विकास का केन्द्र
रहा है
छत्तीसगढ़
- जी.के. अवधिया
भारत में दो
क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया- एक तो 'मगध'
जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण बिहार बन गया और दूसरा 'दक्षिण
कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण 'छत्तीसगढ़'
बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से
ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। छत्तीसगढ़ तो वैदिक और पौराणिक काल से ही
विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके
भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव,
शाक्त, बौद्ध के
साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ का पौराणिक महत्त्व
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कौशल,
जिसका विस्तार पश्चिम में त्रिपुरी से लेकर पूर्व में उड़ीसा
के सम्बलपुर और कालाहण्डी तक था का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक
पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कौशल'
प्रदेश, जो कि
कालान्तर में 'उत्तर कौशल' और
'दक्षिण कौशल' नाम से दो
भागों में विभक्त हो गया, का 'दक्षिण
कौशल' ही वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी
(जिसका नाम उस काल में चित्रोत्पला था) का मत्स्यपुराण तथा महाभारत के भीष्म पर्व
में वर्णन है -
चित्रोत्पला चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा।
मन्दाकिनीं वैतरणीं कोषां चापि महानदी।।
- महाभारत- भीष्मपर्व- 9/34
मन्दाकिनीदशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।
तमसा पिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च।।
मत्स्यपुराण- भारतवर्ष वर्णन प्रकरण- 50/25)
चित्रोत्पला वेत्रवपी करमोदा पिशाचिका।
तथान्यातिलघुश्रोणी विपाया शेवला नदी।।
ब्रह्मपुराण -
भारतवर्ष वर्णन प्रकरण- 19/31)
वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा
महानदी का स्पष्ट उल्लेख है। यहाँ स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने
वाले शृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था
जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। इस दृष्टि से
राम को धरती पर लाने का प्रमुख श्रेय छत्तीसगढ़ को ही प्राप्त है। राम के काल में
यहाँ के वनों में ऋषि- मुनि- तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की
अवधि में राम यहाँ आये थे।
प्रतीत होता है कि राम के काल में भी कौशल राज्य उत्तर
कौशल और दक्षिण कौशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश काव्य में उल्लेख है कि
राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। यदि
शरावती और श्रावस्ती को एक मान लिया जाये तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में
था और कुश दक्षिण कौशल के शासक बने। सम्भवत: उनकी राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर
जिले में थी, शायद कोसला ग्राम ही उस काल की
कुशावती थी। यदि कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि मान लिया जावे तो भी
किसी प्रकार की विसंगति प्रतीत नहीं होती। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने
के लिये विन्ध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य
दक्षिण कौशल में ही था।
उपर्युक्त सभी
उद्धरणों से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ आदिकाल से ही ऋषियों,
मुनियों और तपस्वियों का पावन तपोस्थल रहा है।
रामायण कालीन छत्तीसगढ़
ऐसे अनेकों तथ्य हैं जो इंगित करते हैं कि ऐतिहासिक
दृष्टि से छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्राचीनता रामायण युग को स्पर्श करती है। उस काल
में दण्डकारण्य नाम से प्रसिद्ध यह वनाच्छादित प्रान्त आर्य-संस्कृति का प्रचार
केन्द्र था। यहाँ के एकान्त वनों में ऋषि-मुनि आश्रम बना कर रहते और तपस्या करते
थे। इनमें वाल्मीक, अत्रि, अगस्त्य,
सुतीक्ष्ण प्रमुख थे इसीलिए
दण्डकारण्य में प्रवेश करते ही राम इन सबके आश्रमों में गये।
प्रतीत होता है कि छोटा नागपुर से लेकर बस्तर तथा कटक से
लेकर सतारा तक के बिखरे हुये राजवंशों को संगठित कर राम ने वानर सेना बनाई हो।
आर.पी. व्हान्स एग्न्यू लिखते हैं, 'सामान्य
रूप से इस विश्वास की परम्परा चली आ रही है कि रतनपुर के राजा इतने प्राचीनतम काल
से शासन करते चले आ रहे हैं कि उनका सम्बन्ध हिन्दू 'माइथॉलाजी'
(पौराणिक कथाओं) में वर्णित पशु कथाओं (fables) से है। (चारों महान राजवंश) सतारा के नरपति,
कटक के गजपति, बस्तर के
रथपति और रतनपुर के अश्वपति हैं (A
Reeport on the Suba or Province of Chhattisgarh - written in 1820)।
अश्व और हैहय पर्यायवाची हैं। श्री एग्न्यू का मत है कि कालान्तर में 'अश्वपति'
ही हैहयवंशी हो गये। इससे स्पष्ट है कि इन चारों राजवंशों का
सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन है तथा उनके वंशों का नामकरण चतुरंगिनी सेना के अंगों के
आधार पर किया गया है।
बस्तर के शासकों का रथपति होने के प्रमाण स्वरूप आज भी
दशहरे में रथ निकाला जाता है तथा दन्तेश्वरी माता की पूजा की जाती है। यह राम की
उस परम्परा का संरक्षण है जबकि दशहरा के दिन राम ने शक्ति की पूजा कर लंका की ओर
प्रस्थान किया था। यद्यपि लोग दशहरा को रावण- वध की स्मृति के रूप में मनाते हैं
किन्तु उस दिन रावण का वध नहीं हुआ था वरन उस दिन राम ने लंका के लिए प्रस्थान किया था। (दशहरा को रावण-वध का दिन कहना
ठीक वैसा ही है जैसे कि संत तुलसीदास के रामचरितमानस को रामायण कहना।)
राजाओं की उपाधियों से यह स्पष्ट होता है राम ने
छत्तीसगढ़ प्रदेश के तत्कालीन वन्य राजाओं को संगठित किया और चतुरंगिनी सेना का
निर्माण कर उन्हें नरपति, गजपति,
रथपति और अश्वपति उपाधियाँ प्रदान की। इस प्रकार रामायण काल
से ही छत्तीसगढ़ प्रदेश राम का लीला स्थल तथा दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति का
केन्द्र बना।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई0 में
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण
में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के
संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय
छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी
छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध
इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों,
वकाटकों, गुप्तों,
राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय
वंशों, सोमवंशियों, नल
वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में
क्षेत्रीय राजवंशों का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में
प्रमुख थे बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के
सोमवंशी और कवर्धा के फणि नागवंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में
चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहते है। इस मंदिर में सन् 1349 ई.
का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नागवंश के राजा
रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं।
भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।
छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का
रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार,
दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य
स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला
राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और
बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और
उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं,
जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह
से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का
दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और
बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी
कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम
भूमि ईशान कोण में है। पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाडिय़ाँ हैं और आग्नेय में
सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है।
छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं उत्तर में सतपुड़ा,
मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और
दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं- महानदी,
शिवनाथ, खारुन,
पैरी तथा इंद्रावती नदी।
सम्पर्क: अवधिया
पारा चौक, पीपल झाड़ के पास,
रायपुर (छ.ग.) 492001
Email- gkawadhiya@gmail.com,
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