March 23, 2012

भारत में भाड़े की कोख का व्यापार

- प्रीति और वृंदा

इस फलते- फूलते बाजार में क्लीनिक्स और अन्य हिस्सेदार तो भारी मुनाफा कमा रहे हैं, मगर औरत के शरीर और शारीरिक श्रम के बढ़ते व्यापारीकरण के साथ कई नैतिक सरोकार जुड़े हुए हैं। इनमें सरोगेट औरत का स्वास्थ्य व उसके अधिकारों और ऐसी प्रक्रिया से जन्मे बच्चों के अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।
कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई दम्पति किसी चिकित्सकीय वजह से संतानोत्पत्ति नहीं कर पाते। जैसे हो सकता है कि मां बनने की इच्छुक महिला के शरीर में किसी वजह से भ्रूण ठहरता न हो। ऐसी स्थिति में उनके पास यह विकल्प रहता है कि वे शरीर से बाहर निषेचन के जरिए निर्मित भ्रूण को किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय में विकसित होने दें, और उससे उत्पन्न संतान को अपनाएं। इस प्रक्रिया को सरोगेसी कहते हैं। जो स्त्री अपनी कोख इस कार्य के लिए उपलब्ध करवाती है उसे सरोगेट कहते हैं।
एक ओर तो देश में भाड़े की कोख (सरोगेसी) का व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है, वहीं इसका नियमन, या यों कहें कि नियमन का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है। हाल ही में एक राष्ट्रीय दैनिक ने अनुमान व्यक्त किया था कि सरोगेसी का व्यापार लगभग 200 करोड़ रुपए का है।
इस फलते- फूलते बाजार में क्लीनिक्स और अन्य हिस्सेदार तो भारी मुनाफा कमा रहे हैं, मगर औरत के शरीर और शारीरिक श्रम के बढ़ते व्यापारीकरण के साथ कई नैतिक सरोकार जुड़े हुए हैं। इनमें सरोगेट औरत का स्वास्थ्य व उसके अधिकारों और ऐसी प्रक्रिया से जन्में बच्चों के अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।
इस परिस्थिति में एक समग्र कानूनी ढांचे की जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे ढांचे की जरूरत उन मामलों में खासतौर से उभरती है जहां अंतर्राष्ट्रीय सरोगेसी व्यवस्था के जरिए पैदा हुए बच्चों की नागरिकता को लेकर खींचतान होती है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा मददशुदा प्रजनन टेक्नॉलॉजी (नियमन) विधेयक व नियम- 2000 के प्रस्तावित मसौदे में एक बड़ा अनुच्छेद सरोगेसी सम्बंधी व्यवस्थाओं से सम्बंधित है। हालांकि यह एक स्वागत योग्य कदम है मगर इसमें कई खामियां हैं। जैसे सरोगेट स्त्री और बच्चों की सुरक्षा को इसमें पर्याप्त स्थान नहीं मिला है।
सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू सरोगेट स्त्री को भुगतान के संदर्भ में है। प्रावधान कुछ ऐसा है कि यह उस स्त्री की बजाय इच्छुक अभिभावकों के हितों की रक्षा करता है। वर्तमान मसौदे के मुताबिक, सरोगेट स्त्री को भुगतान पांच किश्तों में किया जाएगा जबकि 2008 में तैयार किए गए मसौदे में भुगतान तीन किश्तों में करने का प्रावधान था। वर्तमान मसौदे के अनुसार, भुगतान का बड़ा हिस्सा (75 प्रतिशत) पांचवी यानी अंतिम किश्त में किया जाएगा, जो प्रसव के बाद दी जाएगी। यह प्रावधान 2008 में तैयार मसौदे के एकदम विपरीत है, जिसमें अधिकांश (75 प्रतिशत) भुगतान पहली किश्त में करने की व्यवस्था थी।
इससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि विधेयक में इच्छुक अभिभावकों को तरजीह दी गई है। साथ यह भी नजर आता है कि सरोगेट स्त्री के श्रम, गर्भावस्था, और उससे जुड़े भावनात्मक व शारीरिक जोखिमों के मूल्य को झुठला दिया है क्योंकि विधेयक में यह मान लिया गया है कि यदि संतान प्राप्त नहीं होती है, तो ये सब बेकार है। इस प्रक्रिया में सरोगेट स्त्री कृत्रिम गर्भाधान की वजह से जिस तरह के स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम उठाती है उन्हें कोई महत्त्व नहीं दिया गया है।
उदाहरण के लिए, विधेयक के मुताबिक सिर्फ गेस्टेशनल सरोगेसी (यानी सिर्फ आईवीएफ के जरिए हुए गर्भधारण) की ही अनुमति होगी। सीधे गर्भाशय में निषेचन (इन यूटेरो इनसेमिनेशन) की अनुमति नहीं दी गई है, जो वास्तव में कम जोखिम भरा है। हो सकता है कि ऐसा इसलिए किया गया है ताकि बाद में बच्चे पर अधिकार को लेकर टकराव से बचा जा सके, मगर इससे यह तो साफ हो ही जाता है कि मानवीय पक्ष की बजाय व्यापारिक दृष्टिकोण को ही तवज्जो दी गई है। इसमें सरोगेट स्त्री के अधिकारों की सूक्ष्म समझ भी नजर नहीं आती क्योंकि हो सकता है कि कोई स्त्री स्वेच्छा से इस अनुबंध में शरीक हो मगर बच्चे के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव विकसित हो जाए।
वर्तमान मसौदे में सरोगेट स्त्री के लिए सफल जीवित जन्मों की संख्या में भी वृद्धि की गई है। पिछले मसौदे में एक स्त्री तीन बच्चों को जन्म दे सकती थी जबकि नवीन मसौदे में इसे बढ़ाकर पांच कर दिया गया है, जिसमें उसके अपने बच्चे भी शामिल हैं। इस प्रावधान में सरोगेट स्त्री के स्वास्थ्य के एक अहम पक्ष को नकार दिया गया है कि वह कितने ऐसे चक्रों से गुजर सकती है। चूंकि यह जरूरी नहीं है कि मददशुदा प्रजनन टेक्नॉलॉजी के चक्रों की संख्या और जीवित पैदा होने वाले बच्चों की संख्या बराबर हो, इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि स्त्री के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यह निर्धारित किया जाए कि उसे ऐसे कितने चक्रों में शरीक होने की अनुमति दी जाएगी।
हाल के वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय सरोगेसी के कई विवादास्पद मामले सामने आए हैं। इनमें बच्चों की नागरिकता को लेकर कानूनी लड़ाइयाँ चली हैं। लिहाजा विधेयक में इस मुद्दे पर ध्यान दिया गया है। प्रस्तावित विधेयक में यह अनिवार्य कर दिया गया है कि विदेशी दम्पति अपने देश से इस बात का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेंगे कि उनके देश में सरोगेसी की अनुमति है। उन्हें यह भी प्रमाण पत्र देना होगा कि सम्बंधित बच्चे को उनके देश की कानूनी नागरिकता प्राप्त होगी। आजकल बड़ी संख्या में विदेशी दंपतियाँ भारत में सरोगेसी सेवा के लिए आ रहे हैं। लिहाजा यह प्रावधान एक उपयोगी कानूनी ढांचा प्रदान करेगा। अलबत्ता, प्रस्तावित विधेयक में सरोगेट स्त्री की कानूनी जरूरतों के लिहाज से भी कुछ किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रजनन टेक्नॉलॉजी और सरोगेसी के नियमन हेतु कानून की तत्काल जरूरत है और यह विधेयक अनैतिक चिकित्सा कारोबार पर रोक लगाने की दिशा में एक जरूरी कदम है। इसमें सरोगेट स्त्रियों और बच्चों के कानूनी, वित्तीय व स्वास्थ्य सम्बंधी अधिकारों की रक्षा को ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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