January 31, 2012

लोग पत्थर मिट्टी क्यों खाते हैं?

यदि पाइका व्यवहार पोषण संबंधी किसी कमी को दूर करने के लिए उभरता है तो व्यक्ति को वे चीजें खाना चाहिए जो पोषण की उक्त कमी को दूर कर दे। मगर लौह की कमी वाले व्यक्तियों द्वारा चॉक खाने की कोई तुक समझ नहीं आती।
यह कई बार देखने में आता है कि लोग मिट्टी, चॉक, दीवार का प्लास्टर, इरेसर, कोयला, माचिस की तीलियां वगैरह पता नहीं क्या- क्या खाते हैं। (वैसे कुछ विशिष्ट लोग घूस, चारा, स्पेक्ट्रम वगैरह भी खाते हैं, मगर यहां उन अति- अखाद्य चीजों के भक्षण की बात नहीं कर रहे हैं।) यह बार- बार पूछा जाता है कि ये लोग इस तरह की अखाद्य चीजें क्यों खाते हैं। इस सवाल के तरह- तरह के जवाब मिलते हैं। चिकित्सा विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों में अखाद्य भक्षण की इस आदत को एक नाम भी दे दिया गया है- पाइका कहते हैं कि पाइका शब्द मैगपाई पक्षी के लैटिन नाम से बना है - मैगपाई के बारे में माना जाता है कि वह हर कुछ खाता रहता है।
सबसे पहले तो चिकित्सा विज्ञान ने पाइका की एक परिभाषा स्थापित की है - अखाद्य वस्तुओं का भक्षण ऐसी उम्र में हो जो ऐसे व्यवहार के लिए उपयुक्त उम्र नहीं है। ऐसा माना जाता है कि करीब डेढ़- दो साल तक के बच्चे तो जो भी चीज सामने दिखे उसे मुंह में डालते रहते हैं। यह उनके विकास का एक अंग माना जाता है। अत: डेढ़- दो साल की उम्र तक तो यह व्यवहार पाइका की श्रेणी में नहीं आता। परिभाषा में दूसरी शर्त है कि ऐसा व्यवहार मतलब ऐसी ऊटपटांग चीजों का भक्षण एकाध बार करने से पाइका का मामला नहीं बनता। ऐसा व्यवहार कम से कम एक माह तक जारी रहे, तभी पाइका की बात की जा सकती है। अर्थात पाइका एक माह से अधिक समय तक नियमित रूप से अखाद्य वस्तुओं के भक्षण को कहते हैं, बशर्ते कि वह डेढ़- दो साल से अधिक की उम्र में देखा जाए।
यह देखने से पहले कि पाइका के कारणों बारे में किस तरह के सिद्धांत रहे हैं, यह देखा जाए कि यह व्यवहार कितना आम है। ऐसा लगता है कि करीब 25 प्रतिशत लोगों में पाइका पाया जाता है। एक अध्ययन में पता चला है कि आम धारणा के विपरीत, स्त्री- पुरुषों दोनों में यह बराबर मात्रा में देखा जाता है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह व्यवहार कुछ संस्कृतियों में ज्यादा पाया जाता है। जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में किए गए एक अध्ययन में पता चला था कि वहां अफ्रीकी-अमरीकी लोगों में पाइका का प्रचलन काफी ज्यादा है। इसी प्रकार से कुछ देशों में भी यह अन्य की बनिस्बत ज्यादा देखने में आता है। पाइका बच्चों में (6 वर्ष से छोटे) ज्यादा पाया जाता है और कुछ अवलोकन बताते हैं कि गर्भवती महिलाओं में भी पाइका प्रवृत्ति ज्यादा होती है। कम से कम एक अध्ययन में पाइका का संबंध मनोवैज्ञानिक कारणों से देखा गया है। कुछ चिकित्सकों का विचार है कि यह ऑटिज़्म जैसे कुछ मनोरोगों के साथ जुड़ा होता है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका संबंध गरीबी से भी है, जब अत्यंत गरीब लोग भूख के एहसास को कम करने के लिए मिट्टी वगैरह का सहारा लेते हैं।
इन्हीं अवलोकनों के आधार पर पाइका प्रवृत्ति के कारणों पर भी कुछ धारणाएं बनाई गई हैं। जैसे एक मान्यता यह है कि लोग 'अखाद्य' चीजें तब खाते हैं जब उनके शरीर में किसी पोषक तत्व की कमी हो जाती है। जैसे कहा जाता है कि लौह, जिंक, कैल्शियम की कमी की स्थिति में व्यक्ति मिट्टी, चॉक वगैरह की ओर आकर्षित होते हैं। मगर इस बात को मानने में कई दिक्कतें हैं। सबसे पहली दिक्कत तो यह है कि ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है जिसके आधार पर पोषण में कमी और पाइका का संबंध स्थापित किया जा सके। दूसरी दिक्कत यह है कि यदि पाइका व्यवहार पोषण संबंधी किसी कमी को दूर करने के लिए उभरता है तो व्यक्ति को वे चीजें खाना चाहिए जो पोषण की उक्त कमी को दूर कर दे। मगर लौह की कमी वाले व्यक्तियों द्वारा चॉक खाने की कोई तुक समझ नहीं आती।
कुछ चिकित्सकों का मत है कि पाइका का सम्बंध मनोरोगों से है- ऐसे लोग खाद्य- अखाद्य के बीच भेद नहीं कर पाते, इसलिए कोई भी चीज मुंह में डाल लेते हैं (जैसा कि छोटे बच्चे करते हैं)। मगर अवलोकन इस धारणा का स्पष्ट खंडन करते हैं। देखा गया है कि मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति 'कोई भी चीज' मुंह में नहीं डाल लेते, बल्कि वे किसी खास चीज की तलाश करते हैं। मतलब वे बगैर सोचे समझे चीजें मुंह में नहीं डाल रहे हैं, बल्कि वे जानते हैं कि वे क्या खाना चाहते हैं।
एक धारणा यह भी है कि कुछ संस्कृतियों में इस तरह के व्यवहार को मान्यता मिली हुई है, खासतौर से महिलाओं के संदर्भ में। जैसे बताते हैं कि यूगांडा में गर्भावस्था के समय खाने के लिए खास किस्म की मिट्टी बाजार में मिलती है। कहते हैं कि बांग्लादेश में खास मिट्टी की टिकिया पकाकर खाने में इस्तेमाल की जाती हैं। जैसे बांग्लादेश की स्त्रीरोग विशेषज्ञ शामसुनर हिना ने बताया है कि उनकी गर्भवती मरीज नियमित रूप से मिट्टी खाती हैं। एक मरीज ने तो बताया कि वह रोजाना आधा किलो तक मिट्टी खाती है। यह खास तौर से सिलहट क्षेत्र में देखा गया है। अच्छी तरह तैयार की गई मिट्टी की टिकिया बाजार में 120 टका प्रति किलो के भाव से बिकती है। वैसे डॉक्टर हिना का ख्याल है प्राय: गरीब लोग रोजाना एक- दो टिकिया खा लेते हैं। बताते हैं कि मिट्टी खाने से गर्भावस्था में होने वाली मितली से छुटकारा मिलता है, दस्त रोके जा सकते हैं और भूख बढ़ती है। कई अन्य देशों से भी ऐसी रिपोट्र्स मिलती हैं। मगर इनमें से अधिकांश का अध्ययन पोषण वगैरह की दृष्टि से नहीं किया गया है। सिर्फ एक मामले में इसका अध्ययन हुआ है और वह भी इन्सानों में नहीं, चिम्पैंजियों के संदर्भ में।
यह देखा गया है कि यूगांडा के किबले राष्ट्रीय उद्यान के चिम्पैंजी मिट्टी ढूंढ- ढूंढकर खाते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह मिट्टी उनके भोजन के एक प्रमुख घटक के मलेरिया-रोधी गुणों को बढ़ा देती है। वे आम तौर पर ट्रिचिलिया रुबेसेन्स नामक पौधे की पत्तियां खाते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि किबले के आस- पास बसे लोग इसी मिट्टी का उपयोग दस्त के इलाज में भी करते हैं। इस मिट्टी में काओलिनाइट खनिज काफी मात्रा में होता है और यह आधुनिक चिकित्सा में भी दस्त के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है।
खैर, ये विभिन्न सिद्धांत या धारणाएं जो भी हों, मगर एक बात तो स्पष्ट है- शायद कोई नहीं जानता कि पाइका का कारण क्या है। यह भी स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में पाइका हानिरहित होता है। व्यक्ति यदि थोड़ा- बहुत चॉक या रबर का टुकड़ा खा ले तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हां, मिट्टी खाना कभी-कभी हानिकारक हो सकता है क्योंकि कई बार जो मिट्टी खाई जा रही है वह संक्रमण पैदा कर सकती है। इसके अलावा पाइका तब भी खतरनाक हो सकता है जब बच्चे रंग- बिरंगे खिलौने या दरवाजों का पेंट खुरचकर खा लेते हैं। इनमें हानिकारक पदार्थ मिले हो सकते हैं। लेकिन इस वजह से पाइका को रोग कहना उचित नहीं होगा।
वास्तव में यदि कोई व्यक्ति अखाद्य वस्तुएं खा रहा/ रही है तो चिंता इस बात की करनी चाहिए कि वह वस्तु क्या है, इस बात की चिंता करना बेकार है कि वह वस्तु खाद्य है या अखाद्य। जैसे यदि किसी व्यक्ति ने लोहे के टुकड़े खा लिए हैं तो यह देखना जरूरी होगा कि ये टुकड़े उसके पेट में जाकर कितना व कैसा नुकसान कर सकते हैं। इसी तरह का नुकसान खाद्य वस्तुएं भी कर सकती हैं। यदि व्यक्ति ने फफूंद-संक्रमित लड्डू भी खाए हैं, तो भी चिंता की बात होगी।
कहने का मतलब यह है कि पाइका अपने आप में कोई रोग नहीं लगता, जैसी कि चिकित्सा साहित्य के एक हिस्से बताया जा रहा है। पाइका के संभावित परिणामों पर विचार करने की जरूरत लगती है। वैसे कुछ चिकित्सकों ने यही विचार व्यक्त किया है। उनका मत है कि यदि किसी व्यक्ति को पाइका के लिए उनके पास लाया जाता है, तो वे दो ही चीजों पर विचार करते हैं: पहली कि वह पाइका के रूप में क्या खा रहा/ रही है, और वह चीज हानिकारक तो नहीं है और दूसरी कि कहीं उस व्यक्ति के पोषण में कोई कमी तो नजर नहीं आती। अक्सर देखा गया है कि जीवन की सामान्य चीजों को रोग बनाकर पेश किया जाता है और फिर उनका इलाज ढूंढकर पेश करने के प्रयास होते हैं। पाइका उसी तरह की बात लगती है। (स्त्रोत फीचर्स)

लेखकों से अनुरोध...

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