाथ की कलाई में कूची को एक कपड़े से बाँध लेते हैं उसके बाद आस- पास बिखरे रंग उनके कैनवास पर सहज ही उतरते चले जाते हैं।
बसंत के चित्रों की अब तक अनेक प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं। साथ ही अनेक सम्मान और पुरस्कार उन्हें प्राप्त हो चुके हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके चित्रों को सराहा गया है।  पिछले 16 वर्षों में हजारों चित्रों के इस रचयिता के अनेक चित्र प्रदेश, देश और विदेश के कई महत्त्वपूर्ण स्थानों संगृहीत हैं।
रंगों को उन्होंने अपने जीने का माध्यम तो बनाया ही है, साथ ही वे निरंतर दूसरों के जीवन में भी रंग भरने की कोशिश में लगे रहते हैं। कला और संवेदनशीलता एक दूसरे से जुड़े होते हैं । इस संवेदनशील कलाकार ने उड़ीसा के तूफान पीडि़तों  के लिए 22 मीटर लम्बे कैनवास पर 1857 से आज तक के महापुरुषों का चित्रांकन कर सहायता हेतु अपील की थी।  इसके अलावा सामाजिक बुराइयों, स्थानीय समस्याओं, धार्मिक जागरण, महापुरुषों के पोट्रेट संतों के पोट्रेट, बेरोजगारी, बीमारी, शिक्षा आदि के चित्र बनाकर  वे दूसरों को लगातार इनपर काम करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। वे कई फिरके में बँट रहे समाज को एकजुट करना चाहते हैं, अपने चित्रों के माध्यम से जन जागृति लाना चाहते हैं। उनकी दिली इच्छा है कि वे शारीरिक रुप से नि:शक्त बच्चों को चित्रकाला का नि:शुल्क प्रशिक्षण दें। वैसे जब भी उन्हें समय मिलता है वे अपने आस-पास के ग्रामीण बच्चों को चित्रकला की बारिकियाँ सीखाते नज़र आते हैं।  

बसंत धमतरी जिला के सरोजनी चौक, कुरुद में निवास रहते हैं। उनसे मोबाइल नम्बर 9907765831 पर सम्पर्क किया जा सकता है।
 उनका मेल आईडी है- basantartist@gmail.com

2 Comments:

Anita (अनिता) said...

सभी चित्र बहुत ही सुंदर हैं!
अनूठे व महान कलाकार श्री बसंत साहू जी के साहस तथा उनकी लगन को नमन!
उनके साथ हुए हादसे के बारे में पढ़कर जितना दुख हुआ उतनी ही प्रसन्नता उनके द्वारा बनाए गये चित्रों को देखकर हुई! दुख व कठिनाइयों भरे दुर्गम रास्ते में आगे क़दम बढ़ाकर अपनी मंज़िल तक पहुँचने का नाम ही असली मायनों में 'जीना' कहलाता है... इसका जीता-जागता प्रमाण श्री वसंत जी हैं!
उनका परिचय कराने व उनके बनाए चित्रों को साझा करने का आभार!
श्री वसंत जी को शुभकामनाएँ!


~सादर
अनिता ललित

manjul said...

बसंत जी को अनंत शुभ कामनाएं ,बसंत जी आपके चित्र मुगध करतें हैं .आपको बधाई

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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