April 15, 2018

जीवन दर्शन

टीचर एवं टेक्नालाजीयानी के. वाय. एस. का सिद्धांत
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
ज्ञान का अर्जन जीवन की सबसे बड़ी थाती या संपत्ति हैं, क्योंकि एक ओर जहाँ जीवन में अन्य सब चीजों का क्रमशः क्षरण होता जाता है, वहीं ज्ञान ही एक मात्र ऐसी निधि है जो उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है। वस्तुतरू यह मनुष्य का वह सच्चा साथी है, जो उसका साथ कभी नहीं छोड़ता। महात्मा गाँधी ने कहा था- लिव एज़ इफ यू हैव टू डाय टूमारो एंड लर्न एज़ इफ यू हेव टू लिव फार एवर- अर्थात जियो तो  ऐसेजैसे कल मर जाना हो और सीखो ऐसे जैसे आजीवन रहना हो।
ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत तो शिक्षक ही है यह परंपरा गुरु वशिष्ठ, सांदीपानी, द्रोणाचार्य से लेकर आज तक निरंतर चली आ रही है। इंटरनेट ने ज्ञान के अथाह सागर को कंप्यूटर की एक क्लिक पर सबके सामने उपस्थित कर दिया है। लोग अब आधुनिक टेक्नालाजी युक्त अस्त्रों पर अधिक विश्वास करने की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कोंचिग, गाइड, ट्यूशन के मकडज़ाल में उलझकर आज का बालक जानकारी तो प्राप्त कर रहा है, पर ज्ञान नहीं। ज्ञान तो गुरू के माध्यम से ही संभव है - बिन गुरू ज्ञान कहाँ से पाँऊ, दीजो ज्ञान गुरू गुन गाऊँ।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। शिक्षक पर अधिक उत्तरदायित्व आ गया है। आज के दौर में उसकी प्रतिस्पर्धा टेक्नालाजी से है। जब तक टेक्नालाजी से अधिक मूल्य आधारित शिक्षा नहीं प्रदान करेंगे, कभी भी छात्रों के आदर्श या आराध्य नहीं बन पाएंगे। उनके लिये भी जीवन सीखते रहने का नाम है और यह प्रक्रिया सदैव बनी रहनी चाहिये। शिक्षक जब कम उम्र का होता है तो पढ़ता भी है और पढ़ाता भी है, लेकिन ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती है वह पढऩा भी बंद कर देता है और पढ़ाना भी। याद रहे जिस दिन हम सोचते है कि हमें ज्ञान की चाह नहीं है और विद्वान हो गये हैं उसी दिन से जीवन पर पूर्ण विराम लग जाता है। ज्ञान समय, सीमा, उम्र या अवसर आधारित नहीं है।
सबसे महत्त्वपूर्ण जो आज के दौर की अनिवार्यता बन गई है, वह यह कि अब शिक्षक को अब छात्र का फ्रेंड, फिलासफर एवं गाइड यानी मित्र, दार्शनिक एवं मार्ग निर्देशक होना नितांत आवश्यक है।
यह सम धरातल संबंध ही सफलता का सूत्र है और आजकल के.वाय.सी (नो योर कस्टमर) की तर्ज पर के.वाय.एस. (नो योर स्टूडेंट) यानी अपने छात्र को ठीक से जानने, उसका स्वभाव, मूल क्षमता, व्यवहार समझकर फिर उसे रूपातंरित करने की आवश्यकता है। भाषण या डंडे का दौर विदा हो चुका है, अब तो आदर्श बनकर उसे आचरण से जीतने की कला में पारंगत होना अधिक जरूरी है बनिस्बतन एक औपचारिक व परंपरागत शिक्षक होने के। यही है के.वाय.एस.का सिद्धांत।
सम्पर्कः 8/सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023मो. 09826042641E-mail- v.joshi415@gmail.com

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