March 10, 2013

पुस्तकें




एक पाती सूरज के नाम-          अनसुलझे प्रश्नों की कथा
- निरूपमा कपूर
एक याद अतीत की
चलती है मेरे साथ-साथ
अस्तित्व मेरा / अपना है या पराया
हम दोनों में है कितना अंतर
मुझे पहचान पाना और मिलना
बड़ी दूर की बात है।
साहित्य की कई विधाओं या यूँ कहें कि साहित्य या जीवन के हर पक्ष को किसी दूसरे के सामने रखने के लिए ईमानदारी की आवश्यकता होती है। यह बात आत्मकथा के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। आत्मकथा के लिए बुनियादी आवश्यकता है -ईमानदारी। इसकी पुष्टि तभी होती है, जब व्यक्ति किसी बात के लिए दूसरों के साथ-साथ अपनी और अपनों की भी आलोचना करता है।
डॉ सुधा गुप्ता की ‘एक पाती सूरज के नाम’  भारतीय स्त्री की पारंपरिक छवि को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने की कथा है। परम्पराओं के नाम पर अपनी इच्छाओं को दबाते रहना भारतीय स्त्रियों की मजबूरी है। अपने पिता के घर में जो कल तक लाड़ली थी पति के घर में कोने में पड़ी तुच्छ वस्तु के समान थी। ज्यादातर तो औरतों का हाल यह है कि शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आर्थिक, आत्मनिर्भरता के बावजूद वे एक बार अगर अंधे कुँए में गिर पड़ी तो बस गिर पड़ी... जिंदगी के आखिरी लम्हे तक उस अकेले भयावह अँधेरे में पड़े रहना ही उनकी नियति है... विवाह के पश्चात पति यदि समझदार व कर्तव्यनिष्ठ हो तो समस्याएँ थोड़ी कम हो जाती हैं परन्तु भारतीय पुरुष अपनी पत्नियों के मामले में कम संवेदनशील होते हैं ; वैसे अब तस्वीर बदल रही है। परन्तु अपनी कमियों के प्रति आँखें मूँदे रहना और स्त्रियों की प्रकृतिवश किसी कमी को माफ न करना भारतीय जनमानस में अंदर तक व्याप्त है। लेखिका के काले रंग के लिए उनके पति के व्यंग्य निश्रित बाण उनकी नकारात्मक सोच दर्शाने के लिए काफी थे। अरे, अरे दीवार से हट कर खड़ी होओ... कहीं काली न हो जाए। पता है पूरे पाँच हजार लगे हैं घर की पुताई -रंगाई में। पति के मिसरी घुले शब्द विवाह के दूसरे दिन ही यदि पत्नी को सुनने को मिले तो वह अपने आगामी जीवन के स्वप्नों को तो काला होते  देख ही सकती है। पति के लिए तो उनका काला रंग ऊपर से विद्याध्ययन की ललक एक तो करेला  ऊपर  से नीम चढ़ा।
 शोध कार्य के उपरान्त परिवार की जीविका चलाने के लिए सुधा जी ने कई महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इस दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव उन्होंने अपने तीनों पुत्रों के साथ सहे ; जिसमें अपने पति की अकर्मण्यता व अजीब विचारों से ग्रसित होने के कारण सुधाजी व उनमें (बलवीर जी के रिश्ते में) एक अजीब सी दूरी व डर बैठ गए थे। अनमेल विवाह का दंश लेखिका को कई स्तरों पर आजीवन चुभता रहा। 
 पहले अस्थायी व्याख्याता और फिर स्थायी नौकरी के पश्चात भी लेखिका अपने उस वैवाहिक मकडज़ाल से बाहर नहीं निकल पाई; जिसे हम संस्कारों में जकड़ी भारतीय स्त्री की आजीवन कैद भी कह सकते हैं  ; जहाँ हर सम्बन्ध इस रिश्ते की कठिनाइयों को जानते व समझते हुए भी दोनों पक्षों के सामने इससे बाहर आने का विकल्प को नहीं देखता।
लेखिका को अपने प्रति कर्कश व्यवहार, बच्चों के प्रति गैर जिम्मेदराना व्यवहार ही पूरे जीवन मिला था। पति की मृत्यु के बाद वह उनके द्वारा किये गये शोषण की भी इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि उसके बिना रहने की कल्पना भी डराती रहती थी। वाह री भारतीय नारी शोषण से भी प्यार करने लगती है। सुधा जी की आत्मकथा की यह एक बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने ईमानदारी से सच को अभिव्यक्त करके अपनी कथा के माध्यम से शिक्षित व आर्थिक रूप से सुदृढ़ स्त्रियों की कथा को फलक पर ला दिया है; जिसे हम सब यह कह कर खारिज करते थे कि  शिक्षित स्त्रियों के शोषण की समस्या समाज में न के बराबर है।
 यह आत्मकथा हमारी संवेदना को झंझोरते हुए प्रश्न उठाती है कि आखिर कब तक रिश्तों के बोझ तले दब कर बहुमूल्य जि़न्दगियाँ बेरौनक होती रहेगी।
पुस्तक: एक पाती सूरज के (आत्मकथा)
लेखक: डॉ. सुधा गुप्ता, पृष्ठ- 580,
मूल्यः 800 रुपये,  संस्करण 2012,
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली
नई दिल्ली-110030
संपर्क: 18, कैला देवी इन्क्लेव, देवरी रोड, बुन्दूकटरा, आगरा (उप्र),मो. 9319163600

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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