February 11, 2020

बुनकर पक्षी

बया का खूबसूरत घोंसला
बया पक्षी बुनकर पक्षी समुदाय का सदस्य है इसका वैज्ञानिक नाम Ploceus philippinus  है  यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। यह खासकर जंगलो और खेतों में निवास करता है। इसकी प्रजातियों का रंग अलग अलग होता है। नर पक्षी पीले और काले रंग के होते है। मादा बया का रंग भूरा होता है। कुछ ऑरेंज रंग के भी होते है। इनका आकार 5 से 10 इंच के बीच में होता है। वैसे बया पक्षी गोरैया के आकार की होती है और कुछ कुछ दिखाई भी गौरैया की तरह ही देते हैं। इनकी चोंच गौरेया से मोटी होती है।

बया एक ऐसा पक्षी है जो पेड़ की शाखाओं पर नहीं बल्कि उस की डाल पर लटकते हुए खूबसूरत घोंसले बनाता है। ये घोंसले आकार में लौकी की तरह लगते हैं। बया का घोंसला एक बेहतरीन कारीगरी होता है। घोंसला नर पक्षी बनाता है और वह मादा को इससे रिझाता है। कभी कभी मादा पक्षी नर के बनाये घोसले का निरक्षण भी करती है। मादा बया घोसले को देखकर ही नर के पास आती है।  बया के घोसले की बनावट जटिल होती है। सभी पक्षियों के घोंसले में बया पक्षी का घोसला सबसे अनोखा होता है, इसे बुनकर पक्षी भी कहा जाता है।
बया का घोंसला पत्तियों, छोटी टहनियों, घास से मिलकर बना होता है। बया अपने इस घोसले में रोशनी की व्यवस्था भी करती है। बया हर बार एक नया घोंसला बुनती है। लेकिन यह एक ही पेड़ पर बार बार घोसला बना लेती है। नर बया घोंसला बनाने के लिए करीब 500 बार उड़कर लंबी घास और पत्तियाँ लाता है, इसके बाद यह अपनी चोंच से तिनकों और लम्बी घास को आपस में बुन देता है। ये ऊपर की तरफ से पतले और बीच मे मोटे गोल होते है। इसके घोसले का निकासी भाग सकरा टयूब की तरह होता है। घोंसला पूरी तरह बनने में 28 दिन का समय लगता है।  बया अक्सर अपना घोंसला पेड़ के पूर्वी दिशा में बनाना पसंद करता है। घोंसला बनाने के बाद ही नर पक्षी मादाओं को आकर्षित करने के लिए पंखों को हिला कर मधुर आवा निकालता है, नर और मादा बया पक्षी घोंसला बनने के बाद मिट्टी के गिले टुकड़े लाकर इस घोसले को और मजबूत बनाते हैं।
एक ही पेड़ पर अधिक संख्या में घोसले होने के कारण, यह पेड़ बया की कॉलोनी की तरह दिखता है। बाया एक सामाजिक पक्षी है इसलिए एक पेड़ पर 60 पक्षियों के घोंसले तक देखने को मिल जाते हैंबया पक्षी की एक कॉलोनी में 200 से अधिक घोसले पाए जाते हैं।
बया पक्षी-समूह में रहना पसंद करती है और काफी शोरगुल करती है। यह अपने घोसले पानी के निकट बनाती है या फिर उन टहनियों में बनाती है, जो पानी के ऊपर हों। अमूमन काँटेदार या ताड़ के वृक्षों में यह अपना घोसला बनाना पसन्द करती है; क्योंकि इसकी वजह से इसके बच्चों को परभक्षियों से सुरक्षा प्रदान होती है।
बारिश का मौसम आने से पहले यह पक्षी घोंसला बनाता है। बया को बारिश का सटीक पूर्वानुमान होता है। ये ज़्यादातार खेतों के आसपास रहते है; क्योंकि खेतों में इन्हें अनाज आसानी से मिल जाता है। ये खेतो के आसपास के पेड़ों की डालियों पर घोंसला बनाते हैं। इनके घोसले उन डालियों पर भी होते है ,जो नदियों या तालाबों के ऊपर से गुजरती हैं।  जिन पेड़ों पर यह पक्षी घोसला बनाता है, वे ज्यादातर काँटेदार होते हैं, जिससे शिकारी जानवरों से इनके बच्चों का बचाव होता है। अक्सर इस पक्षी को बबूल के पेड़ पर घोंसला बनाते देखा गया है। बया पक्षी के घोसले इतने मजबूत होते हैं कि ते  आँधी में भी ये डाली से नीचे नहीं गिरते है। ये घोसले अपनी पकड़ डाली से बना रहते है।
मादा बया दो से चार सफेद अंडे देती है, इन अंडों को 14 से 17 दिनों तक सेया जाता है, नर और मादा दोनों बया पक्षी बच्चों को खाना खिलाते हैंकेवल 17 दिन के बाद ही बच्चे घोसला छोड़ देते हैं।
बया का मुख्य भोजन अनाज होता है। बया को किसान का दुश्मन भी कहते है ; क्योंकि यह खेतों की फसलों से बीज खाती है। इससे पकी-पकाई फसल खराब हो जाती है। यह कीड़े-मकौड़े भी खाते हैं। कई प्रकार के बीज भी खाते है। बया पक्षी की आवाज चीं- चीं की होती है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होने से इन पक्षियों का आशियाना खत्म हो रहा है और बया पक्षी विलुप्ति के कगार पर है।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष