November 10, 2011

दिल हूम हूम करे ... भूपेन हजारिका


- सुप्रिया रॉय
भूपेन हजारिका कई भाषाओं में गाते रहे है, असमिया में अपने गीत और कविता लिखते रहे हैं। भूपेन हजारिका सही मायनों में सांस्कृतिक राजदूत के रूप में विदेशों में भारत की छबि पेश करते रहे। वे व्यापक रूप से मास कम्युनिकेशन, काव्य, संगीत, कला प्रदर्शन के सप्त सुरों में मंजे हुए कलाकार थे।
डॉ.भूपेन हजारिका भारत की सांस्कृतिक विरासत के दिग्गज हस्ताक्षर रहे हंै। उनकी आवाज में जो बंजारापन था वह उनको लोककला का चितेरा बनाता था। उनके संगीत में लोक संस्कृति की, माटी की सौंधी खुशबू थी। बीते महीने प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह के निधन के बाद संगीत जगत सूनेपन की धुन्ध से निकल नहीं पाया था कि 5 नवंबर को भूपेन हजारिका के देहावसान की खबर ने भारतीय संगीत जगत को एक नए अवसाद का सुर दे दिया।
दादासाहब फाल्के पुरस्कार विजेता हजारिका ने एक साक्षात्कार में कहा था मैं लोकसंगीत सुनते हुए ही बड़ा हुआ और इसी के जादू के चलते मेरा गायन के प्रति रुझान पैदा हुआ। मुझे गायन कला मेरी मां से मिली है, जो मेरे लिए लोरियां गातीं थीं। मैंने अपनी मां की एक लोरी का इस्तेमाल फिल्म रुदाली में भी किया है।
अद्भुत प्रतिभा वाले इस कलाकार का जन्म 8 सितंबर, 1926 को भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम के सादिया में शिक्षकों के एक परिवार में हुआ। केवल 13 साल 9 महीने की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा तेजपुर से की और आगे की पढ़ाई के लिए गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया। यहां उन्होंने अपने मामा के घर में रह कर पढ़ाई की। इसके बाद 1942 में गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से इंटरमीडिएट किया और फिर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहां से उन्होंने 1946 में राजनीति विज्ञान में एमए किया। इसके बाद न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। अमेरिका में उनका परिचय पॉल रॉब्सन से हुआ और बाद में दोनों के बीच अच्छी मित्रता हो गई। रॉब्सन का काफी असर भूपेन हजारिका पर दिखता है। रॉब्सन का संभवत: सबसे चर्चित गीत 'ओल मैन रिवर' है, जिसमें एक अश्वेत नाविक मिसिसिपी नदी के रूपक से अपनी व्यथा कहता है। भूपेन हजारिका जिस गाने से भारत भर में चर्चित हुए, वह 'गंगा' है और यह गाना एक तरह से 'ओल मैन रिवर' का भारतीय रूपांतरण है। हजारिका ने इस गीत को बांग्ला और असमिया में भी गाया है, असमिया में यह नदी ब्रह्मपुत्र है। इसी तरह अपने कई असमिया गीतों का हिंदी रूपांतरण हजारिका ने किया, जिनमें गहरी सामाजिक चेतना है। विभिन्न भाषाओं की तीस से ज्यादा फिल्मों से वह गायक, संगीतकार, गीतकार, लेखक या निर्माता की तरह जुड़े रहे हैं।
भूपेन हजारिका ने 1939 में एक बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में अपने कैरियर की शुरुआत की थी और 10 साल की उम्र में अपना पहला गीत गाया था जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। असमिया भाषा की फिल्मों से भी उनका नाता बचपन में ही जुड़ गया था। उन्होंने असमिया भाषा में निर्मित दूसरी फिल्म इंद्रमालती के लिए 1939 में काम किया। असमी भाषा के अलावा हजारिका ने 1930 से 1990 के बीच कई बंगाली और हिंदी फिल्मों के लिए गीतकार, संगीतकार और गायक के तौर पर काम किया।
वे कवि, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक और बहुत उच्चतम ख्याति के फिल्म निर्माता रहे हैं। भूपेन दा की रचनाओं की वेदना की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है एक दफा जब वे नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना श्मानुहे मनोहर बाबेश को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं की अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए। भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद श्मानुष मनुषेरे जन्में, को बीबीसी की तरफ से साँग्स ऑफ द मिलेनियम के खिताब से नवाजा गया। सिनेमा में उनकी लोकप्रियता के कारण 1967-1972 के लिए एक स्वतंत्र सदस्य के रूप में विधानसभा के लिए चुने गए।
कई असमिया, बंगाली और 1930 के दशक से 1990 के दशक तक हिंदी फिल्मों के लिए भूपेन हजारिका संगीत देते रहे हैं और पिछले 40 वर्षों में असमिया फिल्मों के सर्वोच्च शिखर रहे हैं। उन्होंने बंगाली फिल्मों में भी संगीत का निर्देशन किया तृष्णा, कारी ओ कोमल, दंपति, चमेली मेमसाब और उनकी लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में लंबे समय की उनकी साथी कल्पना लाजमी के साथ की रुदाली, एक पल, दरमियां, दमन और क्यों शामिल हैं। रुदाली फिल्म का गीत दिल हुम हुम करे... बहुत लोकप्रिय हुआ।
भूपेन हजारिका की लोकप्रियता इतनी जबरदस्त रही है कि उन्होंने पिछले 50 वर्षों तक पूर्वोत्तर को मुग्ध किये रखा। उनको 1991 में अपने गायन कैरियर की स्वर्ण जयंती के लिए सम्मानित किया गया। वे असम के कवियों में से एक रहे हैं और उन्होंने एक हजार से अधिक गीत, कविता और बाल गीत गाया है तथा पन्द्रह से अधिक पुस्तकें लिखी हैं।
छियासी साल के हजारिका को 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें नेशनल अवॉर्ड एज दि बेस्ट रीजनल फिल्म (1975), चमेली मेमसाब के संगीतकार के तौर पर 1976 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार दिया गया। फिल्म शकुंतला, प्रतिध्वनि और लोटीघोटी के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी दिया गया। भारत के ग्रामोफोन कम्पनी ने भारतीय संगीत की दिशा में उत्कृष्ट योगदान के लिए 1978 में उसे गोल्ड डिस्क दिया। 1967 से 1972 के बीच असम विधानसभा के सदस्य रहे हजारिका को 1977 में पद्मश्री 2011 में पद्म भूषण, 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड (2009) जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके संगीत में समग्र योगदान के लिए लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया था।
हजारिका ने हमें दिल हूम हूम करे.., ओ गंगा बहती हो.., बीते ना बीते ना रैना कोरे हैं नींद से नैना.. जैसे गाने दिए मगर उनका अपना पसंदीदा गीत श्मोई एती जाजाबोरश् (मैं तो यायावर यानी घुमक्कड़ हूं) था। भूपेन हजारिका की लंबे समय तक साथी रहीं फिल्मकार कल्पना लाजमी ने हजारिका के निधन के बाद उन्हें अद्वितीय शख्सियत बताया और कहा कि वह अद्वितीय थे.. हमें दूसरे हजारिका नहीं मिल सकते.. उन्हें याद करते हुए कल्पना ने कहा कि मेरा उनके साथ 29 साल से संपर्क था। मैंने अपने पिता, भाई, प्रेमी, पति, दोस्त, मार्गदर्शक और सलाहकार को खो दिया है।

संपर्क- डी 598 ए सी आर पार्क नई दिल्ली- ११००१९, मो. 9811162227
Email: supriya.roytomar@gmail.com

1 Comment:

Devi Nangrani said...

Unki kashamtaon ko Hamara Naman. AAj hi Juhu par uunke jeevan se jude anek pahuluon par batein hui aur unke Onche Kirdaar ko hamara sahity, sangeetmay jagat hamesh krini rahega

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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