March 24, 2012

कोख में श्मशान

वैश्विक स्तर पर मार्च महीने की पहचान विश्व महिला दिवस के लिए भी है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 8 मार्च को विश्व महिला दिवस घोषित करने का प्रमुख उद्देश्य समाज का ध्यान, समाज में महिलाओं के दमन की परंपरा की ओर आकर्षित करके उन्हें समाज में न्यायोचित स्थिति और स्तर दिलवाना है। इस प्रकार के प्रयासों के परिणाम स्वरूप अन्य देशों की तरह हमारी सरकार भी महिलाओं के पारंपरिक दमन के विरुद्ध कानून बनाने को बाध्य हुई है। इस संदर्भ में यह भी एक कटु सत्य है कि सिर्फ कानून बनाने से किसी सामाजिक कुप्रथा का उन्मूलन नहीं होता। यही वजह है कि वास्तविकता में हमारे समाज में पिछली एक- दो शताब्दियों में महिलाओं की स्थिति में बहुत ही थोड़ा सुधार हुआ है। संभवतया सती प्रथा का करीब- करीब उन्मूलन उन अनेक कुप्रथाओं में से एकमात्र है, जिनसे समाज महिलाओं पर अत्याचार करता रहा है।
जहां तक स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का प्रश्न है तो आज भी दयनीय है। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के प्रमाण नित्य मिलते ही रहते हैं। एक ओर तो संसद और विधानसभाओं में स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग को न्यायोचित मानने का दिखावा करना और दूसरी ओर इसे संवैधानिक मान्यता देने हेतु कानून बनाने में पिछले कई दशकों से टालमटोल करना। साथ ही साथ अबोध बालिकाओं से लेकर वृद्धाओं तक सभी उमर की स्त्रियों के साथ बर्बर अत्याचार की घटनाएं होती रहती हैं। शिशु कन्याओं के साथ उनका बलात्कार करके उनकी हत्या कर दी जाती है। जनवरी के मध्य में दिल्ली के अखिल भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान में भर्ती की गई दो वर्षीय फलक की दिल दहलाने वाली दास्तां- पूरे शरीर पर दातों से काटने और जलाए जाने जैसी अमानवीय यातनाओँ से मरणासन्न स्थिति में पंहुच चुकी अबोध फलक अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। मीडिया में इस प्रकार के समाचार नित्य छाए रहते हैं।
वास्तव में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज, लड़कियों- युवतियों का अपहरण और क्रय- विक्रय, दाम्पत्य जीवन में पत्नियों के साथ हिंसा, कुपोषण, प्रेम विवाह करने पर परिवार की इज्जत की रक्षा (?) के नाम पर युवतियों की हत्या तथा बलात्कार इत्यादि ऐसी कुप्रथाएं हैं जो समाज में जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप विकराल रूप ग्रहण करती जा रही हैं। जबकि इन सभी कुप्रथाओं को अपराध घोषित करते हुए सरकार इन सबके निषेध के लिए कानून काफी पहले बना चुकी है। परंतु मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। ऐसा इसलिए है क्योंकि पारंपरिक कुप्रथाओं के उन्मूलन में कानून बनाने जैसी कागजी कार्यवाही से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उन कुप्रथाओं के विरुद्ध सबसे कारगार कदम होता है समाज की सोच में बदलाव। सोच में बदलाव आता है समाज सेवियों और कानून को लागू करने वाली सरकारी प्रणाली के सम्मिलित
प्रयत्नों से।
हमारे समाज में पारंपरिक रूप से लड़के को जन्म से ही बहुत महत्व दिया जाता है और लड़की की उपेक्षा और अवमानना की जाती है। परिणामत: भारत में छह वर्ष तक की आयु की कन्याओं की कुपोषण के कारण मृत्युदर शर्मनाक है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और गुजरात जैसे देश के सबसे समृद्ध राज्यों में पुरुष- स्त्री लिंगानुपात सबसे खराब है, इसका मुख्य कारण है इस क्षेत्र में कन्या भू्रण हत्या की सामाजिक स्वीकृति।
कन्या भ्रूण हत्या प्रकृति के विरुद्ध घोर अपराध है। प्राकृतिक रूप से शिशु बालकों की मृत्युदर कन्या शिशुओं से अधिक होती है और इस प्रकार प्रकृति मानवीय समाज में नर- नारी अनुपात में संतुलन बनाए रखती है। प्रकृति से छेड़छाड़ के घातक दुष्परिणाम होते हैं। कोख को ही कन्या शिशुओं का श्मशान बनाने में हरियाणा और पंजाब इत्यादि में युवकों के विवाह के लिए युवतियां पर्याप्त संख्या में नहीं मिलती हैं। इसका दुष्परिणाम है कि इन प्रदेशों में युवकों को बंग्लादेश, बंगाल और तमिलनाडु इत्यादि से अपहृत युवतियों को खरीदना पड़ता है। कन्या भ्रूण हत्या के कारण अपहरण और मानव व्यापार जैसे घृणित अपराधों की उत्पत्ति होती है। हम सभी को, कोख को कन्याओं का श्मशान बनने से रोकने के लिए सतत और समुचित प्रयत्न करना चाहिए।
-डॉ. रत्ना वर्मा

1 Comment:

सहज साहित्य said...

'कोख में श्मशान' लेख कटु यथार्थ को बयान करता है। हम शास्त्रों की बहुत दुहाई देते हैं , पूजा -पाठ में भी पीछे नहीं । बस पीछे हैं मानवीयता का अनुपालन करने में । पूजा पाठ के नाम पर पूरा तूमार खड़ा कर देंगे ,दूसरी ओर मौका मिलते ही आज के युवक दहेज के बदले बिकने को तैयार मिलेंगे । दंगा हो फ़िसाद हो ,घर -परिवार के लोग हों चाहे रिश्तेदार , शोषण में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता । आपका यह लेख आँख खोलने वाला है।

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