December 18, 2012

आपके पत्र



उदंती का शानदार सफर
उदंती के सितम्बर अंक में छत्तीसगढ़ के पुरातन स्थल तुरतुरिया, पाली का शिव मंदिर और छत्तीसगढ़ के जलप्रपात के बारे में पढऩे के बाद छत्तीसगढ़ की समृद्ध परंपरा को और अधिक जानने का अवसर मिला। एके हंगल को श्रद्धांजलि,कान्हा के बाघ आदि सभी आलेख पठनीय हैं। उदंती के इस शानदार सफर पर आपको बधाई और शुभकामनाएँ।
 -समीर वाही, इंदौर मप्र
 बिन्दा मार्मिक कथा
महादेवी जी की कालजयी कहानी बिन्दा  मैंने वास्तव में नहीं पढ़ी थी और जब पढ़ी तो लगा कि कितनी सहज भाषा में इतनी मार्मिक कथा कैसे कालजयी बन जाती है। इसको पढ़ाने के लिए मैं उदंती को बार-बार धन्यवाद करती हूँ।
-रेखा श्रीवास्तव, rekhasriva@gmail.com
पर्यटन पर केन्द्रित
सितम्बर को पर्यटन पर केन्द्रित करने का प्रयास किया गया है जो सराहनीय है। परंतु छत्तीसगढ़ में अनेक ऐसे स्थल हैं जहाँ पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं यदि ऐसे स्थलों पर खोजपरक सामग्री दी जाए तो संभवत: सरकार इस दिशा में प्रयास के बारे में सोचे। सिरपुर जिसे विश्व धरोहर में शामिल करने की बात  तो की जा रही है परंतु अफसोस वहाँ ठहरने की उत्तम व्यवस्था न होने से पर्यटक हतोत्साहित हो जाते हैं।
  -रामस्वरूप अवस्थी, रायगढ़ छत्तीसगढ़
 नए विचारों और रंगों का समावेश
 उदंती का अक्टूबर अंक बहुत सुन्दर लगा। नये विचारों और रंगों का समावेश उदंती को महका गया। श्री देवी की कविता में स्त्री होने की त्रासदी का सुन्दर चित्रण किया गया है। और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा नवजन्मा के बारे में क्या कहे- वाह वाह वाह, काश ये जज़्बा आज हर दिल मे पैदा हो जाए, एक सशक्त लघुकथा। हाइकु भी बहुत सुन्दर।
  -वन्दना, rosered8flower@gmail.com
प्रेरणादायक लेख
श्वेत क्रांति के जन्मदाता के बारे में जानकर बहुत आश्चर्य हुआ। इसे कहते हैं जहाँ चाह वहाँ राह। बहुत प्रेरणादायक लेख है।  धन्यवाद।
  -डॉ.सुभाष शर्मा, आस्ट्रेलिया
 स्त्री होना त्रासद नहीं
स्त्री होना त्रासद तो नहीं पर ज़्यादातर हमारी सामाजिक स्थितियाँ और अंतर्वैयक्तिक संबंधों की असफलताएँ जरूर हमें ऐसा अहसास करवाती हैं। कई बार सचमुच वह त्रासद भी हो जाता है। इससे भी इन्कार नहीं । 
  -दिनेश गौतम,dineshgautam785@gmail.com
जैसे कुछ कहते कहते रुक गई
सच तो यह है कि स्त्री को इतने संकुचित दायरे में देखना ठीक नहीं है। स्त्री केवल प्रियतम भर के लिए नहीं होती है। स्त्री का अपना अस्तित्व है। दिनेश जी बात से मैं सहमत हूँ।
यहाँ यह भी प्रतीत हो रहा है कि लेखिका जैसे कुछ कहते-कहते रुक गई हैं। कविता आरंभ तो हुई पर अपने चरम पर नहीं पहुंची। श्री देवी को अपनी इस कविता पर फिर से काम करना चाहिए। बहरहाल उनकी अभिव्यक्ति को आपने जगह दी। यह अच्छी बात है। नवजन्मा सकारात्मक लघुकथा है बदलाव की आहट देती हुई।
 -राजेश उत्साही, utsahi@gmail.com
एक सार्थक रचना
आप बहुत खूबसूरती से एक उत्कृष्ट पत्रिका का संपादन कर रही हैं...मेरी शुभकामनाएँ और बधाई स्वीकारें । बहुत बढ़िया लघुकथा है। जिस दिन हमारे समाज में सब लोग ऐसा ही सोचने लगेंगे, उस दिन कोई बेटी बोझ नहीं मानी जाएगी। एक सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई ।
- प्रेम गुप्ता मानी, premgupta.mani.knpr@gmail.com

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