March 24, 2018

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ट्रिंग ट्रिंग...
ट्रिंग ट्रिंग वाली घंटी, गोल घुमाने वाले नंबर..वायरलेस और मोबाइल दुनिया में कहीं खो गए हैं।

1875 में अलेक्जैंडर ग्राहम बेल ने अकूस्टिक टेलीग्राफ विकसित किया और इसको पेटेंट करवाने का आवेदन भी तैयार किया. उन्होंने अमेरिका में होने वाला मुनाफा अपने निवेशकों के साथ साझा करने का वादा कर लिया था. अपने एक सहयोगी को उन्होंने इसे ब्रिटेन में भी पेटेंट करवाने के लिए कहा. साथ ही अपने वकील को उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन से पेटेंट का वादा मिलने के बाद ही अमेरिका में पेटेंट की कोशिश की जाए।
एलिशा ग्रे नाम की महिला भी अकूस्टिक टेलीग्राफ पर प्रयोग कर रही थीं. 14 फरवरी 1876 के दिन ग्रे ने अमेरिकी पेटेंट ऑफिस में ऐसे टेलीफोन डिजाइन के पेटेंट के लिए आवेदन किया जिसमें वॉटर ट्रांसमीटर का इस्तेमाल किया गया था।उसी दिन बेल के वकील ने भी पेटेंट का आवेदन किया। इस पर लंबी बहस है कि पेटेंट करवाने कौन पहले पहुँचा था। ग्रे ने बाद में बेल के पेटेंट आवेदन को चुनौती भी दी।
बहरहाल सारे विवाद के बीच ग्राहम बेल का पेटेंट, 174465 सात मार्च 1876 यानी आज के दिन अमेरिका में स्वीकृत हो गया। उनके पेटेंट में आवाज या दूसरी आवाजें ट्रांसमिट करने के तरीके और उपकरण शामिल थे। उन्होंने अगले ही दिन से इसके मॉडल पर काम शुरू किया। जो शुरुआती डिजाइन उन्होंने बनाया, वह ग्रे के पेटेंट जैसा ही था।
10 मार्च 1876 के दिन उनका टेलीफोन लिक्विड ट्रांसमीटर के जरिए काम करने लगा, ये भी ग्रे की डिजाइन जैसा ही था।

आवाज के कंपन से पर्दा हिलता और इससे पानी में एक सुई हिलती, इस प्रक्रिया से सर्किट में इलेक्ट्रिक प्रतिरोध पैदा होता। इस फोन पर उन्होंने मशहूर वाक्य बोले थे, "मिस्टर वॉटसन यहां आइए, मैं आपसे मिलना चाहता हूँ।" अगले कमरे में बैठे वॉटसन रिसीवर के जरिए इस वाक्य को साफ साफ सुन सके।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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