September 27, 2012

रियो-डी-जिनेरियो


रियो-डी-जिनेरियो, ब्राजील में 18-22 जून 2012 में हुए सतत् (टिकाऊ) विकास पर संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक सम्मेलन में श्री चंद्रशेखर साहू (मंत्री- कृषि, पशुधन विकास, मत्स्यपालन एवं श्रम विभाग छत्तीसगढ़ शासन) ने भी भाग लिया। इस अवसर पर सम्मेलन में पढ़ा गया उनका वक्तव्य तथा सम्मेलन से लौटने के बाद उनके द्वारा लिखा गया समग्र दृष्टिकोण पत्र उदंती में प्रकाशित कर रहे हैं। 

संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक सम्मेलन


प्रिय मित्रों,
आप सब गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के देश की ओर से अभिवादन स्वीकार करें। इस विशेष चर्चा-गोष्ठी में भाग लेते हुए हम बहुत उत्साहित हैं जो कि खासतौर पर इस चराचर के नैसर्गिक स्वास्थ्य के सरंक्षण एवं इस नए विश्व के परिस्थिति समस्याओं के निराकरण के लिए किया गया है। इस चर्चा- गोष्ठी में मैं महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए उसे पथ-प्रदर्शक सिद्धांत के रूप में रखना चाहता हंू -
सभी व्यक्तियों की जरूरत के लिए इस धरती में संभावनाएं हमेशा रहती हैं, लेकिन लोभ के लिए संभावनाएं कभी नहीं रहती, अर्थात् पूरी दुनिया भी इसके लिए कम है। (There is always enough for everyone’s need. Never it is enough for any ones Greed)
मित्रों, आज हम सब जिस दुनिया में रहते हैं वहां जिंदगी और उसे जीना कुल मिलाकर एक अद्भुत अकल्पनीय परिस्थितियों के बीच हो रहा है, ऐसा पहले नहीं हुआ था। यह समाज और व्यक्ति विशेष के लिए मूलभूत चुनौतियों के सामने उपस्थित होने जैसा है। पूरे वातावरण की परिस्थितियां बदल रही है, आर्थिक समस्याएं बढ़ रही हैं, प्राकृतिक संसाधन में कमी आ रही है। तुलनात्मक रूप से जनसंख्या और गरीबी में बढ़ोत्तरी हो रही है, जमीन की उत्पादकता लाक्षिक रूप से घट रही है जो कि विकास के मूलभूत अवधारणा को चिंतित कर रही है। ये तमाम बातें न्यूयार्क से लेकर नई दिल्ली और रियो से लेकर भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के राजधानी रायपुर तक समान रूप से महसूस की जा सकती है, मैं जहां से आया हंू। इस विपरीतताओं के बीच भी एक बात बहुत अच्छी बात है कि इस पृथ्वी पर हम सभी एक सहभागिता वाले भविष्य की चिंता में लगे हैं, न कि अलग-अलग द्वीप समूहों में अपना अस्तित्व तलाश रहे हैं।
हमारे पूर्वजों ने सदियों तक चलने वाली एक ऐसी पुरानी व्यवस्था को जन्म दिया था जो कि रोजगार के संसाधन भी पैदा करती थी और एक हरित अर्थव्यवस्था को भी पनपाती थी। हमें उस पुरानी व्यवस्था की ओर मुड़कर देखना होगा जो हमारे नींव में उपस्थित है। छत्तीसगढ़ राज्य में इस प्रकार के अनेकों उदाहरण जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन के रूप में उपलब्ध है, जहां एक छोटे से गांव में लगभग 360 से अधिक छोटी जल संग्रहण एवं रिसाव तालाब का श्रृंखलाबद्ध पद्धति से खेतों की जल आवश्यकता का सदियों से पूर्ति की जा रही है। परन्तु इन समाजों को आधुनिक विकास के अवधारणा प्रतिव्यक्ति खपत एवं उससे संबंधित व्यवहार की दृष्टि से उच्च श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। वास्तव में विकास की सूचक प्रतिव्यक्ति खपत माडल में विकसित हो रही वैश्विक हरित आर्थिकी की दृष्टि से गंभीरता से पुर्नविचार की आवश्यकता है।
प्रतिव्यक्ति खपत मात्र यह दर्शाता है कि किसी समुदाय के संरक्षण हेतु बाहरी मदद की आवश्यकता कितनी है। यह सीधे तौर पर वैश्विक सतत विकास के लिये आवश्यक वास्तविक प्रतिव्यक्ति मदद को नहीं दर्शाती है। किसी भी देशी समुदाय के सतत विकास को प्रगामी उपयोगिता सूचकांक के आधार पर परिभाषित किया जाता है। उपरोक्त जीवन पद्धति में कोई एक वस्तु को अनेकों बार एवं अनेकों माडलों में तथा एक वस्तु को अनेकों कार्यों हेतु उत्तरोत्तर उपयोग किया जाता है। यह उत्पाद का खपत में कमी के साथ ही साथ बिना अतिरिक्त ऊर्जा के उसे पुर्नचक्रीकरण द्वारा उपयोग किया जा सकता है। आज स्थिति यह है कि हमें ऐसी जीवन पद्धति को विकसित करना होगा जहां पर एक उपयोगी वस्तु या तरीके को बहुआयामी बना सके जो विविध प्रयोजनों को न केवल पूरा करे, बल्कि उग्रसारित भी करें।
गौतम बुद्ध की एक कहानी को इस संदर्भ में हम पथ-प्रदर्थक कथा के रूप में देख सकते हैं। गौतम बुद्ध वर्ष में एक बार चतुर्मास के समय अपने शिष्यों को उत्तरीय (वस्त्र) प्रदान करते थे। एक शिष्य को वस्त्र देने के पूर्व उन्होंने पूछा- पिछले समय में जो वस्त्र तुमने प्राप्त किया था, उसका क्या उपयोग किया? शिष्य ने विनम्रता के साथ कहा- मैंने उस वस्त्र को शरीर को ढाकने अर्थात् पहनने का काम लिया। महान बुद्ध ने पूछा और उसके बाद। शिष्य ने जवाब दिया महोदय फिर मैं उस कपड़े से बाती बनाया और उससे घर को प्रकाशित किया। बुद्ध मुस्कुराये और कहा कि अब तुम एक नये वस्त्र पाने के योग्य हो मेरे
प्रिय शिष्य।
यह एक छोटी कथा है साथ ही यह एक टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर इशारा करता है, कि मनुष्य जिन चीजों का उपयोग के पश्चात परित्याग करता है, उन्हीं से पुन: मनुष्य उपयोगी चीजें बनाई जा सकती है। जीवन के विभिन्न आयामों में हम मुख्यधारा के विकास और उसके असंख्य तथाकथित शताब्दी लक्ष्य को पाने के लिए भी हमें पुनर्विचार करना चाहिए। उपरोक्त संदर्भ में हम विकास की अवधारणा में छह सूत्रों को याद कर सकते हैं- जैसे जल, जंगल, जमीन, जलवायु, जन (लोग) और जंतु। विकास के पहियों को गतिमान रखने के लिए ऊर्जा एक केन्द्रीय कारक है। इस ऊर्जा को संतुलित प्राकृतिक व्यवस्था से प्राप्त करने पर यह और अधिक प्रभावी हो सकता है। ऊर्जा के पुनरोपयोग की पद्धति प्रत्येक देश को एक नई दिशा दे सकती है। जिसके चलते प्रदूषण मुक्त विश्व और रोजगार के संसाधन भी पैदा किए जा सकते हैं। अंततोगत्वा इस दिशा में वैश्विक सहमति पत्र तैयार किया जाए।
हमारे देश के प्रसिद्ध कथन का यहां उल्लेख करना उचित समझता हूं -
भूमि स्वर्गताम् यातु: मनुष्यो यातु देवताम।
धर्मो सफलम् यातु: नित्यं यातु शुभोदय।।'जिसका अर्थ है कि इस पृथ्वी को स्वर्ग बनने दो, मनुष्य को ईश्वर बनने दो, धर्म को उनकी सफलता में पहुंचाने दो और दिव्यता को पल-पल में पसरने दो।
    जय भारत। जय छत्तीसगढ़।।

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