April 21, 2012

18 अप्रैल विश्व विरासत दिवस

आइए अपनी विरासत को बचाएं

हमारे पूर्वजों और पुराने समय की यादों को संजोकर रखने वाले इन अनमोल वस्तुओं की कीमत को ध्यान में रखकर ही संयुक्त राष्ट्र की संस्था युनेस्को ने वर्ष 1983 से हर साल 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस मनाने की शुरुआत की थी।
अतीत के पन्नों को हमारी विरासत के तौर पर कहीं पुस्तकों तो कहीं इमारतों के रुप में संजो कर रखा गया है।  हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए निशानी के तौर पर तमाम तरह के मकबरे, मस्जिद, मंदिर और अन्य चीजों का सहारा लिया जिनसे हम उन्हें आने वाले समय में याद रख सकें, लेकिन वक्त की मार के आगे कई बार उनकी यादों को बहुत नुकसान हुआ। किताबों, इमारतों और अन्य किसी रुप में सहेज कर रखी गई यादों को पहले हमने भी नजरअंदाज कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी अनमोल विरासत हमसे दूर होती गई।
लेकिन वक्त रहते हमने अपनी भूल को पहचान लिया और अपनी विरासत को संभालने की दिशा में कार्य करना शुरु कर दिया। पुरानी हो चुकी जर्जर इमारतों की मरम्मत की जाने लगी, उजाड़ भवनों और महलों को पर्यटन स्थल बना उनकी चमक को बिखेरा गया, किताबों और स्मृति चिह्नों को संग्रहालय में जगह दी गई। पर विरासत को संभालकर रखना इतना आसान नहीं है। हम एक तरफ तो इन पुरानी इमारतों को बचाने की बात करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ हम उन्हीं इमारतों के ऊपर अपने नाम लिखकर अपने पूर्वजों की दी हुई अनमोल वस्तु को खराब कर देते हैं।

कैसे मनाएं विश्व विरासत दिवस

 -अपने घर के आसपास के किसी पुरातत्व स्थल या भवन पर जाएं यदि एंट्री फीस हो तब भी वहां अवश्य घूमें। ताकि सरकार को इन पुरातत्व स्थलों की देखभाल के लिए शुल्क प्राप्त होता रहे।
-अपने बच्चों को पुरातत्व स्थल, किले, मकबरे आदि पर ले जाकर वहां के इतिहास के बारे में रोचक तथ्य बताएं जिससे आने वाली पीढ़ी भी हमारी संस्कृति और इतिहास से परिचित हो सके।
-पुरातत्व स्थलों पर देखा गया है कि लोग पिकनिक मनाने के बहाने खाने- पीने की चीजों को स्थल पर ही फैला देते हैं और वहां की दीवारों पर अपना नाम लिख देते हैं। ऐसा करके वे अपनी धरोहर को नुकसान पहुंचाते हैं।
जागरूकता नहीं है
भारत सरकार के नियमों के तहत धारा 49 के अनुसार राज्य सरकारों को प्रत्येक स्मारक, स्थान तथा ऐतिहासिक वस्तु की रक्षा करनी चाहिए। अनेक स्मारकों एवं वस्तुओं को भारत सरकार ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक महत्ता दी है। धारा 51 (अ) में लिखा गया है कि हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करे।
लेकिन फिर भी सरकार द्वारा सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए नियम पर्याप्त नहीं हैं। देखा गया है कि आम आदमी में इन ऐतिहासिक स्मारकों के प्रति कोई जागरूकता नहीं है। आज तक जितने भी नियम बनाए गए हैं तथा जितने भी सम्मेलन आदि आयोजित किए गए हैं, सब विफल रहे हैं। क्योंकि इन नियमों से भारतीय जनता अनभिज्ञ है। चाहे वह व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित, सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर लोगों में ऐतिहासिक स्थलों के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए।

1 Comment:

P.N. Subramanian said...

सही समय में एक सार्थक आलेख,

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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