March 24, 2018

विचार

इन्सानी खोपड़ी 
- चन्द्रप्रभा सूद
इन्सानी खोपड़ी को प्राय: शैतानी खोपड़ी कहा जाता है, क्योंकि यह सदा खुराफातें करती रहती है। जब मनुष्य देश, धर्म, परिवार या समाज के नियमों के विपरीत कार्य करता है तब उसे उल्टी खोपड़ी वाला कहा जाता है। जब तक यह मनुष्य जीवित रहता है उसकी खोपड़ी उल्टी-सीधी चालें चलकर अपना मनोरथ सिद्ध करती रहती है। उसके मरने के पश्चात तान्त्रिक लोग इसका उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे अपने मारण-उच्चाटन आदि के मनचाहे कार्य करते हैं।
इस खोपड़ी में जो कुछ भी डालो वह बाहर निकल जाता है। इसलिए मनुष्य की की खोपड़ी खाली ही रह जाती है। तभी यह कहा जाता है कि कुछ समझ में आ रहा है कि खोपड़ी में भूसा भरा है? इसका एक कारण यह भी है कि मनुष्य सदा उधेड़-बुन करने में व्यस्त रहता है। किसको पटकनी देनी है? किसे नीचे गिराना है? किसे ऊपर उठाना है? किसकी हाँ में हाँ मिलनी है? किसे बरबाद करना है?
यानी शह और मात का खेल यह मनुष्य अनवरत खेलता रहता है। चाहे उसे इससे कुछ हासिल हो चाहे न हो। मनुष्य की महत्त्वाकांक्षाएँ ही इसका प्रमुख कारण हैं। और अधिक, और अधिक पा लेने की उसकी मानसिकता उसके विवेक का हरण कर लेती है। तब उसे गलत और सही में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता। उसके मन में घर करने वाला लालच उसे अन्धा बना देता है। उस समय वह भूल जाता है कि - लोभो मूलमनर्थानाम्
अर्थात् लोभ सभी अनर्थों की जड़ है या कारण है। मनुष्य को ज्ञात ही नहीं हो पाता और यही लोभ एक दिन उसके विनाश का कारण बन जाता है।
यदि मनुष्य की इस खोपड़ी को संसार की सारी सम्पदाओं और ऐश्वर्यों से भर दिया जाए तब भी यह खाली की खाली ही रह जाती है। यह कभी भरी हुई नहीं रह सकती। यह केवल मात्र लोभ, तृष्णाओं और आकांक्षाओं से ही सदा भरी हुई रहती है। न इन्हें मिटाया जा सकता है और न इन्हें तृप्त ही किया जा सकता है। इन पर नियन्त्रण करके अपने वश में कर सकते हैं।
 विचारणीय तथ्य हमारे समक्ष यह आता है कि यदि एक मनुष्य के लोभ का पात्र इतना बड़ा हो सकता है तो संसार के सभी मनुष्यों के इन पात्रों को भी एक साथ जोड़ दिया जाए तब परिणाम क्या आएगा? उस समय स्थितियाँ कैसी दिखाई देंगी? संसार के हालात कैसे हो जाएँगे? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम लोगों को ही खोजने होंगे।
इसके उत्तर में हम केवल यही कह सकते हैं कि संसार में चारों ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी, जैसे कि आजकल हो रहा है। हर ओर बस अराजकता का ही साम्राज्य हो जाएगा। जिधर देखो मारकाट होती दिखाई देने लगेगी। एक इन्सान दूसरे को मानो खा जाने के लिए तैयार हो जाएगा। उसके मन में पश्चाताप जैसी कोई बात नहीं आएगी।
मनुष्य लोभ उसके आध्यात्मिक बल को हानि पहुँचाता है। अग्नि में जब हम घी या लकड़ी डालते हैं तब वह और अधिक प्रज्वलित होकर धधकने लग जाती है। इसी प्रकार ऐसे लोग स्वयं तो सुलगते ही रहते हैं अथवा अशान्त रहते हैं और अपनों के अवसाद का कारण भी बन जाते हैं। मनुष्य की बढ़ती हुई कामनाएँ उसके सुख-चैन को भस्म कर देती हैं। उसके दिन-रात का आराम तक छीन लेती हैं और उसे कोल्हू का बैल बना देती हैं।
जब तक मनुष्य ईश्वरीय वरदान अपनी इस बुद्धि का उपयोग अपने विवेक से नहीं करेगा तब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। समय रहते उसे अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं को नियन्त्रित कर लेना होगा और अपने मन में सन्तोष का भाव लाना होगा। अन्यथा जीवन-पर्यन्त वह भटकता ही रहता है। अपने दिमाग को या खोपड़ी को दुरुस्त रखने के लिए उसे स्वयं की महत्त्वाकांक्षाओं का दमन करना ही होगा। इस प्रकार करके मनुष्य अपनी आन्तरिक शक्तियों का सदुपयोग करके सकारात्मक रुख अपना सकता है।

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