February 02, 2014

प्रेरक

मछली पकडऩे की कला
लाओ-त्ज़ु ने एक बार मछली पकडऩा सीखने का निश्चय किया। उसने मछली पकडऩे की एक छड़ी बनाई, उसमें डोरी और हुक लगाया। फिर वह उसमें चारा बाँधकर नदी किनारे मछली पकडऩे के लिए बैठ गया। कुछ समय बाद एक बड़ी मछली हुक में फँस गई। लाओ-त्ज़ु इतने उत्साह में था कि उसने छड़ी को पूरी ताक़त लगाकर खींचा। मछली ने भी भागने के लिए पूरी ताक़त लगाई। फलत: छड़ी टूट गई और मछली भाग गई।
लाओ-त्ज़ु ने दूसरी छड़ी बनाई और दोबारा मछली पकडऩे के लिए नदी किनारे गया। कुछ समय बाद एक दूसरी बड़ी मछली हुक में फँस गई। लाओ-त्ज़ु ने इस बार इतनी धीरे-धीरे छड़ी खींची कि वह मछली लाओ-त्ज़ु के हाथ से छड़ी छुड़ाकर भाग गई।
लाओ-त्ज़ु ने तीसरी बार छड़ी बनाई और नदी किनारे आ गया। तीसरी मछली ने चारे में मुँह मारा। इस बार लाओ-त्ज़ु ने उतनी ही ताक़त से छड़ी को ऊपर खींचा जितनी ताक़त से मछली छड़ी को नीचे खींच रही थी। इस बार न छड़ी टूटी न मछली हाथ से गई। मछली जब छड़ी को खींचते-खींचते थक गई तब लाओ-त्ज़ु ने आसानी से उसे पानी के बाहर खींच लिया। उस दिन शाम को लाओ-त्ज़ु ने अपने शिष्यों से कहा- आज मैंने संसार के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत का पता लगा लिया है। यह समान बलप्रयोग करने का सिद्धांत है। जब यह संसार तुम्हें किसी ओर खींच रहा हो तब तुम समान बलप्रयोग करते हुए दूसरी ओर जाओ। यदि तुम प्रचंड बल का प्रयोग करोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे, और यदि तुम क्षीण बल का प्रयोग करोगे तो यह संसार तुमको नष्ट कर देगा। (हिन्दी ज़ेन से)

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