April 16, 2018

समस्या

उच्च शिक्षा की विसंगतियाँ
 - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
 उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रत्येक शिक्षार्थी को तीन चरणों से गुजरना पड़ता है- प्रवेश, अध्ययन एवम् परीक्षा। केंद्रीय विश्वविद्यालयों या कुछेक महाविद्यालयों को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो उच्च शिक्षा के ये तीनों चरण विसंगतियों एवम् अराजकता की चपेट में हैं, वस्तुत: तीन चरणों की तरह महाविद्यालय भी तीन कोटि के हैं-राजकीय महाविद्यालय, सहायता प्राप्त अशासकीय महाविद्यालय एव निजी प्रबन्धतन्त्रों द्वारा संचालित महाविद्यालय। इनमे प्रथम दो कोटि के महाविद्यालयों में प्राध्यापकों की नियुक्ति एवम् उनका वेतनमान सरकारों द्वारा निर्धारित एवम् देय होता है जबकि निजी कॉलेजों में प्राध्यापकों की नियुक्ति के मानक तो शासन द्वारा ही निर्धारित होते है किंतु उनका वेतन प्रबंधतंत्र की दया पर निर्भर होता है, प्रबन्धतन्त्रों द्वारा उन्हें सीमित वेतन दिया जाता है, वर्ष पर्यन्त का वेतन नही दिया जाता है। उन्हें पर्याप्त सम्मान भी नहीं दिया जाता, ये एक ऐसी भीषण विसंगति है जिसने सम्पूर्ण उच्च शिक्षा के स्तर को प्रभावित किया है। शासकीय और सहायता प्राप्त कॉलेज सीमित संख्या में है अत: उनमें सीमित छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता है, प्राइवेट कॉलेज तो गली -गली में कुकुरमुत्तों की तरह उगे है अतरू उनमे प्रवेश कराने की होड़ लगी रहती है इनके प्रबन्धक से लेकर कर्मचारी तक छात्रों को प्रवेश दिलाने हेतु अनेक प्रलोभन देते रहते हैं।
विद्यार्थी जीवन का दूसरा और मुख्य चरण है अध्ययन। अध्ययन के द्वारा ही ज्ञानार्जन, मेधा का विकास होता है, किन्तु विडम्बना ही है यहाँ भी घोर अराजकता देखने को मिलती है, प्रायवेट कॉलेजों में शिक्षकों को वेतन इतना कम दिया जाता है जो अपर्याप्त भी है और असम्मानजनक भी अत: उनसे अच्छे अध्यापन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है, वैसे भी इन कॉलेजों में नकल के ठेके पर प्रवेश होते है अतरू पढऩे पढाने का माहौल दिखावे के लिए होता है। तीनों प्रकार के महाविद्यालयों में एक विसंगति समान है वह है प्राध्यापकों की कमी, प्राइवेट कॉलेजों में पैसा बचाने के लिये कम अध्यापक रखे जाते है,यद्यपि फाइलों में वे पूरे होते हैं पर धरातल पर बहुत कम होते हैं। राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में अनेकानेक कारणों से प्राध्यापकों की संख्या बहुत कम है जिससे अध्ययन प्रभावित होना स्वाभाविक है, इन कॉलेजों में भी कक्षाएँ प्राय: खाली ही रहती हैं अनेक प्राध्यापक इसी समय का सदुपयोग प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने में कर लेते हैं।          
तीसरा चरण परीक्षा का होता है, जब प्रारम्भिक दो चरण विसंगतियों से पूर्ण है तब अंतिम चरण के सहज होने की कल्पना ही हास्यास्पद है। सरकार/ विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन जोर शोर से नकल विहीन परीक्षा के लिये कमर कस लेता है, शायद कोई भी इस समस्या की जड़ को देखना नहीं चाहता, या देख।कर अनदेखी करता ह॥मीडिया भी नकल की खबरों को ले उड़ता है, प्रशासन और नकल माफियाओं के मध्य तू डाल डाल, मैं पात पात का खेल चलता हैप्रशासन की हर व्यवस्था की काट नकल माफियाओ के पास होती है, प्रशासन का दावा होता है कि नकलविहीन परीक्षाएं सम्पादित हुई और नकल कराने वाले दावा करते हैं कि उन्होंने कुछ परेशानियों के बावजूद अपना कार्य चतुराई से कर लिया, निरूसन्देह यह स्थिति राष्ट्र के भविष्य के लिए घातक है यह शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी कुपढ़ पीढ़ी तैयार कर रही है, जिसके पास डिग्रियाँ तो हैं ,पर ज्ञान से शून्य है। इस व्यवस्था को जब तक जड़ से नहीं बदला जाएगा, जब तक इन विसंगतियों पर समूल प्रहार नहीं होगा तब तक किसी बड़े परिवर्तन की अपेक्षा व्यर्थ है, यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जो वास्तव में मेधा सम्पन्न हैं, कुछ हासिल करना चाहते है वें हताशा और अवसाद से ग्रस्त हो रहे हैं, जो शुभ नहीं है।
सम्पर्क: 2, विवेक विहार  मैनपुरी-205001

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