April 21, 2012

मिशन

किताबों को अपनी बेटी  की तरह 

विदा करने का सुख

                                                                                  -  सूरज प्रकाश
विश्वास कर रहा हूं जिनके घर में भी ये किताबें पहुंचीं हैं, वे मेरी इस बात का मान रखेंगे और किताबों को नये पाठकों तक पहुंचाने के मिशन में सार्थक भूमिका निभायेंगे।
पिछले दिनों मैंने अपनी सारी किताबें विदा कर दीं। फेसबुक के जरिये। अनजान मित्रों को, दूरदराज के गांवों के पुस्तकालयों को। जिसने भी मांगीं, दे दीं। कुछ किताबें जरूरतमंद स्थानीय स्कूलों के स्टाफ सदस्य खुद ले गये। फेसबुक पर संदेश पढ़ कर कुछ मित्र आये और अपनी पसंद की किताबें चुन कर ले गये। अजब समां था। 24 और 25 दिसम्बर को अपने घर में किताबें सजाये मैं बैठा राह देख रहा था पुस्तक प्रेमियों की, कि वे आयें और विदा करके ले जायें मेरी बेटियों जैसी किताबों को।
दूरदराज के शहरों और गांवों की लम्बी यात्रा पर जाने वाली किताबों को तरतीब से लगाने, पैकेट बनवाने और रवाना करने में एक- दो दिन और लग गये। ये सोच कर बहुत सुख मिला कि हमारी सभी बेटियों को अच्छे, पढे़ लिखे घर- बार मिले। कुछ किताबें साहित्यकारों के घर गयी हैं तो कुछ नवोदित लेखकों और ब्लागरों के घर। अलग- अलग स्कूलों में बच्चों के संग- साथ रहने के लिए और गांवों में युवकों को अपना संदेश देने सबसे ज्यादा किताबें गयी हैं। कुछ एनजीओ दूर दराज के इलाकों में गरीब, जरूरतमंद और पढ़ाकू बच्चों के लिए पुस्तकालय और वाचनालय चलाते हैं। वे इन किताबों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। पाकर फूले नहीं समाये।
इतना जरूर किया है मैंने कि हर किताब पर एक मोहर लगायी है कि उसे पढऩे के बाद किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दिया जाये। विश्वास कर रहा हूं जिनके घर में भी ये किताबें पहुंचीं हैं, वे मेरी इस बात का मान रखेंगे और किताबों को नये पाठकों तक पहुंचाने के मिशन में सार्थक भूमिका निभायेंगे।
लेकिन इस बीच मेरे सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है। छतरपुर और मऊनाथ भंजन के जिन गांवों में मेरी भेजी किताबें पहुंची हैं, उन्होंने अतिरिक्त उत्साह में इस आशय की खबर स्थानीय अखबारों और इंटरनेट अखबारों में छपवा दी है। बाकी कसर उन पुस्तक प्रेमियों ने पूरी कर दी है जो मेरे घर आकर किताबें ले गये थे। सबने मिल कर मेरे इस मामूली- से काम को इतना अधिक प्रचारित कर दिया है कि लोग- बाग कहीं से भी मेरा नाम और फोन नम्बर खोज कर गुहार लगा रहे हैं कि अपने खजाने में से कुछ किताबें उन्हें भी दे दूं। कम से कम 15 पुस्तकालयों और इतने ही पुस्तक प्रेमियों के संदेश आ चुके हैं। मेरी समस्या ये है कि अब मेरे पास मुश्किल से हिंदी और अंग्रेजी की तीन- चार सौ किताबें ही बची हैं। अब किसे दूं और किसे इनकार करूं।
सच कहूं तो आसान नहीं होता इस तरह से अपनी पूरी जिंदगी में मेहनत से जुटायी गयी किताबों के खजाने को मुफ्त में लुटा देना। मैंने ये 4000 किताबें पिछले चालीस बरस के दौरान लाखों रुपये खर्च करके कहां- कहां से जुटायी होंगी, मैं ही जानता हूं। कितनी तो दुर्लभ किताबें थीं इनमें। 1969 में चार रुपये पचास पैसे में खरीदी गयी मेरी पहली किताब 'गीतांजलि' से लेकर पिछले ही महीने खरीदी गयी गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की आत्मकथा 'लिविंग टू टैल द टेल' तक हर किताब जुटाने के पीछे अलग ही कहानी रही होगी।
लेकिन सच कहूं तो मुझे ये काम करने के लिए दो बातों ने प्रेरित किया। पहली बात तो मैं ये मान कर चल रहा था कि इन किताबों ने मेरे पास होने का अपना मकसद पूरा कर लिया था। ये मकसद था, उन्हें पढ़ लिया जाना। दोबारा कितनी किताबें पढ़ी जायेंगी, मैं जानता हूं। इनमें से भी तो कई बिन पढ़े ही चली गयी हैं, ये भी मैं जानता हूं। अब अगर इन किताबों को नये पाठक मिलें, ये उनके बीच ज्ञान का प्रसार करें तो मेरे लिए इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता था। अब मैं भी कुछ नयी किताबें खरीद पाऊंगा।
दूसरी बात सुख से ज्यादा दुख देने वाली है। हम सब जानते हैं कि किताबें कितनी भी कीमती क्यों न हों, उनकी आखिरी मंजिल रद्दी की दुकान होती है। वहां तक पहुंचने में पुरानी किताबों को देर नहीं लगती। मैंने खुद नामचीन लेखकों को भेंट में मिली किताबें सेंत-मेंत में फुटपाथ पर लगी दुकानों से खरीदी हैं। इससे पहले कि मेरी किताबों का भी यही हश्र होता, मैंने उन्हें सम्मानपूर्वक विदा कर दिया है। बेशक इस पूरी प्रक्रिया में मुझे बहुत खट्टे- मीठे अनुभव भी हुए हैं।
ये पहले ही तय हो गया था कि जो भी पाठक या पुस्तकालय पुस्तकें मंगवायेगा, कम से कम कूरियर खर्च वही अदा करेगा। मैंने कूरियर, पैकिंग और हैंडलिंग पर अच्छी खासी राशि खर्च की थी। फेसबुक के कई चेहरे ऐसे हैं जिन्होंने कूरियर का खर्च तीन महीने बीत जाने के बाद भी अब तक नहीं भेजा है। और तो और मुझे ही दोषी मान कर बात करना ही बंद कर दिया है कि मैंने आखिर कूरियर के पैसे मांगने की जुर्रत ही क्यों की। बेशक हर किताब पर मैंने ये मुहर भी लगायी थी कि इन्हें पढ़ कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें ताकि किताबों को नये पाठक मिलने का सिलसिला एक मिशन की तरह चलता रहे और दूसरे पुस्तक संग्रहकर्ता भी इससे प्रेरित हों। कुछेक मित्रों ने तो साफ मना ही कर दिया है कि अब हम ये पुस्तकें किसी और को नहीं देंगे।
खैर ये मामूली बातें थीं और होती ही रहती हैं। इससे मेरे इस विश्वास पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि हर किताब को एक से ज्यादा पाठक मिलने ही चाहिये। जब भी संभव होगा, मेरी किताबें दूसरे पाठकों की तलाश में घर से बाहर निकलती ही रहेंगी।
आखिर किसी ने सच ही तो कहा है कि किताबें पढऩे के लिए बेशक हमें कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन किताबें न पढऩे की कहीं ज्यादा बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हम देखें कि कितने हैं हमारे आसपास जो किताबें नहीं जुटा पाते और ऐसे भी कितने हैं जिनके पास किताबें हैं लेकिन पढ़ नहीं पाते।
किताबों के बारे में मेरे और अनुभव मेरी वेबसाइट www.surajprakash.com पर लगे मेरे एक लेख- अच्छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होती में पढ़े जा सकते हैं।
संपर्क:   एच 1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्म सिटी रोड,  मालाड पूर्व मुंबई मो. 9930991424 
         mail@surajprakash.com

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