May 30, 2012

पिछले दिनों

  • सादगी की नई मिसाल
गुजरात में नर्मदा जिले के आईएएस अफसर ने सामूहिक विवाह सम्मेलन में शादी रचाकर सादगी की नई मिसाल पेश की है। अक्षय तृतीया पर साबरकांथा जिले के भिलोड़ा तहसील में एक विवाह सम्मेलन में डिप्टी कलेक्टर विजय खराडी ने सात फेरे लिए। सन् 2009 में आईएएस परीक्षा पास करने वाले विजय ने स्कूल टीचर सीमा गरासिया से विवाह किया। विजय और सीमा दोनों आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। तड़क- भड़क से दूर आयोजित इस समारोह में विजय के चंद रिश्तेदार ही मौजूद थे। उनके भाई शिरीष ने बताया कि विजय चाहते तो बड़ा समारोह आयोजित कर सकते थे। लेकिन उन्होंने बेकार के खर्चो से बचने के लिए ऐसा किया। डूंगरी गरासिया समुदाय द्वारा आयोजित इस विवाह समारोह में कुल 35 जोड़ों ने शादी रचाई।
  • चाय अब हमारा राष्ट्रीय पेय
राष्ट्रीय खेल, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पशु के बाद राष्ट्रीय गौरव में एक नाम और शामिल होने जा रहा है वह है चाय। भारत सरकार ने घोषणा की है कि 17 अप्रैल 2013 से चाय राष्ट्रीय पेय बन जाएगी। असम में चाय का पहला पौधा उगाने वाले मणिराम दीवान की याद में यह एलान किया गया है। 2013 में मणिराम दीवान की 212वीं जन्मशती होगी। मणिराम दीवान जिन्हें इस इलाके में चाय की व्यावसायिक खेती शुरू करने के लिए जाना जाता है। असम से ब्रिटिश लोगों को बाहर निकालने के लिए 1857 के विद्रोह में उनके शामिल होने पर उन्हें फांसी की सजा दे दी गई थी।
आज भारत में चाय का जो सामाजिक और व्यवसायिक रूप है वो भारत में अंग्रेजों के हाथों शुरू हुई बड़े पैमाने पर इसकी खेती की देन है। अंग्रेजों ने इस देश में चाय की संस्कृति को शुरू किया और पाल पोस कर समृद्ध बनाया।
16 वीं सदी में जब पुर्तगाली व्यापारियों से यूरोप चाय मंगवाता था, तब इसे चा कहा जाता था। 1750 में चाय के जानकार चीन से एजोरस द्वीप गए और वहां चाय को जैसमीन और मैलो के साथ उगाया ताकि चाय को अलग खुशबू मिले। भारत के आदिवासी असम चाय का पौधा उगाते थे। बहरहाल अंग्रेजों की चाय की दीवानगी इसे भारत ले कर आई। उत्तर पूर्वी भारत की वादियों में इसकी खेती को व्यावसायिक रूप मिला, ब्रिटिश राज ने इससे काफी फायदा उठाया। चीन में जहां ग्रीन टी ज्यादा पी जाती है वहीं भारत में काली चाय ज्यादा पसंद की जाती है। समय के साथ इसे दूध में उबाले जाने की परंपरा शुरू हो गई।

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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