April 16, 2018

जीवनी

शरीर पर मस्तिष्क की विजय
स्टीफन हॉकिंग
 - रॉजर पेनरोज़
अपनी मोटर-चालित व्हीलचेयर में बैठे हुए स्टीफन हॉकिंग, सिर थोड़ा एक ओर को झुका हुआ और हाथ कुर्सी पर लगे कंट्रोल्स को चलाने के लिए तैयार - उनकी यही छवि लोगों के दिमाग में बसी है। यह सचमुच शरीर पर दिमाग की विजय का प्रतीक भी है। स्टीफन हॉकिंग के लिए शारीरिक अपंगता की भरपाई अद्धुत प्रतिभा ने कर दी थी। इसकी बदौलत वे पूरे ब्रह्मांड में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करते थे और कभी-कभी उसके कुछ ऐसे रहस्यों को उजागर करते थे जो साधारण लोगों के लिए ओझल रहते थे।
ज़ाहिर है, ऐसी रूमानी छवि आंशिक सत्य ही हो सकती है। जो लोग हॉकिंग को जानते थे, वे एक वास्तविक मनुष्य की दबंग उपस्थिति के कायल थे। एक ऐसा व्यक्ति जिसमें जीवन के प्रति गहरी जीजिविषा थी, विनोदप्रियता थी और ज़बरदस्त संकल्प शक्ति थी; किंतु साथ ही सामान्य मानवीय कमज़ोरियाँ भी थीं और खूबियाँ भी। वे नंबर 1 ख्यात वैज्ञानिक की अपनी भूमिका का पूरा आनंद लेते थे। उनके सार्वजनिक व्याख्यानों में श्रोताओं की भीड़ होती थी और अक्सर ये सब सिर्फ उनके वैज्ञानिक विचारों को सुनने नहीं आते थे।
अलबत्ता, वैज्ञानिक समुदाय अपेक्षाकृत संतुलित आकलन कर सकता है। ब्रह्मांड की भौतिकी और ज्यामिति की हमारी समझ में उनके प्रभावशाली और कभी-कभी क्रांतिकारी योगदान के प्रति वैज्ञानिक समुदाय में उनका बहुत सम्मान था।
इक्कीसवीं सालगिरह के कुछ समय बाद पता चल गया था कि हॉकिंग एक अस्पष्ट और लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं। आगे चलकर इस बीमारी को ए.एल.एस. (एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस) के रूप में पहचाना गया। इस बीमारी में कार्यकारी तंत्रिकाएँ नष्ट होने लगती हैं और दिमाग मांसपेशियों को नियंत्रित नहीं कर पाता। तंत्रिकाएँ लगातार नष्ट होती जाती हैं। आम तौर पर यह रोग जानलेवा होता है। किंतु मायूस होने की बजाय हॉकिंग ने अपना ध्यान ब्रह्मांड की भौतिक प्रकृति से जुड़े कुछ बुनियादी सवालों पर लगाना शुरू कर दिया। कालांतर में उन्होंने इस घातक बीमारी के साये में असाधारण सफलताएँ अर्जित कीं। उस समय स्थापित चिकित्सकीय राय का मुँह चिढ़ाते हुए वे रोग के निदान के बाद पूरे 55 साल तक जीवित रहे।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अकादमिक थी हालांकि गणित या भौतिकी से सम्बन्धित नहीं थी। उनके पिता फ्रेंकऊष्णकटिबंधीय रोगों के विशेषज्ञ थे और उनकी माँइसोबेल एक स्वतंत्र विचारों वाली महिला थीं जिनका हॉकिंग पर काफी गहरा असर था। उनका जन्म ऑक्सफोर्ड में हुआ था और आठ वर्ष की उम्र में वे हार्टफोर्डशायर में सेन्टएल्बन्स आ गए थे। सेन्टएल्बन्स स्कूल में पढ़ाई की और युनिवर्सिटीकॉलेज में भौतिकी की पढ़ाई के लिए उन्हें छात्रवृत्ति मिली। उनके शिक्षकों ने उन्हें असाधारण रूप से सक्षम पाया किंतु हॉकिंग ने अपनी पढ़ाई को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि 1962 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में उपाधि प्राप्त की ;किंतु यह कोई उत्कृष्ट दर्जे की नहीं थी।
उन्होंने तय किया कि वे कैम्ब्रिज के ट्रिनिटीकॉलेज में भौतिकी पढऩा जारी रखेंगे। वे चाहते थे कि प्रतिष्ठित ब्रह्मांड वैज्ञानिक फ्रेडहॉएल के मार्गदर्शन में पढ़ाई करें; किंतु उन्हें निराशा हुई क्योंकि फ्रेडहॉएल उन्हें अपने छात्र के रूप में लेने में असमर्थ थे। उस विषय में उस समय उपलब्ध व्यक्ति डेनिससिएमा थे, जिन्हें हॉकिंग उस समय जानते नहीं थे। दरअसल, यह अच्छा ही हुआ; क्योंकि सिएमा ब्रिटिश ब्रह्मांड विज्ञान में एक स्फूर्तिदायक व्यक्तित्व के रूप में उभर रहे थे। उन्होंने कई छात्रों का मार्गदर्शन किया ,जो आगे चलकर इस क्षेत्र के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बने।
सिएमा उस समय में भौतिकी, और खासकर ब्रह्मांड विज्ञान के हर क्रियाकलाप के बारे में जानते थे और उन्होंने अपना लगभग संक्रामक जोश संपर्क में आए हर व्यक्ति को प्रदान किया। वे ऐसे लोगों को साथ लाने में भी बहुत प्रभावी थे ,जिनके पास एक-दूसरे को बताने को कुछ उल्लेखनीय हो।
जब हॉकिंगकैंब्रिज में अपने शोध कार्य के द्वितीय वर्ष में थे, उस समय मैंने (लंदनमेबर्कबेककॉलेज में) एक महत्त्वपूर्ण गणितीयप्रमेय प्रतिपादित की थी। कुछ संभाव्य मान्यताओं के आधार पर यह समीकरण दर्शाती थी कि कोई ढहता हुए अति-भारी तारा स्थान-काल में एक सिंगुलेरिट में परिणित हो जाएगा। सिंगुलेरिटी यानी एक ऐसा स्थान जहाँ घनत्व और स्थान-काल की वक्रता अनंत होगी। यह एक ऐसी चीज़ का बिंब प्रदान करता था ,जिसे हम आजकल ब्लैक होल कहते हैं। स्थान-काल की ऐसी सिंगुलेरिटी एक गहरेक्षितिज में स्थित होगी, जिसमें से किसी संदेश या वस्तु का पलायन संभव नहीं है। ऐसी केंद्रीय सिंगुलेरिटी पर आइंस्टाइन का सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत अपनी सीमा पर पहुँच जाएगा।
इसी दौरान, हॉकिंगजॉर्जएलिस के साथ इसी तरह की समस्या के बारे में सोच रहे थे। ये दो व्यक्ति एक अपेक्षाकृत ज़्यादा सीमित किस्म की सिंगुलेरिटीप्रमेय पर काम कर रहे थे। इसके लिए अनावश्यक सीमाकारी मान्यताओं की ज़रूरत पड़ती थी। सिएमा मुझे और हॉकिंग को साथ लाए और जल्द ही हॉकिंग ने मेरी प्रमेय का उपयोग एक अनपेक्षित तरीके से करने का तरीका खोज निकाला। उन्होंने इसका उपयोग कुछ इस ढंग से किया कि इसे ब्रह्मांड के स्तर पर लागू किया जा सके और दर्शाया जा सके कि स्थान-काल की जिस सिंगुलेरिटी को श्बिगबैंग्य कहते हैं वह सिर्फ अत्यंत सममित (symmetrical) स्टैण्डर्ड ब्रह्मांड मॉडल का नहीं बल्कि ऐसे किसी भी मॉडल का लक्षण है जो गुणात्मक रूप से समान किंतु असममित(assymmetrical) हो।
मेरी मूल प्रमेय में कुछ मान्यताएँ ब्लैक होल के निर्माण के बारे में जितनी प्राकृतिक लगती थी, उतनी वे ब्रह्मांड के स्तर पर नहीं लगती थी। इस तरह की मान्यताओं से छुटकारा पाने के लिए हॉकिंग ने इस सवाल की दृष्टि से प्रासंगिक नई गणितीय तकनीकों का अध्ययन शुरू कर दिया।
गणितीय तकनीकों का एक सशक्त भंडार उपलब्ध था जिसे मोर्स सिद्धांत कहते थे और यह रीमैनियन स्थान के अध्ययन में जुटे गणितज्ञों का एक प्रमुख औज़ार था। अलबत्ता, आइंस्टाइन के सिद्धांत में जिस स्थान की बात है वह वास्तव में छद्म-रीमैनियन स्थान है और इस संदर्भ में प्रासंगिक मोर्स सिद्धांत थोड़ा अलग है। हॉकिंग ने ज़रूरी सिद्धांत स्वयं विकसित किया (इसमें उन्हें चार्ल्स मिसनर, रॉबर्ट गेरोक और ब्रैंडन कार्टर की मदद मिली थी)। वे इस सिद्धांत का उपयोग नई तथा ज़्यादा सशक्त प्रमेय विकसित करने में कर पाए। इन नई प्रमेयों में मेरी प्रमेय की कई मान्यताओं को शिथिल किया जा सकता था। इससे पता चला कि व्यापक परिस्थिति में बिगबैंगनुमासिंगुलेरिटीआइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का अनिवार्य परिणाम है।
कुछ वर्षों बाद (1970 में रॉयल सोसायटी में) हॉकिंग और मैंने मिलकर एक ज़्यादा सशक्त प्रमेय प्रकाशित की जिसमें इस क्षेत्र में पहले हुए लगभग सारे शोध कार्य को समेट लिया गया था। इस समय तक हॉकिंग गोनविले एंड केयस कॉलेज में श्विज्ञान में उत्कृष्टता के लिए फेलो बन चुके थे।
1967 में वर्नर इस्रेइल ने एक महत्त्वपूर्ण पर्चा प्रकाशित किया था जिसका आशय निकलता था कि अघूर्णित ब्लैक होल्स, जब अंततरू स्थिरता प्राप्त करेंगे, तो वे अनिवार्य रूप से पूरी तरह गोलीय सममिति हासिल कर लेंगे। आगे चलकर कार्टर, डेविड रॉबिंसन और अन्य ने इस निष्कर्ष का सामान्यीकरण करके इसे घूर्णन करते ब्लैक होल्स पर भी लागू किया। इसका मतलब यह था कि स्थान-काल की अंतिम ज्यामिति अनिवार्य रूप से आइंस्टाइन की समीकरणों के कुछ समाधानों से मेल खाएगी। आइंस्टाइन के समीकरणों के ये समाधान 1963 में रॉय केर ने खोजे थे। पूरे तर्क का एक प्रमुख घटक यह था कि यदि थोड़ा भी घूर्णन मौजूद है तो पूर्ण अक्षीय सममिति अनिवार्य है। यह घटक हॉकिंग ने 1972 में उपलब्ध कराया था।
इस सबका प्रमुख उल्लेखनीय निष्कर्ष यह था कि प्रकृति में जिन ब्लैक होल्स के मिलने की अपेक्षा है, वे इस केर ज्यामिति से मेल खाएँगे। जैसी कि महान सैद्धांतिक खगोल-भौतिकीविद सुब्रमण्यन चंद्रशेखर ने टिप्पणी की थी, ब्लैक होल्स ब्रह्मांड में सबसे परिपूर्ण स्थूल वस्तुएँ हैं जिनका निर्माण मात्र स्थान व काल में से हो रहा है। और तो और, ये सरलतम भी हैं, क्योंकि इनका विवरण सटीकता से ज्ञात ज्यामिति (केर द्वारा स्थापित) के ज़रिए किया जा सकता है।
इस क्षेत्र में काम करते हुए हॉकिंग ने ब्लैक होल्स को लेकर कई महत्त्वपूर्ण परिणाम स्थापित किए। जैसे, इनके इवेंट होराइज़न के गोल होने के बारे में तर्क (इवेंट होराइज़न का मतलब है ब्लैक होल की सतह)। 1973 में कार्टर तथा जेम्स बार्डीन के साथ प्रकाशित शोध पत्रों में उन्होंने ब्लैक होल्स के व्यवहार और ऊष्मागतिकी के बुनियादी नियमों के बीच कुछ उल्लेखनीय साम्य स्थापित किए। इसमें उन्होंने ब्लैक होल के क्षितिज की सतह के क्षेत्रफल और उसके सतही गुरुत्व बल को क्रमशरू एंट्रॉपी और तापमान जैसी ऊष्मागतिकीय राशियों के तुल्य बताया। यह कहना गलत न होगा कि इस निष्कर्ष तक पहुँचने के दौरान का समय उनका सबसे सक्रिय काल था और इस समय सामान्य सापेक्षता के क्षेत्र में उनका काम दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ माना जा सकता है।
हॉकिंग, बार्डीन और कार्टर ने ब्लैक होल्स के ऊष्मागतिकीयव्यवहार को एक उपमा से अधिक कुछ नहीं माना था जिसका कोई भौतिक अर्थ न था। लगभग एक वर्ष पूर्व जेकब बेकेनस्टाइन दर्शा चुके थे कि भौतिक सुसंगति के आधार पर (क्वांटम यांत्रिकी के संदर्भ में) यह अनिवार्य है कि ब्लैक होल में एक वास्तविक भौतिक एंट्रॉपी होना चाहिए (एंट्रॉपी भौतिक शास्त्रियों का अव्यवस्थाका पैमाना है) जो उसके क्षितिज के क्षेत्रफल के समानुपाती हो। अलबत्ता, वे समानुपात के गुणांक को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं कर पाए थे। वहीं दूसरी ओर, ऐसा लगता था कि ब्लैक होल का भौतिक तापमान बिलकुल शून्य होना चाहिए, जो उपरोक्त उपमा से बेमेल बात है क्योंकि ऊर्जा किसी भी रूप में ब्लैक होल से पलायन नहीं कर सकती। इसीलिए हॉकिंग और उनके सहकर्मी अपनी उपमा पूरी गंभीरता से लेने को अनिच्छुक थे।
अब हॉकिंग ने अपना ध्यान ब्लैक होल्स के संदर्भ में क्वांटम यांत्रिकीय प्रभावों पर लगाया। वे इस बात की गणना करने में जुट गए कि बिग बैंग के तहत जो छोटे-छोटे घूर्णन करते ब्लैक होल बनेंगे, क्या वे अपनी घूर्णन ऊर्जा को विकिरित करेंगे। वे यह देखकर चकित रह गए कि घूर्णन चाहे कुछ भी, ब्लैक होल ऊर्जा का विकिरण करेंगे - आइंस्टाइन की समीकरण E=mc2के अनुसार इसका अर्थ होगा कि वे पदार्थ का विकिरण करेंगे। इसका अर्थ यह निकलता है कि किसी भी ब्लैक होल का तापमान शून्य नहीं होगा। यह बात बार्डीन-कार्टर-हॉकिंग की उपमा से पूरी तरह मेल खाती है। इसके अलावा हॉकिंग एंट्रॉपी समानुपात गुणांक के सटीक मान की गणना भी कर पाए जिसे बेकेनस्टाइन नहीं निकाल पाए थे।
हॉकिंग ने भविष्यवाणी की थी कि ब्लैक होल ऊर्जा उत्सर्जित करेंगे और आज इसे हॉकिंग ऊर्जा कहा जाता है। अलबत्ता, सामान्य खगोल-भौतिकीय प्रक्रियाओं में जो ब्लैक होल बनने की उम्मीद है, उसके लिए हॉकिंग विकिरण की मात्रा बहुत सूक्ष्म होगी। दरअसल, आज उपलब्ध किसी भी तकनीक से इसका अवलोकन संभव नहीं होगा। मगर उनका तर्क था कि हो सकता है कि बिग बैंग के दौरान ही अत्यंत सूक्ष्म ब्लैक होल्स का निर्माण हुआ हो और ऐसे ब्लैक होल्स का हॉकिंग विकिरण समेकित होकर एक अंतिम विस्फोट को जन्म देगा, जिसका अवलोकन संभव होगा। ऐसे विस्फोट का कोई प्रमाण नहीं है, जिससे पता चलता है कि बिग बैंग इतना उदार नहीं है कि हॉकिंग की आकांक्षाओं को पूरा कर दे। यह हॉकिंग के लिए निराशा का एक बड़ा कारण था।
उक्त उपलब्धियाँ निश्चित रूप से सैद्धांतिक पक्ष में बहुत महत्त्वपूर्ण थीं। इन्होंने क्वांटम (फील्ड) सिद्धांत और सामान्य सापेक्षता की प्रक्रियाओं को आपस में जोड़कर ब्लैक होल ऊष्मागतिकी के सिद्धांत को स्थापित किया। हॉकिंग ने यह स्थापित किया कि ब्लैक होल के संदर्भ में एक तीसरे विषय को शामिल करना ज़रूरी है-ऊष्मागतिकी। इन्हें आम तौर पर हॉकिंग का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बुनियादी भौतिकी के भावी सिद्धांतों की दृष्टि से इनके गहरे निहितार्थ हैं, किंतु इन निहितार्थों की विस्तृत प्रकृति को लेकर फिलहाल काफी गर्मागरम बहसें चल रही हैं।
हॉकिंग स्वयं यह निष्कर्ष निकालने में सफल रहे थे कि साधारण पदार्थ के बुनियादी घटक - प्रोटॉन्स- का अंततरू क्षय होना चाहिए (हालांकि इस बात को सारे कण भौतिकविदों की स्वीकृति नहीं मिली है), किंतु क्षय की दर इतनी कम होगी कि वर्तमान तकनीकों से इसका अवलोकन संभव नहीं है। उन्होंने अपनी इस बात के पक्ष में भी तर्क प्रस्तुत किए थे कि क्यों क्वांटम यांत्रिकी के मूलभूत नियमों में संशोधन की आवश्यकता है। शुरुआत में वे इस मत के पक्ष में थे किंतु आगे चलकर (मेरे ख्याल से बदकिस्मती से) उन्होंने एक भिन्न मत अपना लिया और डबलिन में जुलाई 2004 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय गुरुत्वाकर्षण सम्मेलन में उन्होंने ब्लैक होल के अंदर श्सूचना के क्षय्य की अपनी भविष्यवाणी के बाबत अपने मत परिवर्तन की सार्वजनिक घोषणा की (जिसके चलते वेकैल्टेक के भौतिकशास्त्री से लगाई शर्त हार गए)।
ब्लैक होल सम्बंधी अपने अन्वेषण के बाद हॉकिंग ने अपना ध्यान क्वांटम गुरुत्वाकर्षण पर केंद्रित किया। इस क्षेत्र में उन्होंने कुछ बुनियादी मसलों को सुलझाने के लिए बढिय़ा विचार दिए। क्वांटम गुरुत्वाकर्षण का सम्बंध इस बात से है कि कण भौतिकी की क्वांटम प्रक्रियाओं को स्थान-काल की संरचना पर सटीक रूप से लागू किया जाए। इसे भौतिकी के सबसे बुनियादी अनसुलझे मसले के रूप में देखा जाता है। इसका एक घोषित मकसद एक ऐसे भौतिक सिद्धांत की खोज करना है जो इतना सशक्त हो कि ब्लैक होल तथा बिग बैंग के परिप्रेक्ष्य में सामान्य सापेक्षता की स्थान-काल सिंगुलेरिटी से निपट सके।
यद्यपि हॉकिंग ने क्वांटम यांत्रिकी की प्रक्रियाओं को आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता के वक्रतापूर्ण स्थान-काल के संदर्भ में इस्तेमाल किया था, किंतु इस समय तक उन्होंने क्वांटम गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया था। उसके लिए ज़रूरी था कि आइंस्टाइन के वक्रतापूर्ण स्थान-काल पर लागू प्रक्रियाओं को श्क्वांटमीकृत्य किया जाए। मात्र वक्रतापूर्ण स्थान-काल के अंतर्गत भौतिक फील्ड पर इन्हें लागू करने से काम नहीं चलने वाला।
जेम्स हर्टल के साथ मिलकर हॉकिंग ने बिग बैंग सिंगुलेरिटी के विश्लेषण हेतु क्वांटम प्रक्रिया विकसित की।  इसे नो बाउंड्री्(सीमारहित) विचार कहा गया जिसमें सिंगुलेरिटी का स्थान एक निर्विघ्न टोपी ने ले लिया। इसे पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव से तुलना के आधार पर समझा जा सकता है, जहाँ देशांतर का कोई अर्थ नहीं रह जाता (वह सिंगुलर हो जाता है) जबकि स्वयं उत्तरी ध्रुव की अपनी एक स्पष्ट ज्यामिति है।
इस विचार को सार्थक बनाने के लिए हॉकिंग को श्काल्पनिक समय्य की धारणा विकसित करनी पड़ी थी जिसका असर यह होता है कि आइंस्टाइन के स्थान-काल की ज्यामिति छद्म-रीमैनियन से बदलकर मानक रीमैनियन ज्यामिति के नज़दीक आ जाती है। इन विचारों की उत्कृष्टता के बावजूद गंभीर मुश्किलें यथावत रहीं। जैसे एक दिक्कत यह है कि ब्लैक होल के अंदर मौजूद सिंगुलेरिटी पर यही प्रक्रियाएँ कैसे लागू की जाएँ क्योंकि वैसा करने में बुनियादी समस्याएँ हैं। दुनिया भर में क्वांटम गुरुत्वाकर्षण को लेकर कई नज़रियों से काम चल रहा है। और इस संदर्भ में हॉकिंग की प्रक्रिया का सम्मान तो बहुत है मगर वे सबसे लोकप्रिय नहीं हैं। वैसे बाकी सारे अन्य तरीकों में भी बुनियादी दिक्कतें मौजूद हैं।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक हॉकिंग क्वांटम गुरुत्वाकर्षण की समस्या और ब्रह्मांड विज्ञान के सम्बंधित मुद्दों पर अनुसंधान करते रहे; किंतु अपनी विशुद्ध अनुसंधान रुचि के साथ-साथ वे विज्ञान के लोकप्रियकरण, और खासकर स्वयं के विचारों के लोकप्रियकरण, में अधिक से अधिक सक्रिय होते गए। इसकी शुरुआत उनकी अद्भुत सफल पुस्तक ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम (समय का संक्षिप्त इतिहास) के लेखन के साथ हुई थी। इसका 40 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और ढाई करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। 
निसंदेह, किताब के अद्भुत शीर्षक ने इसकी ज़बरदस्त सफलता में योगदान दिया है। इसके अलावा यह विषय लोगों को आसानी से लुभाता है। और इसकी शैली एकदम सीधी तथा स्पष्ट है, जिसका विकास हॉकिंग ने संभवतरू अपनी शारीरिक विशिष्टता की वजह से आरोपित सीमाओं से निपटने के लिए किया होगा। कंप्यूटर-जनित वाणी पर निर्भरता से पहले वे बोल पाते थे किंतु वह काफी मुश्किल होता था और उसमें काफी मेहनत लगती थी। इसलिए ज़रूरी था कि वे सीधे-सीधेे मुद्दे पर केंद्रित छोटे-छोटे वाक्यों का उपयोग करें। वैसे इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनकी शारीरिक स्थिति ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया होगा।
हालाँकि इस पुस्तक को लिखने के पीछे हॉकिंग का मकसद निश्चित रूप से विज्ञान का प्रसार करना था, किंतु एक उद्देश्य पैसा कमाना भी था। उनके कारवाँ में शामिल परिजनों, नर्सों, स्वास्थ्य कर्मियों के जमावड़े और अत्यंत महंगे यंत्रों के चलते उनकी वित्तीय ज़रूरतें काफी अधिक थीं। इसमें से कुछ की ही पूर्ति अनुदानों से हो पाती थी।
हॉकिंग को किसी सम्मेलन में आमंत्रित करने से पहले आयोजकों को काफी हिसाब-किताब करना होता था। उनकी यात्रा व आवास का खर्च बहुत अधिक होता था। इसका एक बड़ा कारण यह होता था कि उनके साथ एक बड़ी टीम चलती थी। इसके अलावा, हॉकिंग के हर सार्वजनिक व्याख्यान में सारी सीटें आसानी से भर जाती थीं जिसके चलते ऐसा बड़ा हॉल तलाशना होता था जिसमें इतनी भीड़ समा सके। यह भी ध्यान रखना होता था कि व्याख्यान कक्ष के सारे प्रवेश द्वारा, सीढिय़ाँ, लिफ्टें वगैरह विकलांगों के लिए और खास तौर से हॉकिंग की व्हील चेयर के लिए उपयुक्त हों।
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि वे अपनी प्रसिद्धि का पूरा आनंद लेते थे और यात्रा या किसी असाधारण अनुभव (जैसे, किसी खदान में उतरना, दक्षिणी ध्रुव की यात्रा और फ्री फॉल में शून्य गुरुत्व का लुत्फ उठाना) और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मुलाकात का कोई अवसर नहीं चूकते थे।
समय के साथ उनके सार्वजनिक व्याख्यानों के प्रस्तुतीकरण में लगातार निखार आता गया। शुरुआत में दृश्य सामग्री में मूलतरू रेखाचित्र और ट्रांसपरेंसीस होती थीं जिन्हें कोई छात्र प्रस्तुत करता था;किंतु बाद के वर्षों में वे काफी प्रभावशाली कंप्यूटर-जनित दृश्य सामग्री का उपयोग करने लगे थे। वे वाक्य-दर-वाक्य अपनी मौखिक सामग्री का नियंत्रण करते थे, जिसे उनकी कंप्यूटर-जनित अमरीकी लहजे वाली आवाज़ में प्रस्तुत किया जाता था। बाद के वर्षों में लिखी गई उनकी लोकप्रिय पुस्तकों- दी इलस्ट्रेटेड ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम (1966) और दी युनिवर्स इन ए नटशेल (2001) में उच्च-गुणवत्ता के चित्रों और कंप्यूटर-जनित ग्राफिक्स का भी बहुतायत से उपयोग किया गया है। अपनी बेटी ल्यूसी के साथ उन्होंने बच्चों के लिए विज्ञान की व्याख्यात्मक पुस्तक जॉर्जेस सीक्रेट की टू दी युनिवर्स (2007) लिखी और लोकप्रिय विज्ञान की कई रचनाओं में वे संपादक, सह-लेखक और टीकाकार रहे।
हॉकिंग को कई सम्मान और पुरस्कार मिले। खास तौर से उन्हें 32 वर्ष की अल्पायु में ही रॉयल सोसायटी का फेलो चुना गया और 2006 में उन्हें सोसायटी के सर्वोच्च सम्मान कोपले मेडल से नवाज़ा गया। 1979 में कैंब्रिज में प्राकृतिक दर्शन की लुकासिअन पीठ पर चुने जाने वाले वे 17वें व्यक्ति थे। लगभग 310 वर्ष पूर्व सर आइज़ैक न्यूटन इस पीठ पर थे। 1989 में वे कम्पेनियन ऑफ ऑनर बने। एक अतिथि के रूप में वे टीवी कार्यक्रम स्टारट्रेक- दी नेक्स्ट जनरेशन में नज़र आए थे। इसके अलावा दी सिम्पसन में उन्हें कार्टून रूप में पेश किया गया था और फिल्म थियरी ऑफ एवरीथिंग (2014) में उनका किरदार था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वे अपनी पहली पत्नी जेन वाइल्ड के बहुत ऋणी थे। जेन से उनकी शादी 1965 में हुई थी और इस विवाह से उनके तीन बच्चे रॉबर्ट, ल्यूसी और टिमोथी हुए थे। जेन कई मायनों में उनके लिए एक बड़ा सहारा थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि वे उन्हें कई काम काफी हद तक खुद करने देती थीं।
हॉकिंग असाधारण दृढ़ संकल्प के धनी थे। उनकी ज़िद होती थी कि वे सारे काम खुद करेंगे। एक तरह से इसी का परिणाम था कि उनकी मांसपेशियाँ सक्रिय बनी रहीं और विकृति का असर देर से हुआ और बीमारी की प्रगति धीमी रही। बहरहाल, उनकी स्थिति बिगड़ती गई और अंततरू शरीर में कोई हरकत न बची और उनकी बातों को सिर्फ उनके बहुत ही निकट के लोग समझ पाते थे।
1985 में स्विटज़रलैण्ड में उन्हें निमोनिया हुआ था और उनकी जान बचाने के लिए श्वांस नली (ट्रेकिया) को हटाना अनिवार्य हो गया था। आश्चर्य की बात यह थी कि मौत से इतने निकट स्पर्श के बाद उनकी बीमारी का आगे बढऩा लगभग रुक गया था। अलबत्ता, ट्रेकिया हटा देने की वजह से उनकी आवाज़ पूरी तरह चली गई और कंप्यूटर-वाणी सिंथेसाइज़र ज़रूरी हो गया।
निमोनिया से सामना होने के बाद हॉकिंग का घर लगभग पूरी तरह नर्सों और चिकित्सा सहायकों के कब्ज़े  में चला गया और वे तथा जेन दूर होते गए। 1995 में उनका तलाक हो गया। उसी वर्ष हॉकिंग ने इलैन मेसन से शादी कर ली जो उनकी नर्स रही थी। इलैन का सहारा जेन से काफी अलग ढंग का था। अब हॉकिंग की शारीरिक स्थिति बहुत कमज़ोर हो चुकी थी और इस दौरान इलैन ने जो प्यार, देखभाल, ध्यान दिया उसने हॉकिंग को सारे क्रियाकलापों में सक्रिय बने रहने में मदद की। अलबत्ता, यह सम्बंध भी समाप्त हो गया - 2007 में उनका तलाक हो गया।
भयानक शारीरिक हालत के बावजूद वे जीवन को लेकर सदैव सकारात्मक रहे। उन्हें अपने काम में, अन्य वैज्ञानिकों की संगत में, कलाओं में, अपनी प्रसिद्धि के पलों में, अपनी यात्राओं में मज़ा आता था। बच्चों के साथ वे बहुत खुश रहते थे और कई बार अपनी मोटर-चालित व्हीलचेयर को घुमा-घुमाकर उनका मनोरंजन किया करते थे। उन्हें सामाजिक मुद्दों से सरोकार था। वे वैज्ञानिक समझ को बढ़ावा देते थे। वे काफी उदार थे और हाज़ि र जवाब भी। कई मौकों पर वे उस घमंड की झलक दे देते थे जो भौतिकी के अग्रणी क्षेत्रों में काम कर रहे वैज्ञानिकों में असामान्य बात नहीं थी। हॉकिंग में एक तानाशाही झुकाव था; किंतु वे सच्ची विनम्रता भी दर्शाते थे।
हॉकिंग के कई छात्र थे जिनमें से कई आगे चलकर स्वयं उल्लेखनीय वैज्ञानिक बने। किंतु उनका छात्र होना आसान नहीं था। एक बार तो उन्होंने अपनी व्हीलचेयर को एक छात्र के पैर पर से निकाल दिया था जिसकी वजह से उसे काफी तकलीफ हुई थी। उनकी बातें बहुत महत्त्वपूर्ण होती थीं; किंतु शारीरिक दिक्कतों के चलते वे इन्हें अत्यंत संक्षिप्त गूढ़ रूप में कहते थे। कोई सक्षम सहकर्मी तो उनकी ऐसी गूढ़ बात का मतलब समझ जाता था किंतु किसी अनुभवहीन छात्र के लिए मुश्किल होता था।  ऐसे किसी भी छात्र के लिए हॉकिंग से मुलाकात काफी भयभीत करने वाला अनुभव हुआ करता था। हॉकिंग छात्र से कोई अस्पष्ट-सा रास्ता अपनाने को कहते, जिसका कारण काफी रहस्यमयी लगता था। स्पष्टीकरण मिलता नहीं था, और छात्र के सामने जो चीज़ आती थी वह किसी पैगंबर के इल्हाम जैसी होती थी- कोई ऐसी चीज़ जिसकी सत्यता पर सवाल नहीं उठाना है, किंतु यदि उसकी सही व्याख्या करके विकसित किया जाए तो निश्चित तौर पर वह किसी गहरे सत्य की ओर ले जाती। संभवतरू हम सबके पास यही एहसास बचा है। (स्रोत फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष