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Nov 17, 2018

एक पक्षी की डेढ़ हज़ार साल की संगीत परंपरा

एक पक्षी की डेढ़ हज़ार साल की संगीत परंपरा
नुष्यों की संगीत परंपरा सदियों पुरानी है। मगर नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र के मुताबिक दलदली गोरैया (Melospiza georgiana) नामक एक पक्षी ने अपने गीत को डेढ़ हज़ार सालों से सहेजकर रखा है और आज भी वही गीत गाते हैं।
यह निष्कर्ष लंदन के क्वीन मैरी विश्वविद्यालय के रॉबर्ट लेकलान और उनके साथियों ने इन गौरैया के गीतों के विश्लेषण के आधार पर निकाला है। यह अध्ययन करने के लिए टीम ने उत्तर-पूर्वी यू.एस. के 6 घनी आबादी वाले स्थानों से 615 नर गौरैयों के गीत रिकॉर्ड किए। गौरतलब है कि गीत गाने का काम नर पक्षी ही करते हैं। इसके बाद प्रत्येक पक्षी के गीत का विश्लेषण किया गया।
गीतों के विश्लेषण से पता चला कि सारे नमूनों में कुल मिलाकर 160 अलग-अलग सिलेबल्स का उपयोग किया गया था। सारे दलदली गौरैया एक -सी धुन गाते हैं हालाँकि हर आबादी में एकाध अपवाद देखा गया। विश्लेषण के लिए एक सांख्यिकीय विधि का इस्तेमाल किया गया था। इसे बेशियन सनिन्कटन विधि कहते हैं। इसके साथ एक ऐसे मॉडल का उपयोग किया गया था जो यह पता लगता है कि किसी आबादी के गीतों में कितने सिलेबल्स का उपयोग हो रहा है। इसके आधार पर वैज्ञानिक यह गणना करने में कामयाब रहे कि प्रत्येक नर पक्षी का गाना समय के साथ कितना बदला है। उन्हें यह भी समझ में आया कि 1970 के दशक में किए गए एक अध्ययन और 2009 के गीतों के उनके नमूने में दो को छोड़कर शेष सिलेबल्स वही थे।
अध्ययन का सबसे रोचक नतीजा यह है कि सबसे पुराने गीत की औसत उम्र करीब 1500 वर्ष है। यानी ये पक्षी डेढ़ हज़ार सालों से वही गीत गा रहे हैं। वैज्ञानिकों को लगता है कि संभवत: यही स्थिति अन्य जंतुओं में भी पाई जाएगी। (स्रोत फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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