September 27, 2012

कान्हा के बाघों की नागार्जुन सागर यात्रा

कान्हा के बाघों की नागार्जुन सागर यात्रा

- संदीप पौराणिक
उत्तर भारत के लोगों का दक्षिण भारतीय लोगों से सदियों पुराना संबंध रहा है। व्यापार के सिलसिले में उत्तर भारतीय जन सुदूर दक्षिण में श्रीलंका तक यात्रा करते थे, लेकिन ये यात्राएं बड़ी रोमांचक, खतरनाक और डरावनी हुआ करती थीं। इन यात्राओं और व्यापार का प्रमुख मकसद नमक और दक्षिण भारतीय मसाले थे, जिनकी उत्तर भारत सहित पूरे भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारी मांग थी, लेकिन व्यापार सिर्फ जमीन के रास्ते ही जंगलों में पगडंडियों के सहारे ही किया जा सकता था। भगवान श्रीराम ने भी उत्तर भारत से श्रीलंका तक की यात्रा भी इसी रास्ते से की थी। ये रास्ते वास्तव में जंगली जानवरों द्वारा बनाए गए प्राकृतिक गलियारे ही हैं। आज भी जंगली हाथी, भैंस, गौर, बाघों का जंगल के जिन रास्तों से आना-जाना होता है वह रास्ता एक प्राकृतिक गलियारे के रूप में इस्तेमाल होना शुरू हो जाता है।
 हाल ही में हुए एक जेनेटिक अध्ययन ने वन्य जीव वैज्ञानिकों को चौंका दिया है कि कान्हा नेशनल पार्क के बाघ न केवल बांधवगढ़, अचानकमार, उदंती बल्कि इंद्रावती नेशनल पार्क और सूदूर दक्षिण में नागार्जुन सागर राष्ट्रीय उद्यान तक की यात्रा करते हैं। एक अन्य जेनेटिक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि भारत की सर्वाधिक शुद्ध प्रजाति के जंगली भैंसे (राज्य पशु) जो कि उदंती अभ्यारण्य में पाए जाते हैं (जिनकी संख्या सात रह गई है) और इन्द्रावती नेशनल  पार्क के जंगली भैंसे (जिनकी संख्या 30-35 हैं) एक ही जेनेटिक पूल के हैं। ऐसी स्थिति में अब दोनों प्रजातियों बाघ और जंगली भैंस को बचाने के लिए जीव वैज्ञानिक और वन्य प्राणी विशेषज्ञ एक रणनीति तैयार कर रहे हैं।
कान्हा नेशनल पार्क लगभग 2000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है लेकिन बाघों की एक बड़ी आबादी पार्क के बाहर भी पाई जाती है। बाघों का सुदूर नागार्जुन सागर तक पहुंचने का जो रास्ता या कहें प्राकृतिक गलियारा है वह छत्तीसगढ़ राज्य से ही होकर गुजरता है। छत्तीसगढ़ राज्य के चिल्फी, रेंगाखार, बोड़ला और भोरमदेव तथा अन्य छोटे-छोटे स्थान जो कि कान्हा नेशनल पार्क से लगे हुए हैं, इन क्षेत्रों को बाघ अपने प्राकृतिक आवास के लिए उपयोग करता है। चूंकि यह कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बाहर का क्षेत्र है अत: यहां पर बाघों पर वैसी नजर नहीं रखी जाती जैसी कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में रखी जाती है।
हाल ही में हुए एक जेनेटिक अध्ययन ने वन्य जीव वैज्ञानिकों को चौंका दिया है कि कान्हा नेशनल पार्क के बाघ न केवल बांधवगढ़, अचानकमार, उदंती बल्कि इंद्रावती नेशनल पार्क और सुदूर दक्षिण में नागार्जुन सागर राष्ट्रीय उद्यान तक की यात्रा करते हैं।
विगत एक वर्ष के भीतर दो बाघों का शिकार इस क्षेत्र में हुआ है। उसके बाद भी बाघों का इस क्षेत्र में आना एक बहुत अच्छी खबर है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण इस क्षेत्र को प्रोजेक्ट टाइगर के तहत रखना चाहता है। मेरी व्यक्तिगत रूप से इस संबंध में प्रोजेक्ट टाइगर एवं एनटीसीए के अधिकारियों और पर्यावरण एवं वनमंत्री से बात हुई है। यदि यह क्षेत्र जहां कि छत्तीसगढ़ प्रदेश का भोरमदेव अभ्यारण्य पहले से ही हैं, प्रोजेक्ट टाइगर बनता है तो छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए यह एक वरदान ही होगा, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में कान्हा नेशनल पार्क में लगभग जाने वाले सारे जानवर मौजूद हैं। अत: यह प्रस्तावित प्रोजेक्ट टाइगर का एरिया कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की तरह ही दिखेगा और देश-विदेश के पर्यटक इस प्रोजेक्ट टाइगर को देख सकेंगे। अब गेंद छत्तीसगढ़ शासन के वन विभाग के पाले में हैं। यदि हमारा रवैया सकारात्मक रहता है तथा प्रदेश के उच्च वनाधिकारी जल्दी प्रयास शुरू करते हैं तो छत्तीसगढ़ को एक और सौगात मिल सकती है।
हैदराबाद स्थित जेनेटिक सेंटर ने एक अन्य चौंकाने वाली बात यह कही है कि उदंती और बस्तर के जंगली भैंसों के जीन्स एक ही हैं। ऐसी स्थिति में हम हमारे राज्य पशु जंगली भैसा जिसकी तादाद उदंती में सिर्फ सात ही बची हैं जिनमें 6 नर और एक मादा है। मादा आशा ने विगत तीन बार नर पाड़े को ही जन्म दिया है। ऐसी स्थिति में इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान से अन्य मादा भैंसों को लाया जा सकता है। चूंकि इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान घोर नक्सल प्रभावित हैं किंतु प्रदेश में अभी तक नक्सलवादियों द्वारा जंगली जानवरों के संरक्षण हेतु क्रियान्वित की जा रही योजनाओं को रोका नहीं गया है तथा  इन्द्र्रावती में प्रोजेक्ट टाइगर सफलतापूर्वक चल रहा है। अत: यह खबर भी छत्तीसगढिय़ा लोगों को राहत देने वाली है कि वन भैंसे की वंशवृद्धि के लिए कृत्रिम गर्भाधान के अतिरिक्त एक और विकल्प उपलब्ध है।
संपर्क- एफ -11 शांति नगर, सिंचाई कालोनी, रायपुर
        मोबाइल-09329116267

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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