November 03, 2020

आलेख- मीठे होते रिश्ते

- डॉ. महेश परिमल

अब तक जीवन तो नहीं, पर हम  तेज़ी  से भाग रहे थे। उसी जीवन को अनदेखा करते हुए, जिसके लिए हम जीना चाहते हैं। कई बार ज़िंदगी  ने हमें रोकने की कोशिश की, ज़रा थम जाओ, इतनी  तेज़ी  से कहाँ भागे जा रहे हो। रुक  लो,  साँस ले लो, घर-परिवार की ओर भी एक नर डाल लो। बच्चों से बात कर लो। पत्नी का हाल-चाल पूछ लो। बूढ़े माता-पिता के पास बैठकर अपना बचपन याद कर लो। इन सारी बातों को छोड़कर हम सब भागे जा रहे थे। हम कहाँ भाग रहे थे, हमें खुद ही इसका पता नहीं था। भागना हमारी नियति थी। क्योंकि सभी भाग रहे थे। ज़िंदगी  को छोड़कर किसी बियाबान की तरफ...।

इस भागती ज़िंदगी  पर अचानक कोरोना ने ब्रेक लगा दिया। लगा, सब कुछ थम गया। अचानक आए इस अवरोध के लिए कोई तैयार ही नहीं था। अब क्या होगा, यह सवाल हर कोई एक-दूसरे से पूछ रहा था। जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। ज़िंदगी  थम गई, पर नहीं थमी, तो वह थी जिजीविषा। रोजी-रोटी तो चलानी ही थी। इसलिए घर ही सभी का केंद्र बिंदु हो गया। घर में ही रहकर जाना कि घर क्या होता है ? अब तक तो यह हमारे लिए किसी धर्मशाला से कम नहीं था। आपाधापी में हम सब कुछ भूल गए थे।

इस बीच कई त्योहार आए। पहले आया होली, तब सभी ने महसूस किया अपनों के बीच अपनापा। सारी कटुता रंगों में घुल गई। एक नई ज़िंदगी  हमारा इंतजार करने लगी। घर के सदस्यों के बीच वार्तालाप बढ़ने लगा। सभी एक-दूसरे को समझने लगे। जो दूरियाँ थीं, वह सिमटने लगी। कभी हँसी-मजाक भी हो जाता। अपनों की हँसी इतनी निश्छल होती है, यह पहली बार जाना। इस हँसी में घुल गई सारी कटुता। हम सब करीब आए। इसी बीच बच्चे को पता चला कि पापा इतना अच्छा गा भी लेते हैं। पापा का यह रूप तो केवल मम्मी की यादों में ही था। भैया तो बाँसुरी कितनी अच्छी बजा लेता है, किसी को पता है। दीदी की तो न पूछो, वह तो मन्ना डे के शास्त्रीय गाने कितने अच्छे से गा लेती है, किसी को पता है। मम्मी ने तो कथक में एम.ए. किया है, यह तो किसी को भी नहीं पता। सभी जानते हुए भी एक-दूसरे की प्रतिभाओं से अजान थे। पोते को भी पहली बार पता चला कि 75 साल की दादी माँ इतनी सुरीली आवाज में भजन गाती हैं। उनके पोपले मुँह से भजन सुनना कितना आह्लादकारी था, यह किसी ने नहीं जाना था। अरे! सब छोड़ो, मम्मी अकेले ही कितनी अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ बनाती हैं, यह किसने जाना था। पता चला कि यदि सभी का थोड़ा-थोड़ा सहयोग मिल जाए, तो मम्मी बहुत-कुछ कर सकती है।

सब-कुछ नया-नया-सा लगने लगा। इस कोरोना ने जीवन को पूरी तरह से ऊर्जामय कर दिया। कई प्रतिभाएँ सामने आईं। सभी कुछ न कुछ नया करने लगे। बाहर जाने पर बंदिशें थीं, तो घर पर ही अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिला। साधन सीमित थे, पर संभावनाएँ अपार थीं। पता चला कि जो चींजे अब तक बाजार से ला रहे थे, उससे अच्छा तो हम बना लेते हैं, भले ही वह पिज्जा, बरगर हो या फिर कुछ और सामान। घर में ही रखे सामान से हमने कुछ ऐसा बना लिया, जो सभी को भला लगा। सृजन के इस आनंद का लाभ सभी ने लिया। अखबार-टीवी से पता चला कि बाकी दुनिया के हाल तो बहुत ही बुरे हैं। विषाद के इन क्षणों में हमारा सृजन- संसार काफी विस्तृत हो गया। हम स्वावलम्बी हो गए। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया गया हमारा यह कदम हमें किन ऊँचाइयों तक ले गया, इसका हमें पता ही नहीं था। जब अपनों की दृष्टि हमारे सृजन की ओर गई, तब पता चला कि हमारे भीतर का अकुलाता कलाकार बाहर आ गया है। रिश्ते मीठे होने लगे हैं।

अब हम सब अपनी जड़ों की ओर लौटने लगे हैं। उन जड़ों को, जिन्हें हम कब का छोड़ चुके थे। अतीत का हिस्सा बन गई थीं हमारी जड़ें। आज पता चला कि सचमुच कितनी मजबूत हैं हमारी जड़ें। अब जाना कि कितने त्योहार होते हैं, जो अपनों को अपने से मिलाने का काम करते हैं। संकोच की दीवारें टूटीं, लोग खुलकर बतियाने लगे। जिस पापा के घर आते ही सन्नाटा छा जाता था, उसी पापा को बच्चे घोड़ा बना रहे थे। दादा-दादी या फिर नाना-नानी से जाना कि उनका कितना महत्त्व है, हमारे जीवन को चलाते रहने में। जीवन की संतुष्टि देने का काम कर रहे हैं सभी। अब तक जो चीजें कबाड़ की शोभा थीं, वही चीजें नए रूप में हमारे सामने आ गईं। सावन सोमवार, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी के अलावा जन्म दिन भी इस बार विशेष लगे। ये सब हमसे कब छूटकर अलग हो गए थे, फिर हमसे आ मिले।

अब हमने जाना कि साफ-सफाई का जीवन में कितना महत्त्व है। घर में जड़ी-बूटियों से बनने वाली जो चीजें हमें नहीं भाती थीं, वही अब जायकेदार लगने लगी हैं। अब जाना कि आखिर दादी और माँ रोज पेड़ों की पूजा क्यों करती थीं। अब जाना कि आँगन में तुलसी का पौधा कितना रूरी है। त्योहार क्यों रूरी है। उसी से हमने पाई ऊर्जा। हममें मिलनसारिता बढ़ गई है। हम सब काफी करीब आ गए हैं, कभी न दूर जाने के संकल्प के साथ। सोचो, यदि कोरोना का यह कहर न होता, तो क्या हमें इस तरह के जीवन के दर्शन होते? आभार कोरोना, मजबूरी में अवसर तलाश करने की शक्ति देने का....

सम्पर्कः टी-3 204, सागर लेक व्यू, वृन्दावन नगर, भोपाल- 462022 मोबाइल- 0997727625

1 Comment:

Sudershan Ratnakar said...

सरल ढ़ंग में सही बात कही है।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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