August 25, 2012

सावन की यादें

आया सावन झूम के...

 - पल्लवी सक्सेना
सवान के महीने में हरे रंग का सर्वाधिक महत्व होता है। क्यूंकि सावन के महीने में धरती सूरज की तपिश से मुक्त होकर अपनी धानी चूनर छोड़ हरीयाली से परिपूर्ण ठंडी- ठंडी हरी चुनरी जो ओढ़ लिया करती है। बड़े- बड़े पेड़ों से लेकर नन्हें- नन्हें पौधों पर पड़ी बारिश की बूंदें जैसे बचपन पर आया नवयौवन का निखार
यूं तो जिंदगी में भी न जाने कितने मौसम आते जाते है। लेकिन चाहकर भी कभी कोई मौसम ठहरता नहीं जिंदगी में। हमेशा पतझड़ के बाद ही बहार आती है, और बहार के बाद फिर पतझड़ बिलकुल सपनों के पंछियों की तरह नींद की डाल पर कुछ देर के लिए आए सपने वक्त की हवा के साथ उड़ जाते है और हमारे दिल में अपने कदमों के कुछ निशां छोड़ जाते हैं। जिनके सहारे कभी तो यह जिंदगी सुकून से गुजर जाती है तो कभी इन्हीं सपनों के पूरा ना होने पर एक टीस सी रह जाती है मन के किसी कोने में कहीं....मगर वक्त कभी एक सा कहाँ रहता है इसलिए शायद प्रकृति भी हमारे साथ कभी धूप तो कभी छाँव की अटखेलियाँ खेला करती है सदा।
लंबी चली गर्मियों के बाद आज फिर 'मौसम ने ली अंगड़ाई' और एक बार फिर 'आया सावन झूम के' आज सुबह जब उनींदी आँखों से देखा खिड़की की ओर तो जैसे एक पल में सारी नींद हवा हो गयी ऐसा लगा जैसे यह सुहाना मौसम बाहें फैलाये मेरे नींद से जागने का ही इंतजार कर रहा था। यूं तो यहाँ (यूके) सदा ही बारिश हुआ करती है। मगर आज न जाने क्यूँ एक अलग सा एहसास था इस बारिश में, ऐसा महसूस हो रहा था जैसे यह बारिश का पानी मुझसे कुछ कहना चाहता है। मुझे कुछ याद दिलाना चाहता है। तभी सहसा याद आया सावन का महीना इस महीने सवान के सोमवार शुरू हो रहे हैं। यह याद आते ही मुझे सब से पहले याद आया मंदिरों में होती शिव आराधना,  मंत्रोच्चारण से गूँजते मंदिर,  मंदिर के बाहर बेलपत्र, धतूरे और पूजा के अन्य सामग्री से सजी दुकानों का कोलाहल, सब घूम गया आँखों के सामने और इस सबके साथ- साथ मन प्रकृति के सुंदर नजारों में कही खो गया।
जैसा के आप सभी जानते ही होंगे कि सवान के महीने में हरे रंग का सर्वाधिक महत्व होता है। क्यूंकि सावन के महीने में धरती सूरज की तपिश से मुक्त होकर अपनी धानी चूनर छोड़ हरीयाली से परिपूर्ण ठंडी- ठंडी हरी चुनरी जो ओढ़ लिया करती है। बड़े- बड़े पेड़ों से लेकर नन्हें- नन्हें पौधों पर पड़ी बारिश की बूंदें जैसे बचपन पर आया नवयौवन का निखार, जल मग्न रास्ते,  झीलों, तालाबों और नदियों में बढ़ता जलस्तर बहते पानी का तेज होता बहाव जैसे सब पर एक नया जोश, एक नयी उमंग छा जाती है।
हर कोई, चाहे 'प्रकृति हो या इंसान' इस मौसम में एक नये जोश के साथ अपने- अपने जीवन की एक नयी शुरुवात करने की इच्छा रखते है। इसलिए तो प्रकृति भी नए अंकुरों को जन्म देकर उन्हें नन्हें हरे- हरे पौधों के रूप में बदल कर नव जीवन की शुरआत का संदेशा देती नजर आती है। घर आँगन में पड़े सावन के झूले, उन झूलों पर आज भी झूलता बचपन और उस बचपन में मेरे बचपन की झलक जिसे आज भी सिर्फ मैं देख सकती हूँ।
हरी- हरी चूडिय़ों की खनक, मिट्टी की सौंधी खुशबू में मिली मेहंदी की महक, मेहंदी के रंग को देखने का उतावलापन कि रंग आया या नहीं। नए कपड़ों को खरीद कर जल्द से जल्द पहनने की होड़, भाइयों के आने का बेसब्र इंतजार, मिठाइयों की दुकानों पर सजे फेनी और घेवर की खुशबू, बाजारों का कोलाहल, फुर्सत के पल में घड़ी- घड़ी बनती चाय और पकौड़ों की महक, ताश के पत्ते, पिकनिक की जगह तलाशता बचपन, गर्मागर्म भुट्टों का स्वाद, पानी से भरी सड़कों पर बिना कीचड़ की परवाह किए बेझिझक भीगना और मम्मी की डांट कि बस बहुत हो गया बहुत भीग लिए, अब बस करो और भीगोगे तो बीमार पड़ जाओगे।
सब जैसे एक साथ किसी चलचित्र की तरह चल रहा है जामुन का स्वाद, सबसे सुंदर राखी चुन लेने की उत्सुकता और भी न जाने क्या- क्या....मेरे लिए तो इतना कुछ छुपा है इस सावन के मौसम में जिसे पूरी तरह व्यक्त कर पाना शायद मेरे बस में नहीं, बस एक यादों का अथाह समंदर है जिसमें यादों की ही लहरें उठ रही है। एक अजीब सी बेकरारी है। एक अजीब सा खिंचाव जो हर साल, हर सावन में, हर बार मुझे यूं हीं खींचता है अपनी ओर, और उन यादों के आवेग में मेरा मन बस यूँ हीं बहता चला जाता है किसी मदहोश इंसान की तरह जिसे मौसम का नशा चढ़ा हो। ना जाने क्यूँ कुछ लोग नशे के लिए शराब का सहारा लिया करते हैं। कभी कुदरत के नशे में भी खोकर देखें उसमें जो नशा जो खुमारी है वह शायद ही उस नशे में हो जिसे लोग नशा कहा करते हैं।
लेकिन इन सब चीजों के बाद भी सावन का यह महीना  एक चीज के बिना अधूरा है वह है संगीत। सावन के इस मौसम में चाय का कप और बारिश के पानी के साथ किशोर कुमार की आवाज... भला और क्या चाहिए जिंदगी में इस आनंद के सिवा...
रिमझिम गिरे सावन, सुलग- सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में लगी कैसी ये अगन...
संपर्क-     द्वारा- डॉ. एस.के. सक्सेना, 27/1, गीतांजलि काम्प्लेक्स,
               गेट नं. 3 भोपाल (मप्र)
               Email- pallavisaxena80@gmail.com

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अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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