July 05, 2014

जीवन- दर्शन

असंग्रह है अनमोल

- विजय जोशी
 आचरण में आवश्यकता से अधिक के संग्रह की प्रवृति अनुचित और अनर्थकारी है। लोभ पर यात्रा का यह मार्ग अंतत: पतन के द्वार पर दस्तक का प्रथम चरण है। कहा ही गया है- सांई इतना दीजिएजामे कुटुम्ब समायमैं भी ना भूखा रहूँ  साधु न भूखा जाय। महात्मा गाँधी ने भी कहा है- धरती पर मनुष्य की आवश्यकता से कई गुना अधिकपर उसके लालच के मुकाबले बहुत कम है। संग्रह की प्रवृत्ति आरंभ में असुरक्षा के भाव के सामने आत्मरक्षा का उद्घोष बनती हैलेकिन धीमे-धीमे आदत का अंग बन जाती हैं।
बायजीद एक बहुत प्रसिद्ध सूफी संत थे। वे हज की यात्रा पर निकले तो साथ में एक पैसा रख लिया। उन दिनों एक पैसे का भी बड़ा मह्त्त्व था। एक पैसे में सारे दिन का खर्च निकल आता था। एक भक्त ने पूछा- आप यह क्या कर रहे हैं। मात्र एक पैसे के साथ हज की यात्रा पर निकल रहे हैं और उन्हें अशर्फियों से भरी एक थैली राह खर्च हेतु दे दी।
बायजीद ने कहा- रख तो लूँगा पर पहले यह भरोसा दिला कि मैं एक दिन से अधिक तक अवश्य जियूँगा।
धनपति ने कहा- मैं कैसे आश्वासन दे सकता हूँ। कल का किसे भरोसा है।
तब बायजीद ने कहा- तो यह एक पैसा ही काफी है। जब कल का भरोसा ही नहीं तो इंतजाम क्या करना।
पास ही एक फकीर बैठा था। वह हँसते हुए भीड़ से उठ गया। बायजीद उसके पीछे दौड़े  और पूछा कि तुम क्यों हँसे।
फकीर ने कहा- यदि एक दिन का भरोसा है तो फिर कल के भरोसे में क्या कष्ट है। जब एक पैसा रख सकते हो तो फिर एक करोड़ भी। क्या अंतर पड़ता है। क्या आज का भरोसा है।
कहते हैं बायजीद ने वह पैसा वहीं गिरा दिया। यह भी कहा जाता है कि उसी पल से बाजयीद को  ज्ञान प्राप्त हुआ और वे आगे चलकर प्रसिद्ध सूफी संत कहलाए।
बात का सारांश सिर्फ इतना सा है कि खुद पर और जिसने धरती पर भेजा है उसका भरोसा रखो। भूख से मरने वाले की तुलना अधिक खाकर मरने वालों का प्रतिशत कई गुना अधिक है। लोभमोह,  लालचलालसा इनका कोई ओर या छोर नहीं होता। ये तो आदमी को एक बंधुआ मजदूर बनाकर ताउम्र अपना बंधक बनाकर रखती हैं।
इनसे मुक्ति के बाद ही जीवन में आगे का मार्ग सुलभ और सुगम हो सकता है।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर- 2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641,                                   Email-v.joshi415@gmail.com

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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