July 05, 2014

रूखी-सुखी

रूखी-सुखी 
अकाल के अनुभवों से रूबरू कराती किताब   
- दीपाली शुक्ला  
           
  किताब का नाम कुछ आश्चर्य पैदा करता हैरूखा यानि अकाल और उसमें सुखी होने का भाव दोनों कुछ विरोधाभासी लगते हैं। यह शायद इसलिए भी कि जब हम अकाल शब्द के बारे में सोचते हैं तो कई करूण दृश्य आँखों के आगे तैरते हैं। वो दृश्य जो हमने फिल्मों में या वृत्त चित्रों में देखे हैं। लेकिन जब आप इस किताब को पढ़ते हैं तो अकाल का एक नया दृश्य  बरबस उभरता है।
अकाल क्यो पड़ाउस समय किन फसलों को उगाने की कोशिश की गईलोग क्या खाते थेकिस तरह का संघर्ष था आदि।
एक और बात जो आपको विस्मित करती है वह यह है कि अकाल का यह पूरा दस्तावेज़ीकरण आधारशिला शिक्षण केन्द्र  के बच्चों ने किया है। एक स्थानीय संगठन द्वारा अकाल होने पर निकाली गई रैली ने इस दस्तावेज़ीकरण को जन्म दिया।
यह विचार इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि बच्चों ने इस कठिन हालात की पड़ताल करनी चाही और उसे कई पहलुओं से समझने का प्रयास किया। एक तरह से मौखिक परम्परा में बसे ज्ञान को भी संजोने की कोशिश की गई।
इस किताब में अलग-अलग पन्नों पर अकाल के बारे में अलग-अलग तरह की जानकारी है। जैसे,
अकाल क्यों पड़ा?
मोगरी के रामा भाई ने बताया कि एक बार उन्दर काल पड़ा था। उस साल चूहे बहुत बढ़ गए थे। चूहों ने सारी फसल खा ली। अनाज भी चूहे खा गए। इसीलिए इसे उन्दर काल कहते हैं।
इसी तरह एक साल बहुत बड़ी संख्या में टिड्डे आ गए थे। टिड्डों ने पूरी फसल खा ली। इस कारण से भी अकाल पड़ा।
आदिवासियों का यह भी मानना है कि नमक को मटके में भर के गाड़ दें तो अकाल पड़ता है।
अकाल में लूटपाट
दूधखेड़ा के जगादार भाई ने बताया कि दिन में भी अनाज चोरी करने लोग आते थे। चोरियों के डर सेजिसके पास अनाज था वह ज़मीन में गाड़कर रखता था। थोड़ा-थोड़ा निकालकर खाते थे।
अकाल के दूसरे साल क्या हुआ?
खाने का अनाज लेने बड़वानी जाना पड़ता था। वहाँ आने-जाने में एक रात और दो दिन लगे जाते थे। रात वहीं पर रुकना पड़ता था।
पांजरिया गाँव के राजू भाई ने बताया कि उनके क्षेत्र में सभी फसलें ठीक ही पकी हैं।
अकाल की किंवदन्तियाँ
एक लोककथा ऐसी है कि एक परिवार को एक मक्का का दाना मिल गया। उस दाने को उबालकर उसका पानी पीते थे। दूसरे दिन फिर से उबालकर उसका पानी पीते थे। एक दिन एक बच्चे को वह दाना मिल गया। उसने वह दाना खा लिया। तो सारे परिवार के लोग मर गए।
आधारशिला शिक्षण केन्द्रों के बारे में
लोगों की भागीदारी और पहल से इसकी शुरुआत 1998 में हुई। यह एक आवासीय स्कूल है जहाँ आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं। कुछ करते हुए सीखनाअपने समाज की समस्याओं के साथ जूझते हुए सीखना- यह आधारशिला की पढ़ाई की विशिष्टता है।
इस किताब में लिखे अनुभवों को इसके चित्र जीवन्त बनाते हैं। क्योंकि सौ चित्र व छायाचित्र वहीं के हैं यानी उसी इलाके के। नर्गिस शेख जिन्होंने इस किताब का चित्रांकन व डिजाइन किया है उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि चित्र शब्दों के साथ घुलमिलकर पूरे परिदृश्य  को सजीव बनाएँ।

किताब-  रूखी-सुखी- पशिचमी निमाड़ में अकाल- 
आदिवासियों का अनुभव,
प्रकाश·: एकलव्य ई-10शंकर नगर बी.डी.ए. कॉलोनी,
शिवाजी नगरभोपाल- 462 016 (म.प्र.)                        मूल्य- 45 रुपए।

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