October 20, 2015

हरेली

अंधविश्वास नहीं...
- पंकज अवधिया
हरेली (हरियाली अमावस्या) का पर्व वैसे तो पूरे
देश में मनाया जाता है पर छत्तीसगढ़ में इसे विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों के सामने नीम की शाखाएँ लगा देते है। यह मान्यता है कि नीम बुरी आत्माओं से रक्षा करता है। यह पीढिय़ों पुरानी परम्परा है पर पिछले कुछ सालों से इसे अन्ध-विश्वास बताने की मुहिम छेड़ दी गयी है। इसीलिये मैने इस विषय को विश्लेषण के लिये चुना है।
नीम का नाम लेते ही हमारे मन मे आदर का भाव आ जाता है क्योंकि इसने पीढिय़ों से मानव जाति की सेवा की है और आगे भी करता रहेगा। आज नीम को पूरी दुनिया में सम्मान से देखा जाता है। इसके रोगनाशक गुणों से हम सब परिचित हैं। यह उन चुने हुये वृक्षों में से एक है जिनपर सभी चिकित्सा प्रणालियाँ विश्वास करती हैं। पहली नजर में ही यह अजीब लगता है कि नीम को घर के सामने लगाना भला कैसे अन्ध-विश्वास हो गया?
बरसात का मौसम यानि बीमारियों का मौसम। आज भी ग्रामीण इलाकों में लोग बीमारी से बचने के लिये नीम की पत्तियाँ खाते हैं और इसे जलाकर वातावरण को विषमुक्त करते है। नीम की शाखा को घर के सामने लगाना निश्चित ही आने वाली हवा को रोगमुक्त करता है पर मैंने जो हरेली में नीम के इस अनूठे प्रयोग से सीखा है वह आपको बताना चाहूँगा।
इस परम्परा ने वनस्पति वैज्ञानिक बनने से बहुत पहले ही नीम के प्रति मेरे मन मे सम्मान भर दिया था। ऐसा हर वर्ष उन असंख्य बच्चों के साथ होता है जो बड़ों के साये मे इस पर्व को मनाते हंै। पर्यावरण चेतना का जो पाठ घर और समाज से मिलता है वह स्कूलों की किताबों से नहीं मिलता। हमारे समाज से बहुत से वृक्ष जुड़े हुये हैं और यही कारण है कि वे अब भी बचे हुये हैं।
नीम के बहुत से वृक्ष हैं हमारे आस-पास हैं पर हम उनकी देखभाल नहीं करते। हरेली में जब हम उनकी शाखाएँ एकत्र करते है तो उनकी कटाई-छटाई हो जाती है और इस तरह साल-दर-साल वे बढ़कर हमें निरोग रख पाते हैं। यदि आप इस परम्परा को अन्ध-विश्वास बताकर बन्द करवा देंगे तो अन्य हानियों के अलावा नीम के वृक्षों की देखभाल भी बन्द हो जायेगी।
पिछले वर्ष मैं उड़ीसा की यात्रा कर रहा था। मेरे सामने की सीट पर जाने-माने पुरातत्व विशेषज्ञ डाँ.सी.एस.गुप्ता बैठे थे। उन्होंने बताया कि खुदाई में ऐसी विचित्र मूर्ति मिली है जिसमें आँखो के स्थान पर मछलियाँ बनी है। उनका अनुमान था कि ये मूर्ति उस काल में हुयी किसी महामारी की प्रतीक है। मैंने उन्हें बताया कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हर बीमारी को राक्षस रूपी चित्र के रूप मे दिखलाया गया है। वे प्रसन्न हुये और मुझसे उन ग्रंथों की जानकारी ली। पहले जब विज्ञान ने तरक्की नहीं की थी और हम बैक्टीरिया जैसे शब्द नहीं जानते थे तब इन्हीं चित्रों के माध्यम से बीमारियों का वर्णन होता रहा होगा। इन बीमारियों को बुरी आत्मा के रूप मे भी बताया जाता था और सही मायने में ये बीमारियाँ किसी बुरी आत्मा से कम नहीं जान पड़ती है। यदि आज हम बुरी आत्मा और बीमारी को एक जैसा मानें और कहें कि नीम बीमारियों से रक्षा करता है तो यह परम्परा अचानक ही हमें सही लगने लगेगी। मुझे लगता है कि नीम के इस प्रयोग को अन्ध-विश्वास कहना सही नहीं है।
हर वर्ष हरेली के दिन कई संस्थाओं के सदस्य गाँव-गाँव घूमते है और आम लोगों की मान्यताओं व विश्वास को अन्ध-विश्वास बताते जाते हैं। एक बार एक अभियान के दौरान एक बुजुर्ग मुझे कोने मे लेकर गये और कहा कि छत्तीसगढ़ की मान्यताओं और विश्वासों को समझने के लिये एक पूरा जीवन गाँव मे बिताना जरूरी है। मुझे उनकी बात जँची और इसने मुझे आत्मावलोकन के लिये प्रेरित किया।

1 Comment:

Rajesh said...

Very apt and scientific... More appropriate for the current days..

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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