August 15, 2017

प्रकृति

        पंछियों की दुनिया से...
               - दीपाली शुक्ला
बालकनी में कबूतरों का डेरा न जमा होता तो पंछियों की दुनिया से जुडऩे का मौका ही न मिला होता। उनको देखना एक दिलचस्प  अनुभव है और उससे भी कहीं अधिक एक अनजानी दुनिया का सफर भी। उनकी सुंदरता ही नहीं उनका संघर्ष भी अन्दर तक छू जाता है। पेड़, ज़मीन, खेत कम हो रहे हैं और पंछी भी। तो ऐसे में एक कोशिश है कि पंछियों से, उनकी दुनिया से एक जुड़ाव बने ताकि पंछी और उनका वजूद इस दुनिया में बना रहे।
पंखों वाली पत्तियाँ
ठंड के कुहासे के बीच कहीं सूरज की झीनी सी रोशनी फैल रही है। झाडिय़ों की हरी-सूखी पातों की ओट से चीं-चीं की आवाज़ें आ रही हैं। पहले एक छोटी चिडिय़ा चिंचिंयाती झुरमुट से बाहर आई और एक सूखी शाख के सिरे पर बैठ गई। नन्हेें परों को झटकारते, गर्दन को इधर-उधर करते-करते वह हल्की  गरमाहट को अपने भीतर समेटने लगी। सूखी शाख उसके वज़न से हिल रही थी। अभी कुछ पल ही बीते थे कि एक और चिडिय़ा आ गई। आकार में कुछ बड़ी। उसको देखते ही चिंचिंयाहट हुई। कभी ज़ोर से तो कभी धीरे। फिर उस शाख पर एक और चिडिय़ा उग आई। देखते ही देखते पाँच-छह चिडिय़ों का पूरा कुनबा उस हिलती-डुलती शाख पर यूँ बैठ गया मानो शाख पर पत्तियाँ आ गई हों, पत्तियां पंखों वाली पत्तियाँ। सूखी शाख हौले से हिल रही है...
नाराजग़ी
पीलू लगातार हरिली को पुकार रहा था। पर हरीली थी कि न जाने कहाँ छुपकर बैठी थी। कल पीलू ने हरीली को कुछ कहा था जो उसको अच्छा  नहीं लगा। पीलू ने ऊपर-नीचे, फूलों के गुच्छों  में, कोटर में हर जगह हरिली को ढूंढा। उसकी टरररर....करररर...सुनकर बुलबुल और गौरेया तक पेड़ों की पत्तियों की ओट से बाहर निकल आईं। क्या तुमने हरीली को देखा। नहीं। क्या तुम्हें हरीली दिखी। नहीं। पीलू ने कुछ पीले फूलों को खाया। फिर कुछ देर चुपचाप बैठा रहा। और फिर पुकारने लगा।  लेकिन हरीली पेड़ के एक सिरे पर दूसरी ओर मुँह किए बैठी रही।  
कतार
बरसात धीमी हो चली है। और सूरज बरसाती बादलों के पार हो गया है। सतरंगी चांदा और चंद फुहारें। आम के पेड़ से धीरे-धीरे आवाज़ें तेज हो चली हैं। पानी से तरबतर, गदबद चिडिय़ा एक-एक करके तार पर बैठ गई हैं। कुछ चुप्प हैं और सिरे पर बैठी हैं। कुछ एक-दूसरे से बातों में मगन हैं। एक पंखों को फटकारते ऊपर उड़ी, पानी से बाकी तर हुईं। फिर सब पंखों से पानी झाडऩे लगीं। सब फिर गीली हुईं। तार और चिडिय़ों के ठीक पीछे चांदा धीरे-धीरे मिटने लगा।
भूख
बारिश जारी थी। तोतों को भूख लगी थी, ज़ोरों की भूख। पानी के कारण कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। पूरा दल भीगी पत्तियों से टपकते पानी में पंखों को समेटे डालियों में दुबका हुआ था। दोपहर बीत चुकने को थी कि बरसात की गति थमने लगी। सब उड़ चले।
एक फलियों से लदा पेड़ दिखा। सब ने उस पेड़ का रूख किया। तुरन्त फलियों को खाने की होड़ लगी। भूख इतनी थी कि उलटते लटकते, कभी एक-दूसरे को धकियाते तोतों ने बिना समय गँवाए खूब सारी फलियाँ चटकर डालीं। बड़े तो बड़े, छोटे भी पीछे न थे। फिर बौछारें तेज़ हुईं और पेड़ से तोतों का झुंड गायब हो गया।
वजूद
गर्मी में छांव, बरसात में छत, ठंड में धूप। सबको चाहिए। उस झाड़ी में जहाँ पूरा कुनबा रहता है। उस पेड़ पर जहाँ अलग-अलग कई कुनबे रहते हैं। उस मुंडेर पर जहाँ ढेर सारे पंछियों का बसेरा है। सब जूझते हैं अपनी-सी सूरतों से, कुछ अलग सूरतों से, कुछ आकार में अपने से बड़ों से। बिना इसके तो जगह मिलेगी नहीं मुट्ठी भर।  
धूप का टुकड़ा
शीशम ठंड से कांप रहा है। पत्तियाँ हरी, फिर पीली, फिर सुनहरे रंग में बदल गई हैं। कुछ पत्तियाँ अभी भी डालों पर टंगी हैं। पर सबसे ऊपर की पत्तियाँ अब विदा हो चुकी हैं। सूखी डालों पर बुलबुल भी बैठकर गुनगुनाहट का मज़ा लेना चाहती है, कोयल, मुनिया और चिडिय़ा भी। पर उस डाल पर तो कोई एक ही बैठ सकता है। शीशम बस देख रहा है। रोशनी के बढ़ते ही गिलहरी दौड़ रही हैं सूखे तने और डालों को गुदगुदी करतीं। उसे धूप के टुकड़ों की कोई फिक्र नहीं। बुलबुल और चिडिय़ा ने पँखों को ताना और धूप का स्वाद चखने को उड़ान भरी। बुलबुल और चिडिय़ा ने डाल हथिया ली। बाकी परिंदे देख रहे हैं। पेड़ के इर्द-गिर्द सुनहरी अलाव की आभा सूरज की रोशनी में चमक उठी है। 

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