September 15, 2019

लघुकथा

छूटा हुआ सामान


-डॉ. शील कौशिक 
 विवाह के बाद ससुराल से पहली बार मायके लौटी तनुजा का मन उड़ा जा रहा है। पहले दिन वह माँ-बाबूजी के ढ़ेरों प्रश्नों के उत्तर देती रही,कुछ छुपाती रही, कुछ मन खोल कर बताती रही आस-पड़ोस की ताई-चाची से आसीसें बटोरती रही। दूसरे दिन सुबह उठते ही माँ शुरू हो गई, “तनु बेटा! आज दामाद जी आने वाले हैं, अपने बैग में सामान जमा लो, जल्दी में कुछ छूट जागा
तनुजा को शीघ्रता से दरवाजे से बाहर निकलते देख माँ ने टोका, “ कहाँ जा रही है तनु?”
अभी आई माँ,” यह कह कर वह निकल गई, अपने मोहल्ले में रह रही सहेली मीना के घर की तरफ रास्ते में पड़ोस की ताई ने रोक लिया, “बिटिया कल तो तू ससुराल चली जाएगी...आ...मैंने खीर बनाई है...तुझे तो बहुत पसंद है ना...कहते हुए ताई हाथ पकड़कर ले गई।
मीना उसे देखते ही फूल सी खिल उठी। खट्टी-मीठी बातें करते कब दो घंटे बीत गये, पता ही न चला। घर वापिस आई तो माँ रसोई में उसकी पसंद की हरी मैथी वाली मट्ठियाँ बना रही थी।
बेटी अपना सामान इकठ्ठा कर लो, कुछ छूट गया तो तुम्हें ही परेशानी होगी।
माँ एक बार बाजार से जरूरी सामान लेने जा रही हूँ,” कह कर तनुजा बिना उत्तर सुने घर से बाहर निकल ही गई। बाजार में उन दुकानों पर पहुँची ,जहाँ से वह हेयर पिन व क्लिप, रबर बैण्ड, रिबन, चूड़ियाँ आदि खरीदती थी।
अरी बिटिया! बहुत दिन बाद दिखाई पड़ी हो, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?” दुकान वाले काका बोले।
काका ,अब मेरी शादी हो गई है, दो क्लिप, हेयर बैण्ड दे दीजिए।
बस यही, यह लो। और ये चूड़ियाँ हमारी तरफ से शादी का तोहफ़ा समझो बिटिया।उसके बाद तनुजा ने सामने वाली दुकान से वही पेन खरीदा ,जो वह कॉपी-किताबों के साथ यहाँ से अक्सर खरीदा करती थी।
वापिस आई, तो माँ ने फिर याद दिलाया, “बेटी अपना सामान अटैची में जमा लो, दामाद जी ज्यादा देर नहीं रुकने वाले।
अच्छा माँ!कहकर वह तुरंत पलटी और फिर दरवाजे से बाहर हो गई। उन गलियों से गुजरती हुई जहाँ वह छुपम-छुपाई व उछल-कूद करती थी, नीम के उस विशाल वृक्ष के पास पहुँचीI यहाँ वह सहेलियों संग झुला झूलती और सबसे ऊँची पींघ लेने के लिए मचल जाया करती थी। कितनी ही देर तक निहारती रही उस खामोश खड़े पेड़ को और यादों के झूलों में झूलती रही तनुजा। माँ के कठोर चेहरे की याद आते ही वह फिर घर की तरफ भागी।
 रसोई से उठती हुई खुशबू से पता लगा कि माँ रसोई में दामाद के लिए जरूर कोई पकवान बना रही है। वह चुपके से रसोई में गई। माँ साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। उसे देखते ही माथे पर त्योंरियाँ  चढ़ाकर गुस्से में बोली, “तेरे पाँव में टिकाव ना है, यहाँ-वहाँ उड़ती फिर रही है छोरी।
फिर उसके मासूम से चेहरे को देखकर माँ की आँखें नम हो गई व भर्राई आवाज में बोली,
कितनी बार कहा है तुझे, अपना सामान समेट ले बेटा!
माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ,” कह कर वह फफक-फफककर रो पड़ी और माँ के गले में झूल गई।

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