April 16, 2018

पाठ्यक्रम

व्यावसायिक नहीं, व्यावहारिक शिक्षा दें 
-सुनीता शर्मा
आधुनिक समाज जिसमें सारी दुनिया तकनीकी हो रही है और  हरेक कार्य कम्प्यूटर और रोबोट संचालित होते जा रहे  है, ऐसे में पुराने पाठ्यक्रम को खींचते रहने में कोई समझदारी नहीं है। आज शिक्षा पद्धति का पुनर्गठन की आवश्यकता है जिससे भावी पीढ़ी को गिने चुने रोजगार की तरफ मुख्य आकर्षण ही न बने बल्कि बच्चे बहुआयामी दृष्टिकोण की और ढल सके और स्वावलम्बी बन सकें।
 रोजगार के बहुआयामी दृष्टिकोण से उसका मानसिक विकास हो, विषयों में ऐसे पाठ्यक्रम का समावेश हो और इनको पढ़ाने के लिए व्यावसायिक शिक्षक नहीं बल्कि व्यावहारिक शिक्षक की बढ़ोतरी हो ;क्योंकि आने वाले समय में विद्यार्थी तनावमुक्त होकर शिक्षित हो सकें इसके लिए व्यावहारिक व रचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले शिक्षिकों की माँग बढ़ेगी क्योंकि जनसंख्या के अनुसार रोजगार के साधन नहीं होंगे। ऐसे जटिल समय में शिक्षक बहुत धैर्यवान होगा तभी वह बच्चों को आत्मसंयमी, गुणवान के साथ -साथ प्रखर बुद्धिमान् भी बना पाएगा।
समयनुसार हर चीज बदलती है ऐसे में अनावश्यक पाठ्यक्रम का दबाब हटाकर बच्चों को माध्यमिक स्तर पर रचनात्मक और व्यवहारिक बनाया जाए। रचनात्मकता उन्हें व्यावहारिक तौर पर लचीला बनाएगी साथ ही स्वाध्याय की और प्रेरित  करेगी। यदि ब्रेन ड्रेन की समस्या से निपटना है तो कुछ विशेष प्रयोग किए जाने चाहिए।
पाठ्यक्रम सम्भव हो तो बच्चों के मानसिक स्तर के अनुसार आबंटित होने चाहिए। सभी बच्चों पर एक सा पाठ्यक्रम थोपना उसके हितार्थ नहीं होता क्योंकि हर बच्चा कुशाग्र बुद्धि वाला नहीं होता, प्रत्येक बच्चा एक से पाठ्यक्रम में ढल नहीं पाता और यही कारण है कि बच्चों में तनाव और आत्महत्या जैसी समस्या उभरने लगी है। विदेशी शिक्षा नीति में बच्चों को लिखित कम और व्यावहारिक ज्ञान अधिक दिया जाता है।
साहित्य, विज्ञान, गणित, कला, वाणिज्य, भाषा में विषय का चुनाव बच्चों के बौद्धिक स्तर के अनुसार हो। जैसा कि सर्वविदित है दसवीं तक के पाठ्यक्रम में हम सामान्य पाठ्यक्रम रखते हैं जिनमें से अधिकतर विषय व्यवहारिक जीवन या रोजगार उपलब्ध कराने में इतने काम नहीं आते जितने वे जरूरी माने जाते हैं  तो क्यों नहीं हम ये ज़रूरी विषय केवल माध्यमिक स्तर तक रखें उसके बाद काउंसलिंग के जरिए बच्चों को अनुशासन के साथ उनके उज्जवल भविष्य हेतु केवल उन विषयों को ही पढ़ाएँ जो उनकी क्षमता के अनुसार हो।
इस तरह से  हम शिक्षा को खुशियों के संसार में ढाल देंगे और तनाव की समस्या से भारत के भविष्य को अंधकारमय होने से बचा लेंगे।

1 Comment:

Kamlanikhurpa@gmail.com said...

सार्थक लेख

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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