August 25, 2012

फ्रैंडशिप-डे

दोस्ती एक अनूठा रिश्ता

- आर. वर्मा
बारिश के इस मौसम में इन दिनों एक और बारिश हो रही है, वह है दोस्ती निभाने की बारिश।
कभी बरखा कभी सावन बनकर बरसती है दोस्ती,
वफादारी और विश्वास से चलती है दोस्ती।
दोस्ती के इस जज्बे को समझने के लिए एक सच्चा दोस्त का होना जरूरी है। लेकिन मेरे मन में इन दिनों एक और उत्सुकता ने घर कर लिया है, वह यह कि आखिर इस फ्रेंडशिप डे मनाने के पीछे की कहानी क्या है। कई दिनों के लगातार प्रयास के बाद एक क्लू मिल ही गया और तब बहुत थोड़ी सी जानकारी की मालूमात हो पाई। उसी जानकारी को आपके साथ बांट कर दोस्ती के इस नाजुक रिश्ते के  सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक पहलू पर कुछ कहना चाहती हूं।  मेरे विचारों से आप भी सहमत हो यह जरूरी नहीं है, क्योंकि सबका अपना अलग- अलग नजरिया होता है-
'आप अपने परिवार का चुनाव तो नहीं कर सकते परंतु अपने दोस्त का चुनाव कर सकते हैं।' इसी भावना को अभिव्यक्त करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस ने 1935 में अगस्त के पहले रविवार को 'नेशनल फ्रैंडशिप डे' मनाने का निश्चय किया। इसके बाद इस दिवस को विभिन्न देश व विभिन्न संस्कृतियों में भी मनाया जाने लगा। इसी ग्लोबलाइजेशन के चलते अब भारत में भी इस दिवस को बहुत जोर-शोर मनाया जाने लगा है। युवाओं की दुनिया में तो इस दिवस ने अपनी खास जगह बना ली है।
यद्यपि दोस्ती किसी देश, काल, जात- पाँत या उम्र के बंधन से परे एक ऐसा खूबसूरत रिश्ता है जो ताउम्र निभाने के लिए बनता है। भारतवासियों के लिए दोस्ती का यह एक दिन मनाये जाने की परंपरा भले ही आयातित हो पर भारत में दोस्ती निभाये जाने की मिसालें सदियों से ही दी जाती रही हैं। चाहे वह दो मुल्कों की दोस्ती हो चाहे दो व्यक्तियों के बीच की दोस्ती हो... और ऐसा हो भी क्यों न यह रिश्ता बनता ही तभी है जब दोनों के बीच कोई भेदभाव न हो कोई राग-द्वेष न हो, कोई स्वार्थ न हो, जहां स्वार्थ की घुसपैठ हुई नहीं कि दोस्ती खत्म।
फिर भी जब कभी भी हम इस पाक रिश्ते के बारे में बात करते हैं तो सामने वाले की जुबान पर एकदम से एक ही बात आती है- 'अरे कहां अब सच्चे दोस्त तो ढूंढे नहीं मिलते, सबको सिर्फ अपनी पड़ी रहती है, दोस्तों के बारे में कौन सोचता है आदि आदि...' कल ही की तो बात है मैंने जब अपने कुछ मित्रों से इस विषय में बात करना चाही तो उनका भी यही जवाब था कि दोस्ती तो आज मतलब के लिए की जाती है, इधर काम निकला उधर दोस्त गायब। इतना ही नहीं पक्के दोस्तों को पक्के दुश्मन बनते भी देर नहीं लगती। ...और यह भी कि दोस्ती तो सिर्फ फिल्मों में ही देखने को मिलती है, जिसमें वे अपने दोस्त के लिए अपनी जान तक देने के लिए तैयार बैठे रहते हैं और जब बात बिगड़ती है तो जान लेने में भी देर नहीं करते। इनका जीवन की सच्चाई से क्या लेना देना।
  शुरू में मैं उनकी बात चुपचाप सुनती रही जब वे अपनी पूरी भड़ास दोस्तों की दगाबाजी को लेकर निकाल चुके तब मैंने धीरे से कहा- अच्छा ये बताओ फिर मेरी दोस्ती किस श्रेणी में आयेगी? इसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत हुई कि ऐसी दोस्ती ऊंगली में गिनी जाने वाली होती है, यह आम नहीं होती। क्योंकि जब आप किसी व्यक्ति से पूछते  हैं तब वह यह जरूर कहता है कि आज दोस्ती के मायने जरूर बदल गए हैं पर साथ ही वह यह भी स्वीकार करता है कि उनके सच्चे दोस्त भी हैं, इससे जाहिर होता है कि हर किसी का एक न एक दोस्त तो जरूर होता है और वह आम नहीं खास होता है। खास है इसीलिए तो दोस्त है। तभी तो कितना अच्छा लगता है यह सुनना, पढऩा कि दोस्ती एक अनुपम और अनूठा रिश्ता है, जो हमारा का साथ जीवन भर निभाता है। आज भी हम चाहे स्कूल की बात करें या कॉलेज की या फिर पास- पड़ोस की। जब भी इनमें से किसी भी दौर के पुराने दोस्तों से मिलते हैं तो चहक कर कहते हैं यह हमारे स्कूल का दोस्त है। या यह मेरे बचपन का सबसे अच्छा दोस्त है या यह मेरा एकमात्र ऐसा दोस्त है जिसे जब भी पुकारो हाजिर हो जाता है। सच भी है दोस्ती एक ऐसा मीठा रिश्ता है जो और सभी नाते- रिश्तों से ऊपर होता है और जिसे हम अपनी पसंद से चुनते हैं। तभी तो इसकी मिठास जीवन भर कायम रहती है। और चाहे उम्र के कितने ही पड़ाव पार क्यों न कर लिए हों उनसे मिलने की चाहत बनी ही रहती है। ऐसे कई उदाहरण हमें आस- पास मिल जाते हैं जो ताउम्र अपनी दोस्ती निभाते हैं।
ऐसी ही चार दोस्त हैं जो अपने बचपन की यादों को आज भी संजोए हुए हैं। सुमन परगनिहा, अरूणा तिवारी, अरूणलता श्रीवास्तव और अफरोज़। ये चारों सहेलियां माध्यमिक शिक्षा तक एक साथ पढ़ती थीं। इनमें से तीन ने तो आगे की पढ़ाई भी साथ की और शादी के बाद भी उनकी दोस्ती बनी रही। लेकिन सुमन से संपर्क टूट गया। 2004 में जब वह रायपुर पहुंची तब संयोग से वह उन तीनों से मिली। और अब आज उन चारों की दोस्ती ऐसी है कि वे पिछले 8-9 साल से अपना सुख- दुख बाँटतीं दोस्ती निभाते चली आ रहीं हैं। जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने हर साल एक- दूसरे के घर पहुंचती हैं और  खुशियां मनाती हैं। इतना ही नहीं फ्रेंडशिप डे के दिन भी सभी इकट्ठा होती हैं और दोस्ती का धागा बांधती हैं। पुराने दोस्तों से मिलने की इसी चाहत का ही नतीजा है कि आज विभिन्न स्कूल कॉलेज में प्रतिवर्ष भूतपूर्व छात्र- छात्राएं मिलन समारोह आयोजित करते हैं। इस अवसर पर जब बरसों से बिछुड़े दोस्त मिलते हैं तो उनकी खुशी देखते ही बनती है।
अब प्रश्न यह उठता है कि इस दोस्ती के लिए इस एक दिन को विशेष बनाने की जरूरत क्यों हुई? बदलते हुए आज के सामाजिक संदर्भ में इसे देखें तो पारिवारिक रिश्ते धीरे- धीरे छीजते जा रहे हैं और अमेरिका जैसे विकासशील देश में तो इसकी शुरूआत बहुत पहले से ही हो गई है। गौर करने वाली बात यह है कि इस बात को आधुनिक विज्ञान ने मान लिया है कि मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है और उसे जीवन भर किसी न किसी के साथ की आवश्यकता होती है, इसके अभाव में उसका जीवन नीरस और बेमानी हो जाता है, और यह स्थिति किसी भी देश के विकास में बाधक बन सकती है। ऐसे में अन्य संबंध यदि बिखरते हैं तो दोस्ती ही एक ऐसा संबंध हैं जो किसी भी व्यक्ति को टूटने से बचा सकता है।
यद्यपि भारत के सामाजिक परिवेश को देखते हुए यह कहना गलत होगा कि यहां परिवार पूरी तरह बिखर गये हैं, बदलाव आया है और आ भी रहा है। परिवार तेजी से एकाकी होते जा रहे हैं, रिश्तों में बिखराव भी देखने को मिल रहे हैं। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री, परिवार के इस बिखरते दौर में यह कहने लगे हैं कि आज के माता- पिता को अपने बच्चों का दोस्त बनना होगा अभिभावक नहीं। शिक्षित परिवारों में यह वातावरण दिखाई भी देने लगा हैं, जो हमारे भारतीय समाज के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है। ऐसे में यदि हम इस एक दिवस के बहाने संबंधों को प्रगाढ़ करने या जोडऩे का प्रयास करें तो बुरा क्या है?
लेकिन इन सबके बाद भी दिवस मनाने की इस नई परंपरा, चाहे वह मदर्स-डे हो, फादर्स-डे या फिर वेलेंटाइन-डे को लेकर नाक- भौं सिकोडऩे वालों की कमी नहीं है। वे यह कहकर इस बात की आलोचना करते हैं कि जिन देशों में रिश्तों का सम्मान नहीं होता या जहां संबंध टूटने की कगार पर पहुंच चुके हैं उन्हें जोडऩे के लिए वे यह सब दिवस मनाते हैं ताकि बिखरे तारों को पुन: जोड़ सकें। परंतु भारत जैसे देश में तो आदिकाल से ही हम इन्हीं संबंधों, रिश्तों के बल पर मजबूती से खड़े हैं, तो फिर ऐसे दिवस मनाने के ढकोसलों की क्या जरूरत?
हां यह सब बिल्कुल सत्य है कि हमें हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति पर गर्व हैं, लेकिन भविष्य में भी हम इन पर गर्व करते रहें क्या इसके लिए यह जरूरी नहीं कि समाज के बदलते हुए इस नये रूप को भी स्वीकार करें। क्योंकि हमारे यहां विभिन्न शोधों के बाद जो नतीजे आ रहे हैं वे बहुत सकारात्मक नहीं कहे जा सकते। आंकड़े तो यही कहते हैं कि संयुक्त परिवार खत्म होते जा रहे हैं, वृद्ध माता- पिता अकेले, बेसहारा जीवन जीने को मजबूर हैं, तलाक के मामलों में वृद्धि हो रही है, ज्यादातर प्रेम विवाह असफल होते देखे गये हैं....
तब क्या हमें अभी से सचेत नहीं हो जाना चाहिए और यदि इन दिवसों के बहाने हम दोस्ती को स्वीकार करने का एक जतन करते हैं तो बुरा क्यों माना जाए। यूं भी भागदौड़ की इस जीवनचर्या में यदि हम एक दिन अपनों के नाम करके खुशियों का एक बहाना ढूंढ लें तो क्या जीवन ज्यादा आसान नहीं हो जायेगा। हो सकता है मेरी यह बात कुछ को नागावर गुजरे परंतु मैं उनसे सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि कोई नई परंपरा यदि रिश्तों की नींव मजबूत करती है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
रहा सवाल बाजार का तो व्यापारी का तो काम ही है मनुष्य की भावनाओं को भुनाना, उसे तो एक अच्छा अवसर मिल गया अपने व्यवसाय को तरक्की के रास्ते पर ले जाने का। यदि कोई अपने बेस्ट फ्रेंड को फे्रंडशिप बैंड बांधकर या खूबसूरत कार्ड अथवा फूलों की सुंदर सा गुच्छा उपहार में देकर अपनी दोस्ती का इजहार करना चाहता है और इनके इस खूबसूरत इजहार को बाजार यदि नए- नए अंदाज में पेश करके बेच रहा है तो फिर शिकायत क्यों?
फूलों को देख मुस्कुराना आया,
पर तुम्हारी दोस्ती ने जीना सिखाया।
तो फिर क्यों नहीं आज हम सब मिलकर गिले- शिकवे दूर कर लें और दोस्ती के इस नये पैगाम का स्वागत करें। इस एक दिन को सेलिब्रेट करके उम्र भर के लिए इस गांठ को इतने कस के बांध दें कि फिर यह कभी छोड़े से भी न छूटे।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।

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