August 13, 2020

दुःख का आशीर्वाद

दुःख का आशीर्वाद
- विजय जोशी 
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)

जब रामसीता और लक्ष्मण सहित चौदह वर्षो के लिये वन जाने लगे तथा सबसे विदा ले चुके तो अंत में वे आर्शीवाद लेने के लिये गुरू वशिष्ठ के पास गए।
वशिष्ठ ने कहा - राम यदि वन जाने के लिये तुम्हारा मन न हो तो मुझे नि:संकोच कह दो। मैं अभी यह आज्ञा रद्द करवा दूँगा।
      राम की आँखें छलछला आईं। उन्होंने माता को कहे वचन एक बार दोहरा दिये-
धरन धुरीन धरम गति जानी,
कहेउ मातु सन अति मृदु बानी
पितां दीन्ह मोहि कानन राजु,
 कहं सब भाँति मोर बड़ काजु
     गुरुदेव माता- पिता ने मुझे वन का राज्य दिया हैजहाँ सब प्रकार से मेरा बड़ा काम बनने वाला है।  और यह कहते हुए  तत्काल वशिष्ठजी के चरणों में सिर नवाकर वह बोले - क्षमा करेंभगवन ! राम को सुख नहीं चाहिये। सुख के लिये मेरा जन्म नहीं हुआ। राम तो आज आपसे दुःख माँगने आया है। मुझे आशीर्वाद देंगुरुदेव,  दुःख का आशीर्वाद।
       दुःख क्यों वत्स - वशिष्ठ ने अचरज में भरकर पूछा।
       राम ने झुके नेत्रों से वशिष्ठ के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा - देव ! इन श्रीचरणों की ही तो शिक्षा है कि सुख का देश केवल योजन भर का हैलेकिन दुःख का देश आकाश की तरह निस्सीम। मुझे योजन भर के देश का राजा बनना मान्य नहीं है। मैं आर्य हूँपराक्रमी हूँ और आपका शिष्य हूँ। मुझे नि:सीम देश का राज्य चाहि। प्रभु ! राम को सीमा मत दीजिए, विस्तार दीजि
    राम की लगन में देश की सनातन साधना को इस प्रकार फलीभूत होते देख मुनि वशिष्ठ का ह्दय आनंद विभोर हो उठा। उन्होंने राम को ह्दय से लगा लिया- जाओ वत्स! दुःख की खोज में जाओ। सीमाएँ ही नहींकाल भी तुम्हें शीश नवाएगा।
याद रहे दुःख की घड़ी में ही हम आत्मचिंतन तथा अंतस् का विश्लेषण कर पाते हैं। स्वयं से साक्षात्कार का यही अवसर है। सुख में सुमिरन की किसे चिंता रहती है। आदमी यदि वही कर ले तो फिर दुःख ही क्यों उपजे। 
    मानस के मैनेजमेंट मंत्र
1. मूल्य : मूल्यसिद्धांत एवं मर्यादापूर्ण आचरण का व्यक्तित्व में समावेश। एक संपूर्ण जीवन संहिता 
2. नेतृत्व : विकेंद्रित। समूह में हर एक को अपनी प्रतिभा तथा क्षमता के अनुसार योगदान का अवसर। उदाहरण हनुमानजामवंतनलनील।
3. अंत्योदय : समाज में अंतिम छोर पर बैठे आदमी के हित को ध्यान में रखते हुए  संवेदनशीलता सहित कार्य। उदाहरण शबरीकेवट।
4. न्यायप्रियता : लोभरहित सत्य परायणता। विस्तारवादी भाव से सर्वथा परे सुग्रीव एवं विभीषण को किष्किन्धा तथा लंका के राज्य सौंपे।
5. त्यागयुक्त आदर भाव : गुरु एवं गुणीजन का आदर। पिता की आज्ञा पर तुरंत राजपद का त्याग। इसी प्रकार अयोध्या लौटने पर लंका विजय का सारा श्रेय दिया अपने गुरु को 
 गुरु वशिष्ठ कुल पूज्य हमारे,
तिनकी कृपा दनुज रन मारे।

सम्पर्क : 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

5 Comments:

Vijendra Singh Bhadauria said...

Lord Rama knew that in order to expand, one needs to leave the comfort zone. Therefore he decided to forgo all his comforts and thus expanded himself limitlessly.

Very beautifully explained
Jai Shri Ram!!

विजय जोशी said...

विजेंद्र, हार्दिक धन्यवाद. आप भी आचरण से राम ही हैं.

Unknown said...

Blessings in disguise, always exist...ATI Utam👍👍

Sorabh Khurana said...

Very well scripted.Blessings in disguise, always exist...

विजय जोशी said...

Dear Sorabh,I'm aware about Your passion for reading. Thanks very much

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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