January 15, 2019

जीवन दर्शन

सुख की खोज
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
जीवन यात्रा के दौरान मनुष्य केवल दो ही स्थितियों से गुजरता है - सुख या दुख। ये दोनों अंतस के भाव हैं। समय सदा एक सा नहीं गुजरता। कभी कष्ट, कभी खुशी, कभी उतार, कभी चढ़ाव आदि सब उसके अभिन्न अंग हैं। समय के साथ समय गुजरता भी रहता है और यह हमारे मानस का द्योतक है कि हम उसे किस रूप में गृहण करते हैं। विद्वान लोग दुख में सुख की अनुभूति कर लेते हैं, जबकि मूर्ख या मूढ़मति सुख के पल में भी दुख के बीज बो देते हैं।
एक बार एक सुंदर, धनाढ्य एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से सजी संवरी महिला ने अपने कौंसिलर से शिकायत की कि वह जीवन में रिक्तता का अनुभव करती हैं। उसे अब सब कुछ अर्थहीन लगता है।
कौंसिलर ने एक अन्य स्त्री को बुलाकर पूछा कि उसे खुशी कैसे प्राप्त हुई।
तब उस स्त्री ने अपनी कहानी सुनाई - मेरे पति की मृत्यु अचानक हो गई और उसके तुरंत तीन माह बाद एक कार दुर्घटना में पुत्र भी चल बसा। कुछ शेष नहीं रहा। मैं न तो सो पाती थी न खा पाती। न कभी मुस्कुराई। मैं इहलीला समाप्त करने की भी सोचने लगी।
तभी एक दिन बिल्ली का छोटा सा बच्चा मेरे पीछे पीछे घर आ गया। बाहर मौसम सर्द था। मुझे उस पर दया आ गई और घर के अंदर ले आई। उसे दूध दिया, जिस पीकर उसने अपनी प्लेट जबान से साफ की। वह मेरे पैरों पर लेट गई। तब मैं पहली बार मुस्कुराई। मुझे लगा जब वह बिल्ली का एक छोटा सा बच्चा मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट लौटाने का कारण बन सकता है तो फिर और लोगों की सहायता के माध्यम से और कितनी खुशियां मेरी प्रतिक्षा कर रही हैं। अगले दिन मैंने कुछ बिस्किट घर पर ही बनाए और अस्पताल में भर्ती एक पड़ोसी के पास लेकर गई।
इस तरह हर दिन दूसरों के लिये कुछ अच्छा कर सकने का ध्येय मुझे मिल गया। दूसरों को खुश देखकर मुझे खुशी मिलने लगी। आज कोई भी मुझ जैसा समय पर सोने  एवं खाने वाला खुश प्राणी नहीं हैं।
यह सुनकर वह संभ्रात महिला भाव विभोर होकर रो उठी। उसके पास संसार की हर खुशी खरीदने के लिये समुचित पैसा था केवल उन खुशियों को छोड़कर, जिन्हें वह पैसे से नहीं खरीद सकती थी।
याद रखिये सुख पाने के लिये सुख देना जरूरी है। खुद में सुख की खोज व्यर्थ हैं, वह तो दूसरों के लिये कुछ अच्छा कर सकने से प्राप्त हो सकती है। खुद का सुख स्वार्थ हैं। दूसरों का सुख परमार्थ है, इसलिये तो कहा भी गया है – 
चार शास्त्र छ: उपनिषद, बात मिली है दोय,
सुख दीन्हें सुख होत है, दुख दीने दुख होय।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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