January 31, 2012

अनूप रंजन पांडेय : सांस्कृतिक परंपरा को समर्पित कलाकार


छत्तीसगढ़ के आदिम लोक परंपराओं को हृदय में बसाये हुए अनूप रंजन नें छत्तीसगढ़ के अनेक लोक नाट्य विधाओं पर कार्य करते हुए धुर गांवों में दबी छिपी इन विधाओं का प्रदर्शन नागर नाट्य मंचों पर किया है।
रंगमंच और अभिनय अनूप पांडेय के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। जन्मजात प्रतिभा से युक्त अनूप ने विद्यार्थी जीवन में ही छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य 'नाचा' में जीवंत अभिनय कर अपनी योग्यता से स्थानीय कला जगत को परीचित करा दिया था। इन प्रदर्शनों से इन्हें सराहना मिलने लगी था। लगातार मिलते प्रोत्साहन नें उन्हें इस क्षेत्र में और बेहतर कार्य करने हेतु प्रेरित किया और इस तरह अनुप छुटपुट नाट्य प्रदर्शनों में सक्रिय होते चले गए। अनूप की प्रतिभा में निखार एवं प्रदर्शनकला में उत्कृष्टता प्रसिद्ध रंककर्मी हबीब तनवीर के 'नया थियेटर' से जुडऩे पर आई। इसके बाद लगातार प्रसिद्धि लोकप्रिय नाटकों की सफल प्रस्तुति का निरंतर दौर चल पड़ा। देश के लगभग सभी मुख्य मंचों और आयोजनों के साथ- साथ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनी अभिनय क्षमता का परचम फहराते हुए 'जिन लाहौर नई देख्या मुद्राराक्षस, वेणीसंहारम, मिड समर नाईटस् ड्रीम, चरणदास चोर, आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन, ससुराल, राजरक्त, हिरमा की अमर कहानी, सड़क, मृग्छकटिकम' जैसे नाटकों में अनूप का अभिनय जिस तरह से जीवंत हुआ है वह अविस्मरणीय है। अनूप द्वारा अभिनीत भूमिकाओं को दर्शकों के साथ- साथ नाटय सुधियों, निर्देशकों और समीक्षकों द्वारा लगातार सराहना मिलती रही है।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अनूप रंजन पांडेय नाटकों में अभिनय के अलावा निर्देशन, संयोजन, संगीत, गाथा और नाट्य तथा लोक की सांस्कृतिक परम्परा में अच्छी पकड़ रखते हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में उनका जन्म हुआ है। प्रारंभिक शिक्षा के साथ वाणिज्य और सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर की उपाधि भी उन्होंने बिलासपुर से ही प्राप्त की है। रायपुर से पत्रकारिता में स्नातक, भोपाल से पी.जी.डिप्लोमा, तथा इंदिरा कला एवं संगीत विद्यालय खैरागढ़ से लोक संगीत में डिप्लोमा प्राप्त किया है। बाद में अनूप रंजन साक्षरता के यज्ञ में राज्य संसाधन केन्द्र, भोपाल से जुड़े और लगभग 50 से अधिक नवपाठक साहित्य का संपादन किया जिसमें हिन्दी के अलावा गोंड़ी, भतरी, हल्बी, दोरली एवं छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित सामग्री उल्लेखनीय है। अपने क्षेत्र में देश की सर्वोच्च संस्था- संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के लिए वे छत्तीसगढ़़ राज्य के नामित प्रतिनिधि हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रति गहरा लगाव एवं नाटक के संगीत पक्ष और वाद्यों की गहरी समझ रखने वाले अनूप ने छत्तीसगढ़़ के गांव- गांव घूमकर पारम्परिक लोकवाद्यों का अध्ययन और संग्रह किया है। उनका यह संग्रह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा संग्रह है जिसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल द्वारा भिलाई में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला- सह- प्रदर्शनी 'चिन्हारी' में रेखांकित किया गया। इस आयोजन में उनके द्वारा संग्रहित वाद्ययंत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसके माध्यम से पहली बार छत्तीसगढ़़ की समृद्ध लोक सांगीतिक परम्परा और वाद्यों से विशेषज्ञों और आम जन का परिचय हुआ। अनूप ने बड़े श्रम से लुप्तप्राय वाद्ययंत्रों का संग्रह किया है। इतना ही नहीं उन्होंने अपना यह संग्रह स्वेच्छा से छत्तीसगढ़़ के संस्कृति विभाग के संग्रहालय को प्रदर्शन के लिए स्थायी रूप से दे दिया है ताकि यहां आने वाली जनता छत्तीसगढ़ की संस्कृतिक परंपरा से जुड़े इन वाद्ययंत्रों का जीवंत स्वरूप देख सके।
छत्तीसगढ़ के आदिम लोक परंपराओं को हृदय में बसाये हुए अनूप रंजन ने छत्तीसगढ़ के अनेक लोक नाट्य विधाओं पर कार्य करते हुए धुर गांवों में दबी छिपी इन विधाओं का प्रदर्शन नागर नाट्य मंचों पर किया है। छत्तीसगढ़़ की एक विशिष्ट और लुप्तप्राय नाट्य विधा 'तारे- नारे' को पुनर्जीवित करने का बीड़ा भी अनूप ने उठाया है। इसके विकास में वे लगातार संघर्षशील हैं। 'तारे- नारे या 'घोड़ा नाच' नाट्य विधा छत्तीसगढ़़ की विशिष्ट निजता और पारम्परिकता से सम्पन्न है, जिसका कथ्य 'आल्हा गाथा पर आधारित है। अनूप ने लुप्तप्राय इस नाट्य विधा का संयोजन तथा निर्देशन किया है जिसका प्रदर्शन पूर्व में छत्तीसगढ़़ राज्योत्सवों में किया गया था। 'तारे- नारे के संरक्षण संवर्धन और प्रदर्शन के प्रति उनकी निष्ठा और कार्य से प्रभावित होकर दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र नागपुर ने अनूप का नाम भारत सरकार के 'गुरू शिष्य परंपरा योजना के तहत गुरू के रूप में सम्मानित किया है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में बिसरते समस्त पारंपरिक नृत्यों को एकाकार कर उसे मूल रूप में भव्य रंगमंच में प्रस्तुत करने की योजना पर उनका कार्य अभी चल रहा है। बस्तर के सभी पारंपरिक नृत्यों को जोड़कर अनूप ने 'बस्तर बैंड' की स्थापना की है। 'बस्तर बैंड' बस्तर के सांस्कृतिक पहलुओं का जीवंत चित्रण है जिसमें मूल वाद्ययंत्रों के साथ घोटुल व जगार का परिदृश्य है, तो धनकुल की गूंज के साथ करमा की थिरकन है। अनूप ने अपने बेहतर निर्देशन व अभिनय कला से इसे सींचा है एवं अनुभवों से कसा है ।
इन कार्यों के अतिरिक्त अनूप रंजन अभिनय, रंगमंच और संगीत की महत्वपूर्ण कार्यशालाओं में लगातार शिरकत करते रहे हैं। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय भोपाल, संस्कृति विभाग रायपुर, संगीत नाटक अकादमी दिल्ली, संस्कृति विभाग सिक्किम आदि के कार्यक्रमों एवं कार्यशालाओं में भी निरंतर उनकी भागीदारी रही है। एसोसिएशन ऑफ इंडियन युनिवर्सिटी दिल्ली तथा नेहरू युवा केन्द्र (खेल एवं युवा मंत्रालय) भारत सरकार के युवा उत्सव आयोजन में विशेषज्ञ एवं जूरी सदस्य के रूप में भी उन्होंनें युवाओं को प्रोत्साहित किया है व विभिन्न संस्थाओं- बालरंग, बिलासा कला मंच, चित्रोत्पला लोककला परिषद, चिन्हारी, जन शिक्षा एवं संस्कृति समिति, अभिव्यक्ति भोपाल आदि से सम्बद्ध रह कर नाट्य कला गतिविधियों में सतत् संलग्न हैं। उन्हें अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अनूप रंजन का मानना हैं कि कला जगत में जो थोड़ी बहुत उपलब्धि उन्होंने आज हासिल की है उसमें हबीब तनवीर जी का अह्म योगदान है। आज वे जो कुछ भी हैं वह हबीब जी के कारण ही हैं।
संपर्क- संजीव तिवारी, ए 40, खण्डेलवाल कालोनी दुर्ग 491001 मो। 09926615707, Email: tiwari.sanjeeva@gmail.com

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