June 14, 2016

मुद्दा

  मासूमों के लिए खतरनाक होता आज का पर्यावरण
                                   - डॉ. महेश परिमल

अगर आप सोच रहे हैं कि आप जिस घर में रह रहे हैं, वहाँ आपका बच्चा पूरी तरह से सुरक्षित है। उसे किसी तरह की कोई बीमारी नहीं हो सकती। वह शुद्ध वायु ग्रहण कर रहा है। उसे कोई रोग हो ही नहीं सकता। तो आप मुगालते में हैं। आपको पता नहीं है कि बीमारी घर के दरवाजे बंद रखने से भी आ सकती है। आपका बच्चा जिस मार्किंग पेन का इस्तेमाल कर रहा है, उसमें जायलिन नामक रसायन का उपयोग होता है। इससे बच्चे का सरदर्द करता है, चक्कर आते हैं, साँस लेने में तकलीफ होती है और शरीर का बेलेंस गड़बड़ हो जाता है। इतनी दूर तक बहुत ही कम अभिभावक सोच पाते हैं। आज हालात ऐसे है कि तीसरे विश्व के गरीब देशों में जो पाँच बच्चे जन्म लेते हैं, उसमें से एक बदनसीब बच्चा होता है, जो अपना पाँचवाँ जन्मदिन नहीं मना पाता। विश्व की जनसंख्या में बच्चों का प्रतिशत दस है, पर विश्व के नागरिकों को जो बीमारियाँ होती हैं, उसमें से 40 प्रतिशत बीमारियाँ बच्चों को होने लगी है। हर रोज हवा और पानी के प्रदूषण के कारण विश्व में 5500 बच्चे मौत का शिकार होते हैं। एक तरफ तो यह दावा किया जा रहा है कि नई-नई दवाओं का आविष्कार हो रहा है और स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांति हो रही है, पर दूसरी तरफ बाल मृत्यु और बच्चों की बीमारियों भी लगातार बढ़ रही हैं। हमारे पास ये दो तथ्य हैं, इसमें से किसे सच मानें। पर मौत से बड़ा कोई सच नहीं होता, इसलिए हम बच्चों की मौत के आंकड़े देख लें, तो पहली बात सच साबित हो रही है।
इस समय देश का जो पर्यावरण है, उसमें बच्चे साफ्ट टारगेट बन रहे हैं। हमारे ही घर में 150 से अधिक रसायनों का प्रयोग होता है। पर्यावरण प्रदूषण एक तरह से बच्चों के यमदूत साबित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही एक चौंकाने वाली जानकारी दी है कि प्रदूषित पानी और जहरीली वायु के कारण हर साल विश्व के 30 लाख मासूम मौत की गोद में सो जाते हैं। नेचुरल रिसोर्सिंग डिफेंस काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार आज बच्चों के सामने जो पाँच खतरे हैं, उसे बताया है। इनमें सबसे पहला खतरा है सीसा, दूसरा वायु प्रदूषण, तीसरा जंतुनाशक दवाएँ, चौथा तम्बाखू का धुआँ और पाँचवा है पीने के पानी की अशुद्धियाँ। एक अनुमान के अनुसार औद्योगीकरण की दौड़ में पिछले 50 साल में 75000 नए रसायनों की खोज की जा चुकी है। इन रसायनों से मानव जीवन को कितना नुकसान हो रहा है, इसकी जानकारी अभी तक नहीं है। आजकल उद्योगों में खतरनाक रसायनों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। इससे मानव जीवन को कितना असर हो रहा है, इसका जरा भी विचार नहीं किया गया है। आज इस दिशा में यदि कोई कदम बढ़ाते हुए शोध करना चाहता है, तो उद्योगपतियों द्वारा उसका प्रतिकार किया जाता है।
पर्यावरण में मिल रहे नित नए रसायानों के कारण बच्चों के स्वास्थ्य की जो समस्याएँ आ रही हैं, उससे स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हो उठे हैं। पिछले 20 सालों में रसायनों के हानिकारक असर के कारण बच्चों में अस्थमा का प्रमाण तीन गुना बढ़ गया है। किसी भी रसायन का हानिकारक असर एक वयस्क पर होता है, उसकी तुलना में एक बच्चे पर अधिक असर होता है। इसका कारण आजकल के बच्चे एक वयस्क की तुलना में अधिक आहार लेते हैं और अधिक सांस लेते हैं। बच्चे के पूरे अवयव वयस्क की तरह विकसित नहीं होते और अपरिपक्व होते हैं। इसलिए नए रसायनों का असर सबसे पहले बच्चों पर ही होता है। बच्चे आज जिस तरह से प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं, वह प्रदूषण घर के बाहर रास्ते पर है, मैदान पर है, ऐसा मान लेना जरूरी नहीं है। आज घर में कुल 62 हानिकारक रसायनों का उपयोग हो रहा है। इसका सीधा असर बच्चों पर हो रहा है। कुछ घरों में इस तरह के रसायनों की संख्या 150 तक पहुँच गई है। अब हमें पहचानना है कि ये रसायन कौन-कौन से हैं। बच्चे की मार्किंग पेन का उदाहरण हमने शुरू में ही देख लिया। हम उससे भी आगे चलें, तो पाएँगे कि बच्चा जब झूले पर झूलता है या माँ की गोद में रहता है, वह तभी से प्रदूषण का शिकार होता रहता है। इस पर अब तक कितने अभिभावकों का ध्यान गया। घर में गैस का चूल्हा जलता है, सभी के घर में जलता होगा। इस गैस चूल्हे से कार्बन मोनो आक्साइड जैसी जहरीली गैस निकलती है। यह गैस बच्चे के खून के रक्तकणों को खतम कर देते हैं। घर का कोई सदस्य यदि धूम्रपान करता है, तो उसके धुएँ से बच्चे के फेफड़े को नुकसान पहुँचता है। आगे चलकर यह कैंसर के रूप में हमारे सामने आता है। घर में पुताई का काम चल रहा हो, तो बच्चे को वहाँ से दूर कर दिया जाए, तो बेहतर।
आपको शायद पता न हो, पर यह सच है कि दीवारों पर लगाए जाने वाले पेंट्स में उपयोग में लाए गए रसायनों की तीव्र गंध हमारे नाक में घुस जाती है। गंध के साथ सीसे के रजकण भी हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है। सीसा एक प्रकार की जहरीली धातु है, यह हमारे ज्ञानतंतुओं और किडनी को नुकसान पहुँचाती है। अब कितने पालक ऐसे होंगे, जो घर में पुताई का काम चल रहा हो, तो बच्चों को कहीं दूर भेज देते होंगे। जिन घरों में भोजन एल्युमिनियम के बर्तनों में बनता है, उनके लिए भविष्य में यह भोजन किसी जहर से कम नहीं होगा। एल्युमिनियम के बर्तन से एल्युमिनियम ऑक्साइड नामक जहर होता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक साधनों को पेक करने के लिए इस्तेमाल में लाया जा रहा एस्बेस्टस भी एक खतरनाक रसायन है। यदि इस एस्बेटस को जलाया जाए, तो उससे निकलने वाला धुआँ हमारे शरीर को भारी नुकसान पहुँचाता है। नल में जो पीने का पानी आता है, उसमें बैक्टीरिया होते हैं। पानी यदि बोरिंग या पाताल कुएँ का है, तो भी उसमें फ्लोरिन और आर्सेनिक जैसे जहरीले पदार्थ होते हैं। ये सभी पदार्थ बच्चे के स्वास्थ्य पर खराब असर डालते हैं। बच्चे की खुराक में पानी के साथ जंतुनाशक दवाएँ होती हैं। एक वयस्क नागरिक की अपेक्षा बच्चे को अधिक नुकसान होता है। जंतुनाशक वाएँ बच्चे की आँतों को प्रभावित करती हैं। ये दवा बच्चों की आँतों की दीवारों पर चिपक जाती हैं। तब शरीर के पोषक पदार्थों को खून में जाने से रोकते हैं। इससे बच्चे की किडनी का पूरा विकास नहीं हो पाता। इस तरह से बच्चे के शरीर में जंतुनाशक दवाओं के जहरीले रसायन जमा होते रहते हैं। इनका समय पर निवारण नहीं होता। हर साल 22 लाख बच्चे साँ की बीमारी का शिकार होकर मौत को भेंट चढ़ रहे हैं। इसमें से 60 प्रतिशत बच्चे घर के वायु प्रदूषण के कारण कई गंभीर रोगों का शिकार हो रहे हैं।
इसलिए यदि आप अच्छे अभिभावक बनना चाहते हैं, तो बच्चों को घर के ही पांच खतरनाक चीजों से दूर रखें। रसोई में जब खाना बनाया जा रहा हो, तो बच्चों को घुसने ही न दिया जाए। घर में पुताई हो रही हो, तो बच्चों का कुछ दिनों के लिए रिश्तेदार के यहां भेज दें। पानी या तो उबालकर दें, या फिर आजकल जो पूरी तरह से प्यूरीफाई है, वही दिया जाए। एल्युमिनियम के बर्तन में भूलकर भी भोजन न बनाएँ। यदि बच्चों को स्वस्थ और सबल बनाना है, तो ये उपाय तो करने ही होंगे।

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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