September 15, 2019

पोलाः



नंदी बैल की पूजा का पर्व

छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषिप्रधान राज्य है। धान की खेती यहाँ की प्रमुख फसल है। चूंकि कृषि कार्य में पशुओं का विशेष योगदान रहता है इसलिए पशुओं को पूजने की परम्परा हमारी संस्कृति में पुरातन काल से ही रही है। पोला भी हमारे किसानों से जुड़ा पर्व है, इस दिन बैलों की पूजा का विधान है। पोला त्योहार किसानों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। किसान पोला के दिन तक धान की बोआई कर चुके होते हैं और अपनी फसल की अच्छी उपज की कामना में वे पोला के दिन खुशियाँ बनाते हैं।
छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला पोला पर्व भादो माह की अमावस्या तिथि को खरीफ फसल के दूसरे चरण का कार्य (निंदाई गुड़ाई) पूरा हो जाने के बाद मनाते हैं। पोला त्योहार मनाने के पीछे जो परम्परा प्रचलित है उसके अनुसार इसी समय अन्नमाता गर्भ धारण करती है अर्थात् धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है, जिसे यहाँ  'पोठरी पान" कहते हैं। पोला को छत्तीसगढ़ी बोली में पोरा कहते हैं। अपने लहलहाते फसलों को बढ़ता देख किसान खुशी से फूला नहीं समाता और इसी खुशी में वह अपने बैलों की पूजा कर यह पर्व मनाता है।
छत्तीसगढ़ के प्रत्येक किसान परिवार में मनाए जाने वाले इस पर्व में कुम्हार द्वारा बनाए मिट्टी बनाए नंदी बैलों की पूजा होती है और पारंपरिक व्यजंनों का भोग लगता है। इस दिन हर घर में विशेष पकवान बनाये जाते हैं जैसे ठेठरी, खुर्मी, देहरौरी, चीला। इन पकवानों को मिट्टी के खिलौनों वाले बर्तन में पूजा करते समय भरकर रखते हैं।  घर में सुख-समृद्धि हमेशा बनी रहे और उनके खेतों की फसल बहुत अच्छी हो यही कामना मन में लिए उत्साह के साथ यह पर्व मनाया जाता है।
पूजा के बाद बच्चे मिट्टी के बने खिलौनों से खेलते है। पूजा के लिए जो मिट्टी का नंदी बैल लाया जाता है उसमें मिट्टी के ही चक्के अलग से बनाए जाते हैं जिसे पूजा के बाद बाँस की खपच्चियों से बाँधा जाता है और फिर उसके गले में रस्सी डालकर बच्चे उसे गाँव में दौड़ाते हुए खेलते हैं। लड़के जहाँ पोला के दिन नांदी बैल चलाते है तो वहीं लड़कियाँ मिट्टी के जाता पोरा और रसोई में उपयोग होने वाले बर्तनों से खेलती हैं।
शाम के समय गाँव की युवतियाँ अपनी सहेलियों के साथ गाँव के बाहर मैदान या चौराहों पर (जहाँ नंदी बैल या साहडा देव की प्रतिमा स्थापित रहती है) पोरा पटकने जाते हैं। इस परम्परा मे सभी अपने-अपने घरों से एक-एक मिट्टी के खिलौने को एक निर्धारित स्थान पर पटककर-फोड़ते हैं। यह परम्परा नंदी बैल के प्रति आस्था प्रकट करने की परम्परा है। मिट्टी के खिलौने में ठेठरी खुर्मी भर देते हैं जिसे वहाँ उपस्थित लड़कों में उसे लूटने के लिए होड़ मची होती है। यहाँ इस समय उत्सव सा माहौल बन जाता है।
पोला के दिन विभिन्न खेलों का भी आयोजन किया जाता है। कबड्डी, खो-खो, लँगड़ी-फुगड़ी दौड़, गेड़ी दौड़, गिल्ली डण्डा, खो-खो आदि। शाम को बैलगाड़ी वाले अपने बैलों की जोड़ियाँ सजाकर प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हैं। बैलों के बीच दौड़ भी आयोजित की जाती है। विजयी बैल जोड़ी एवं मालिक को पुरस्कृत किया जाता है। हरेली के दिन बनाई गई गेड़ी का पोला के दिन विर्सजन किया जाता है।
पोला पर्व के कुछ ही दिनों बाद ही महिलाओं का पर्व तीजा मनाया जाता है। अपने पति की दीर्घायु की कामना में निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएँ यह व्रत मायके आकर ही करती हैं।  पोला के दिन बेटियाँ अपने मायके आती हैं या इस भाई अपनी बहनों को लिवाने जाते हैं।
खास बात यह है कि पोला छत्तीसगढ़ के साथ-साथ महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम, सिक्किम तथा पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाया जाता है। वहाँ इसे कुशोत्पाटिनी या कुशग्रहणी अमावस्या, अघोरा चतुर्दशी व स्थानीय भाषा में डगयाली के नाम से मनाया जाता है। (उदंती फीचर्स)

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