उदंती.com को आपका सहयोग निरंतर मिल रहा है। कृपया उदंती की रचनाओँ पर अपनी टिप्पणी पोस्ट करके हमें प्रोत्साहित करें। आपकी मौलिक रचनाओं का स्वागत है। धन्यवाद।

Mar 16, 2019

क्यों न स्त्री होने का उत्सव मनाया जाए

 क्यों स्त्री होने का उत्सव मनाया जाए
- डॉ. नीलम महेन्द्र 


यूँ तो समस्त संसार एवं प्रकृति ईश्वर की बेहतरीन रचना है किन्तु स्त्री उसकी अनूठी रचना है, उसके दिल के बेहद करीब।
इसीलिए तो उसने उसे उन शक्तियों से लैस करके इस धरती पर भेजा जो स्वयं उसके पास हैं- मसलन प्रेम एवं ममता से भरा ह्दय, सहनशीलता एवं धैर्य से भरपूर व्यक्तित्व, क्षमा करने वाला ह्रदय, बाहर से फूल सी कोमल किन्तु भीतर से चट्टान सी इच्छाशक्ति से परिपूर्ण और सबसे महवत्त्पूर्ण, वह शक्ति जो एक महिला को ईश्वर ने दी है, वह है उसकी सृजन शक्ति।
सृजन, जो केवल ईश्वर स्वयं करते हैं, मनुष्य का जन्म जो स्वयं ईश्वर के हाथ है उसके धरती पर आने का जरिया स्त्री को बनाकर उस पर अपना भरोसा जताया।
उसने स्त्री और पुरुष दोनों को अलग अलग बनाया है और वे अलग अलग ही हैं।
अभी हाल ही में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने लिंग भेद खत्म करने के लिए  'हीऔर 'शीके स्थान पर 'जीशब्द का प्रयोग करने के लिए कहा है।
यूनिवर्सिटी ने स्टूडेन्ट्स के लिए नई गाइड लाइन जारी की है। 'ज़ीशब्द का प्रयोग अकसर ट्रांसजेन्डर लोगों द्वारा किया जाता है। यूनिवर्सिटी का कहना यह है कि इससे ट्रांसजेन्डर स्टूडेन्ट्स असहज महसूस नहीं करेंगे साथ ही लैंगिक  समानता भी आएगी तो वहाँ पर विषय केवल स्त्री पुरुष नहीं वरन् ट्रान्स्जेन्डरस में भी लिंग भेद खत्म करने के लिए उठाया गया कदम है।
समाज से लिंग भेद खत्म करने के लिए किया गया यह कोई पहला प्रयास नहीं है। लेकिन विचार करने वाली बात यह है कि इतने सालों से सम्पूर्ण विश्व में इतने प्रयासों के बावजूद आज तक तकनीकी और वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की के बाद भी महिलाओं की स्थिति आशा के अनुरूप क्यों नहीं है? प्रयासों के अनुकूल परिणाम प्राप्त क्यों नहीं हुए?
क्योंकि इन सभी प्रयासों में स्त्री ने सरकारों और समाज से अपेक्षा की किन्तु जिस दिन वह खुद को बदलेगी, अपनी लड़ाई स्वयं लड़ेगी वह जीत जाएगी।
महिला एवं पुरुषों की समानता, महिला सशक्तिकरण, समाज में उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए भारत समेत सम्पूर्ण विश्व में अनेकों प्रयास किया गए हैं।
महिलाएँ भी स्वयं अपना मुकाबला पुरुषों से करके यह सिद्ध करने के प्रयास करती रही हैं कि वे किसी भी तरह से पुरुषों से कम नहीं हैं
भले ही कानूनी तौर पर उन्हें समानता के अधिकार प्राप्त हैं किन्तु क्या व्यवहारिक रूप से समाज में महिलाओं को समानता का दर्जा हासिल है ?
केवल लड़कों जैसे जीन्स शर्ट पहन कर घूमना या फिर बाल कटवा लेना अथवा स्कूटर बाइक कार चलाना, रात को देर तक बाहर रहने की आजादी जैसे अधिकार मिल जाने से महिलाएँ  पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त कर लेंगी? इस प्रकार की बराबरी करके महिलाएँ स्वयं अपना स्तर गिरा लेती हैं।
हनुमान जी को तो  उनकी शक्तियों का एहसास जामवंत जी ने कराया था, लेकिन आज महिलाओं को अपनी शक्तियों एवं क्षमताओं का एहसास स्वयं कराना होगा उन्हें यह समझना होगा कि शक्ति का स्थान शरीर नहीं हृदय होता है, शक्ति का अनुभव एक मानसिक अवस्था है, हम उतने ही शक्तिशाली होते हैं जितना कि हम स्वयं को समझते हैं।
जब ईश्वर ने ही दोनों को एक दूसरे से अलग बनाया है तो यह विद्रोह वह समाज से नहीं स्वयं ईश्वर से कर रही हैं।
यह हर स्त्री के समझने का विषय है कि-
स्त्री की पुरुष से भिन्नता ही उसकी शक्ति है उसकी खूबसूरती है उसे वह अपनी शक्ति के रूप में ही स्वीकार करे अपनी कमजोरी बनाए।
अत: बात समानता की नहीं स्वीकार्यता की हो!
बात 'समानताके अधिकार के बजाय 'सम्मान के अधिकारकी हो। और इस सम्मान की शुरूआत स्त्री को ही करनी होगी स्वयं से। सबसे पहले वह अपना खुद का सम्मान करे अपने स्त्री होने का उत्सव मनाए।
स्त्री यह अपेक्षा भी करे कि उसे केवल इसलिए सम्मान दिया जाए क्योंकि वह एक स्त्री है
यह सम्मान किसी संस्कृति या कानून अथवा समाज से भीख में मिलने वाली भौतिक चीज़ नहीं है।
स्त्री समाज को अपने अस्तित्व का एहसास कराए कि वह केवल एक भौतिक शरीर नहीं वरन् एक बौद्धिक शक्ति है, एक  स्वतंत्र आत्मनिर्भर व्यक्तित्त्व है जो अपने परिवार और समाज की शक्ति हैं कि कमजोरी जो सहारा देने वाली है कि सहारा लेने वाली।
सर्वप्रथम वह खुद को अपनी देह से ऊपर उठकर स्वयं स्वीकार करें तो ही वे इस देह से इतर अपना अस्तित्व समाज में स्वीकार करा पाएँगी।
हमारे समाज में ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जिन्होंने इस पुरुष प्रधान समाज में भी मुकाम हासिल किए हैं, इंदिरा गाँधी चन्दा कोचर इंन्द्रा नूयी, सुषमा स्वराज, जयललिता अरुंधती भट्टाचार्य, किरण बेदी, कल्पना चावला आदि।
स्त्री के  स्वतंत्र सम्मान जनक अस्तित्व की स्वीकार्यता  एक मानसिक अवस्था है एक विचार है एक एहसास है एक जीवनशैली है जो जब संस्कृति में परिवर्तित होती है जिसे  हर सभ्य समाज अपनाता है तो निश्चित ही यह सम्भव हो सकता है।
बड़े से बड़े संघर्ष की शुरुआत  पहले कदम से होती है और जब वह बदलाव समाज के विचारों  आचरण एवं नैतिक मूल्यों से जुड़ा हो तो इस परिवर्तन की शुरुआत समाज की इस सबसे छोटी इकाई से अर्थात् हर एक परिवार से ही हो सकती है।
यह एक खेद का विषय है कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद हकीकत में महिलाओं की स्थिति दयनीय है।
आज भी कन्या भ्रूण हत्याएँ हो रही हैं, बेटियाँ दहेज रूपी दानव की भेंट चढ़ रही हैं  कठोर से कठोर कानून इन्हें नहीं रोक पा रहे हैं  तो बात कानून से नहीं बनेगी।
हर व्यक्ति को हर घर को हर बच्चे को समाज की  छोटी से छोटी छोटी इकाई को इसे अपने विचारों में अपने आचरण में अपने व्यवहार में अपनी जीवन शैली में समाज की संस्कृति में शामिल करना होगा।
यह समझना होगा कि बात समानता नहीं सम्मान की है
तुलना नहीं स्वीकार्यता की है
स्त्री परिवार एवं समाज का हिस्सा नहीं पूरक है।
अत: सम्बोधन भले ही बदल कर 'जीकर दिया जाए लेकिन ईश्वर ने जिन नैसर्गिक गुणों के साथ 'हीऔर 'शीकी रचना की है उन्हें तो बदला जा सकता है और ही ऐसी कोई कोशिश की जानी चाहिए।
सम्पर्कः C/O Bobby Readymade Garments, Phalka Bazar, Lashkar, Gwalior, MP- 474001Mob - 9200050232, Email- drneelammahendra@hotmail.com

No comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।