July 05, 2014

अनकही

शोर.. शोर.. सिर्फ शोर
                 - डॉ.रत्ना वर्मा


तेज ध्वनि जानलेवा भी हो सकती है इस ओर पहले किसी का ध्यान नहीं जाता था। लेकिन एक दुर्घटना के कारण 1943 में ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का ध्यान पहली बार इस तरफ गया- ककार्ड जैट विमान लंदन हवाई अड्डे पर उतरने के लिए पार्लियामेन्ट हाउस के ऊपर से गुजरा तो उसकी खिड़कियों के काँच चटख कर जमीन पर बिखर गये। सेंटपाल चर्च की खिड़कियों को काँच भी उसी दिन टूट कर बिखर गये। जाँच के बाद विशेषज्ञों ने दोनों स्थानों की खिड़कियों के काँच टूटने का कारण जैट की तीव्र ध्वनि को माना।
तेज ध्वनि के नुकसान की मैं स्वयं भुक्त भोगी हूँ - मेरा घर बिल्कुल सड़क के किनारे है, जहाँ क्या दिन और क्या रात गाडिय़ों का रेला लगा रहता है। दोमंजिला इस घर में नीचली मंजिल पर रहने पर तो गाडिय़ों की आवाज का ज्यादा असर नहीं होता पर ऊपर रहने पर गाडिय़ों का हार्न सीधे कान के पर्दे फाड़ देने वाला होता है, सो खिड़की दरवाजे सब बंद रखने पड़ते हैं- इससे तेज आवाज से तो थोड़ी राहत मिलती है साथ ही रायपुर की धूल से भी कुछ बचाव हो जाता है, ताजी हवा तो वैसे भी नहीं बची है। यह सब विस्तार से बताने का तात्पर्य यह है कि एक दिन कोई टोली तेज आवाज वाले बाजे बजाते हुए (लाउडस्पीकर के साथ) सड़क से लिकल रही थी, उस दिन हवा कुछ ठंडी थी सो छत का दरवाजा खुला था ताकि कुछ ताजी हवा घर के भीतर आ सके। लेकिन गाजे- बाजे की आवाज ने एक सेकेंड में ही मेरे कान को सुन्न कर दिया। मुझे लगा मेरे कानों में आवाज भर गई है और कान के पर्दे फट जाएँगे। दूसरे दिन मुझे डॉक्टर के पास जाना पड़ा। कई दिन तक दवाई खानी पड़ी। डॉक्टर की सलाह पर उस दिन के बाद से जब भी घर से बाहर निकलती हूँ कानों में रूई (कपास) डाल कर निकलती हूँ। कभी भूल जाती हूँ तो सड़क पर चलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अपने पर्स में कपास का एक टुकड़ा रखे रहती हूँ ताकि वक्त जरुरत काम आए।
आप सोच रहे होंगे यह क्या बात हुई यह तो आए दिन हम सबके साथ होता है- जी हाँ मैं इसीलिए तो यह सब कह रही हूँ कि यह सब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है और हमने इसे स्वीकार कर लिया है। मैं सबसे पूछना चाहती हूँ - क्यों?
यह बात तो आप सब जान लीजिए कि ध्वनि या आवाज का हमारे जीवन में बहुत ज्यादा महत्त्व है। आवाज के कारण ही हम मनुष्य एक दूसरे की भावनाओं को समझ सकते हैं, जान सकते हैं। लेकिन विज्ञान ने जहाँ आवाज के महत्त्व को जान लिया  है वहीं वह यह भी कहता है कि 60 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि हमारे कानों के लिए हानिकारक है। डॉक्टरों की मानें तो 70 से 80 डेसिबल के बीच रहने वाला व्यक्ति बहरेपन का शिकार हो जाता है, इतना ही नहीं यदि कोई गर्भवती महिला लगातार 120 डेसिबल ध्वनि के बीच लगातार चार माह तक रहे तो उसका शिशु बहरेपन का अभिशाप लेकर जन्म लेता है।
 वैज्ञानिकों के अनुसार ट्रेन, ट्रक, मोटर का हार्न और डिस्को संगीत 115 डेसिबल, सामान्य बातचीत और हल्के ट्रैफिक से 60 डेसिबल, चलती हुई इंजीनियरिंग वर्कशाप से 90 से 100 डेसिबल,  कारखानों से 110 डेसिबल तथा हैलीकाप्टर और हवाई जहाजों के इंजन से 140 डेसिबल तक की ध्वनि पैदा करते हैं। अब आप स्वयं ही अंदाजा लगा लीजिए कि आप कितने डेसिबल ध्वनि प्रदूषण वाले स्थान पर अपनी दिनचर्या का अधिकांश समय व्यतीत करते हैं?
इस तरह के अनेक तथ्यों को जानने के बाद भी हम लगातार बढ़ते जा रहे ध्वनि प्रदूषण के बीच रहने को बाध्य हैं। दुखद यह है कि पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त करने वाले हमारे मनीषी अन्य सभी प्रदूषण की बात तो गंभीरता से करते हैं, सबके लिए तेजी से आवाज भी उठाई जाती है परंतु ध्वनि प्रदूषण को लेकर अनेक अध्ययन और इसके दुष्परिणामों को जानने के बाद भी इस समस्या को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जितना कि लिया जाना चाहिए।
जिस तरह से प्रदूषित वायु में साँस लेने से, प्रदूषित जल पीने से अनेक हानियाँ हैं उसी प्रकार से हम सबको यह जान लेना होगा कि अधिक ध्वनि प्रदूषण भी जानलेवा हो सकता है। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में रहने वाले ही नहीं अब तो रायपुर जैसे शहरों में रहने वालों को भी यह जान लेना चाहिए कि वे 80 से 120 डेसिबल ध्वनि के बीच रहकर अपना जीवन गुजारते हैं।
पिछले माह का समाचार है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में मानकों के विपरीत हो रहे ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए वहाँ के ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को फटकार लगाकर आवश्यक कार्रवाई का निर्देश दिया है। लेकिन देखा यह गया है कि इस तरह की फटकार सिर्फ फटकार ही बनकर रह जाती है, उसपर अमल होते दिखाई नहीं देता। शासन प्रशासन की उदासीनता और जनता में जागरुकता का अभाव ही इस तरह की तकलीफों को बढ़ाता है। पानी जब सर से ऊपर चला जाता है, तब बहुत देर हो चुकी होती है। गत वर्ष उत्तराखंड में प्रकृति ने कूपित होकर जो तांडव दिखाया है उसे लोग एक दुर्घटना मानकर भूलते जा रहे हैं, पर प्रकृति तो अपना रुप दिखाएगी। केदारनाथ की तबाही तो शुरुआत। हमने प्रकृति के विपरीत जा कर अपनी धरती के साथ जो अन्याय किया है उसका बदला प्रकृति ने लेना शुरू कर दिया है। समय आ गया है कि हम चेत जाएँ। तरक्की की आड़ में कहीं इतना आगे न बढ़ जाएँ कि फिर लौटना मुश्किल हो।
बात ध्वनि प्रदूषण की हो रही थी- कहना यही है कि शासन प्रशासन को सचेत करने के लिए तो आवाज उठाएँ ही ताकि वह शोर प्रदूषण पर नियंत्रण रख पाए। पर साथ ही जरूरी है  कि हम स्वयं भी सुधर जाएँ। टे्फिक सिग्नल पर खड़े हैं- लाल से हरी बत्ती हुई नहीं कि पीछे वाली गाडिय़ाँ लगातार हार्न बजाना शुरु कर देती हैं , क्यों भई गाडिय़ाँ रुकी हुई थीं तो आगे बढऩे में समय तो लगेगा ही ना, तो थोड़ा सब्र तो रखिए। मोटर गाडिय़ाँ हमारे जीवन का हिस्सा हैं अत: गाडिय़ों से होने वाले शोर प्रदूषण में बेवजह हार्न बजाने को रोका जाना बेहद जरूरी है। दूसरे देशों में आपको हार्न की आवाज सुनाई नहीं देगी वहाँ तो कोई हार्न तब बजाता है। जब कोई ग्रीन सिगनल होने पर भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ाता। हमें अच्छाईयों का तो अनुसरण करना ही चाहिए।
हमारे देश में शादियाँ तो बगैर बैंड- बाजा- बराती के पूरी नहीं होती,  देश जितनी तरक्की कर रहा है, शादियों पर उतनी ही तेजी से शोर- शराबा और आतिशबाजी होने लगी है। पारिवारिक खुशी है उसे सड़क पर उतार कर तमाशा करने की क्या जरुरत है। घर में पूजा है, सत्यनारायण की कथा करवा रहे हैं, पर पंडित जी कथा बाचेंगे तो पूरे मोहल्ले को सुनाएँगे, उसके बगैर कैसे पता चलेगा कि अमुक घर के लोग धर्म परायण लोग हैं। भले ही परीक्षाओं का मौसम हो आस-पास पढऩे वाले बच्चे हों किसी को कोई मतलब नहीं होता कि लाउडस्पीकर की आवाज से उन बच्चों की पढ़ाई में विघ्न हो रहा होगा। शादी हो तो पटाखे, बच्चा पैदा हो तो पटाखे, नेता जी चुनाव जीत गए है तो पटाखे, शहर आ रहे हैं तो स्वागत में पटाखे, मतलब चारो तरफ शोर ही शोर....
आइए विचार करें, बढ़ते शोर को कम करें,


कुछ देर मौन रह कर, मन को शीतल करें।                              

1 Comment:

कौशलेन्द्र said...

पहली बार ध्वनि का भौतिक प्रभाव तब देखा जब मैं बहुत छोटा था। दीपावली का दिन था, मैंने गौर किया तेज़ आवाज़ वाला पटाखे की ध्वनि के साथ ही मुंडेर के सारे दीपक बुझ गये । दीपक फिर से जलाये गये ...पटाखा एक बार फिर जलाया गया ...दीपक एक बार फिर बुझ गये । अब यह प्रमाणित हो चुका था कि दीपक बुझने का कारण पटाखों की ध्वनितरंगों से उत्पन्न हवा पर अनायास बना दबाव है । पिछले वर्ष दशहरे में रात 8 बजे सड़क से गुज़र रहा था । सड़क से एक बहुत ही धीमी गति वाला जुलूस गुज़र रहा था, एक वाहन पर बड़े-बड़े साउण्ड बॉक़्स रखे थे और वाद्ययंत्रों की भयानक ध्वनि हो रही थी । जब मैं पास से गुज़रा तो लगा कि हर बीट चेस्ट से होती हुयी सीधे हृदय के पैसमेकर को प्रभावित कर रही है । वह स्थिति नाकाबिले बर्दाश्त थी ...मुझे वापस लौट जाना पड़ा ।
तीव्र ध्वनि का सीधा प्रभाव मस्तिष्क और हृदय पर होता है । इसके दुष्प्रभावों में माइग्रेन, बहरापन, एपीलेप्सी(मिरगी), स्मृतिनाश एवं हृदयरोग तक हो सकते हैं ।

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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