July 05, 2014

परियोजना

नदियाँ बेचने की तैयारी

 - महेश परिमल

 केंद्र सरकार ने नदियों को जोडऩे की एक विशाल परियोजना तैयार की है। इस पर अमल भी शु डिग्री हो गया है। इस परियोजना में दूरदर्शिता का पूरी तरह से अभाव है। इस परियोजना से सम्बन्धित ऐसे कई सवाल हैंजिस पर केंद्र सरकार खामोश है। उसके पास सवालों के जवाब हैं ही नहीं। इससे ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने यह परियोजना प्रारंभ तो कर दी हैपर इसके दूरगामी परिणामों की उसे चिंता नहीं है। पर्यावरणविदों से भी विस्तार से बात नहीं हो पाई है। न ही इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर गहराई से विचार किया गया है। ऐसे में नई सरकार के सामने यह चुनौती होगी कि इस परियोजना पर किस तरह से अमल किया जाए।
पूर्व में बहती गंगाब्रह्मपुत्र और महानदी जैसी विशाल नदियों पर कुल 250  बाँध बनाकर उनका पानी पश्चिम की तरफ बहती नदियों में डालने और राजस्थान के रेगिस्तानी प्रदेश तक ले जाने की एक विशाल परियोजना केंद्र सरकार के प्रयासों से आकार ले रही है। इस योजना पर अरबों रुपये खर्च होने हैं। इसे साकार करने के लिए केंद्र सरकार के पास पूँजी नहीं होगीतो इस बहाने देश की तमाम बड़ी नदियों को बेचना होगा। इससे लाखों हैक्टर जंगलों का नाश होगा। इस परियोजना का लाभ सबसे अधिक सीमेंट और स्टील उद्योगोंठेकेदारों और नेताओं को होगा। इससे संभवत: पानी की आपूर्ति को संतोषप्रद बनाया जा सकता है। पर गरीबों के लिए पीने के पानी की समस्या का हल नहीं होगाक्योंकि यह पानी इतना महँगा होगा कि गरीब लोग इस पानी की कीमत नहीं चुका पाएँगे। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस परियोजना का असर वर्षा चक्र पर भी पड़ेगा और भारतीय महाद्वीप में पूरा वर्षा चक्र ही गड़बड़ा जाएगा।
अगस्त 2005 में  उत्तर प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश सरकार के बीच एक समझौता हुआ। इसमें यह तय हुआ कि बेतवा नदी के पानी का ट्रांसफर किया जाएगा। पूरे देश की कुल 37 नदियों को जोडऩे की दिशा में यह पहला प्रयास था। नदियों के रास्ते पर बाँध बनाकर उनके पानी को समुद्र में जाने से रोकना इसका मुख्य उद्देश्य है। अब इसे दूसरी तरह से देखें। यदि नदियों का पानी समुद्र में नहीं जाएगातो उसके किनारे तेज़ी से फैलने लगेंगे। इसका उदाहरण गोदावरी नदी में देखा गया। इसके रास्ते पर कई बाँध बनाए गएजिससे नदी के मुहाने का 18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र समुद्र में डूब गया। इसी तरह यदि अन्य नदियों पर बाँध बनाए गएतो ज़मीन पर समुद्र के अतिक्रमण की प्रबल आशंका है।
कुछ समय पहले ही बैंगलोर में आयोजित एक बैठक में देश के प्रख्यात वैज्ञानिक शामिल हुए। इस बैठक में देश की नदियों को जोडऩे और उसके पर्यावरणीय असर के संभावित परिणामों पर चर्चा की गई। इस बैठक में जो मुद्दे उठाए गएउन पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया है। इसके अनुसार बंगाल की खाड़ी में हर वर्ष बारिश का 4700 अरब घनमीटर पानी और विभिन्न नदियों का 3000 अरब घनमीटर पानी आता है। इसके एवज में यहीं से वाष्पन के माध्यम से 3600 अरब घनमीटर पानी भाप के रूप में उड़ जाता है। इस तरह से बंगाल की खाड़ी में मीठे पानी का वाष्पन होता है। इससे कहीं अधिक मीठा पानी उसे हिमालय की नदियों और बारिश के द्वारा प्राप्त होता है। इस कारण अरब महासागर और हिंद महासागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में खारापन बहुत ही कम है। अब यदि नदियों को जोडऩे की योजना द्वारा बंगाल की खाड़ी में आने वाली नदियों के जल को पश्चिम की नदियों में जाने दिया जाएगातो इसका असर भारत की बारिश पर होगा। बारिश के चार महीनों में बंगाल की खाड़ी में मीठे पानी की आवक बहुत बढ़ जाती है। अक्टूबर महीने तक जब बारिश का मौसम खत्म होता हैतब यह पानी पूरे देश का चक्कर काटता हुआ श्रीलंका से होता हुआ अरब सागर में पहुँच जाता है। इसके बाद वह वहाँ के पानी को उष्णता प्रदान करता है। इस तरह से बारिश का पानी पहले के महीनों में पहुँचने से अरब सागर का तापमान बढ़ता है। अरब सागर में यदि बारिश के बादल पैदा होते हैंतो इसमें बंगाल की खाड़ी से आने वाले गर्म पानी के प्रवाह की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे देश में कुल जितनी बारिश होती हैउसका 70 प्रतिशत भाग दक्षिण-पश्चिमी हवाओं (मानसून) के कारण होता है। इस वर्षा का मुख्य आधार बंगाल की खाड़ी में पैदा होने वाला खारेपन का आवरण है। पूर्वी भारत की नदियों का पानी पश्चिमी भारत में ले जाया जाएगातो हमारे देश में वर्षा का चक्र गड़बड़ाना अवश्यंभावी है। केंद्र सरकार ने एक तरफ नदियों को जोडऩे की योजना पर अमल शुरू कर दिया हैतो दूसरी तरफ उसके पास इस योजना के सम्बंध में कोई आधारभूत जानकारी माँगी जाएतो वह नहीं मिल रही है। इस योजना के अनुसार कुल कितने बांध बनाए जाएँगेइस पर कितना खर्च आएगा। इतनी अधिक धनराशि आएगी कहाँ सेइसमें कितनी खेती और कितनी जंगल की ज़मीन कब्ज़े में ली जाएगीकितने वृक्षों का संहार होगाकितने लोग बेघरबार हो जाएँगेउन्हें कहाँ बसाया जाएगाउनके लिए क्या हमारे देश में ज़मीन हैकितना पानी बंगाल की खाड़ी से निकालकर दूसरी नदियों में डाला जाएगाइसका समुद्रतट की इकॉलॉजी पर असर क्या होगाइस योजना के लिए क्या कोई विदेशी सहायता ली जा रही हैयदि ली जा रही हैतो किन शर्तों पर ली जा रही हैक्या किसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी को बाँध और नहर बनाकर पानी के वितरण के अधिकार दिए जाएँगेउसके कारण क्या गरीबों को पानी मुफ्त में मिलेगा या उसकी कीमत चुकानी होगीविदेशी कंपनियाँ  हमारे ही देश की नदियों का पानी हमें ही बेचेंगीतो उससे होने वाला मुनाफा क्या अपने देश भेज देंगीया हमारे देश में खर्च करेंगीइस योजना में नेताओं की क्या भूमिका होगीइस तरह के अनेक सवाल ऐसे हैंजिसका जवाब देश को चाहिएपर सरकार इस बारे में खामोश है। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा है। यही हाल रहातो देश की नदियाँ  विदेशी हाथों में बिक जाएँगी और हम देखते रह जाएँगे। 

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